Education policy : पहली से 12वीं तक क्या पढ़ना है यह सरकार तय करती है. किस उम्र तक कौन सा एग्जाम दिया जा सकता है यह भी सरकार तय करती है. डॉक्टर बनने के लिए NEET देना जरूरी है – ये भी सरकार ने तय किया.  मतलब खेल के नियम, मैदान, अंपायर सब सरकार के. फिर जब 20 लाख स्टूडेंट्स मैदान में उतरते हैं और 19 लाख को कॉलेज में “जगह नहीं है” कहकर बाहर कर दिया जाता है तो उन की जिम्मेदारी से सरकार भाग कैसे सकती है?

सरकारी + प्राइवेट + आयुष मिलाकर MBBS सीट करीब 1,10,000 है मतलब 95% स्टूडेंट्स पहले ही हार गए. वो भी बिना लड़े नहीं, 2 साल कोचिंग कर के, लाखों रुपये लगा कर, नींद हराम करके.और ये आंकड़ा सिर्फ “डॉक्टर” का है. इंजीनियरिंग, लॉ, नर्सिंग – हर जगह यही कहानी है. अगर स्टूडेंट्स ने साइंस लेकर 12वीं पास की है यानी वह योग्य है. बच्चा NEET पास भी हो जाए फिर भी सीट नहीं मिलती. एक किसान का बेटा 4th के बाद हल पकड़ ले तो कोई ताना नहीं मारता. वो अपना अपना पेट पाल रहा है. लेकिन जिस ने 12 साल मन लगा कर पढ़ाई की + 2 साल कोचिंग में पैसे दिए मेहनत की उसे अगर ड्रॉप करना पड़े, एडमिशन न मिले तो उस पर क्या गुजरती होगी?

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खासकर लड़कियों की स्थिति और भी सोचनीय है. नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के अनुसार नीट क्वालीफाई करने वाले स्टूडेंट्स में 58 परसेंट लड़कियां हैं. यानी इतनी संख्या में अब लड़कियां मेडिकल इंजीनियरिंग जैसी महँगी पढ़ाई करने लगी हैं. यहीं पर सिस्टम सबसे ज्यादा क्रूर हो जाता है. पहली बार भारत की लड़कियां “शादी के लिए डिग्री” नहीं बल्कि “अपने लिए करियर” मांग रही हैं. माँ-बाप ने इस पहली बार इस जनरेशन की लड़कियों को इतनी आजादी दी है. उन्होंने कहा “जा बेटा, हॉस्टल में रह ले”. लड़की ने पहली बार रात 12 बजे तक लाइब्रेरी में पढ़ाई की. पहली बार उसने सोचा कि मैं अपने पैरों पर खड़ी होऊंगी  और फिर एक दिन रिजल्ट आता है – 720 में 650 लाए पर सरकारी कॉलेज नहीं मिला.

अब 3 रास्ते बचते हैं या तो इस साल ड्रॉप कर लो यानी 1 साल और मेहनत करो, रिश्तेदारों की सुनो कि “शादी कब करेगी?” या फिर प्राइवेट हॉस्पिटल लो और 50 लाख से 1 करोड़ या उस से भी ज्यादा रुपयों का इंतजाम करो. सामान्य मिडिल क्लास फॅमिली के पास इतना पैसा कहाँ है और वह भी लड़की का सपना पूरा करने के लिए. ऐसे में पेरेंट्स कहेंगे  “चलो कोई बात नहीं” BSc करो, B.Ed करो. यानी वो आग बुझा दो जो डॉक्टर बनने की थी. अगर पेपर लीक हो जाए तो टेंशन में पेरेंट्स कहेंगे बस बहुत हुआ अब शादी कर घर बसाओ.

समाज लड़कियों को सिखाता है – पूजा करो, व्रत रखो, “अच्छा वर” मिलेगा. लेकिन जब लड़की खुद “अच्छा भविष्य” बनाना चाहे तो सीट की दीवार खड़ी कर देते हो. ये आजादी छीनना नहीं तो क्या है ? लड़की नीट में बैठती है पर सफल नहीं होती तो घरवाले पंडित जी को बुलाते हैं. पंडित कहेंगे ,”बेटी की कुंडली में गुरु कमजोर है”.”नवग्रह शांति करवाओ, 5100 लगेंगे”.

“संकटमोचन में 11 मंगलवार हनुमान चालीसा पढ़वाओ”.

सीट बढ़ाने की मांग नहीं होगी. नए कॉलेज की मांग नहीं होगी. मांग होगी “बेटी के लिए व्रत” की. क्यों? क्योंकि सरकार ने और समाज ने मिलकर लड़की के दिमाग में ये भर दिया है कि”अगर नौकरी नहीं मिली तो कमी तेरी मेहनत में नहीं, तेरे कर्म में है”

100-200 एकड़ में आश्रम बन गए. योग गुरु के लिए एयरपोर्ट बन गए. आयुर्वेद यूनिवर्सिटी के उद्घाटन में हेलीकॉप्टर उतरे. लेकिन उसी देश में एक नए सरकारी मेडिकल कॉलेज के लिए 5 साल से फाइल अटकी है. नर्सिंग कॉलेज में प्रोफेसर नहीं हैं. BSc के लैब में माइक्रोस्कोप 1998 का है. मतलब “संस्कृति” के नाम पर पत्थर लगवाने के लिए पैसा है. “भविष्य” के नाम पर क्लासरूम बनाने के लिए पैसा नहीं. “संस्कृति बचाओ” के नाम पर करोड़ों का बजट बहुत अच्छी बात है. लेकिन उसी देश में सरकारी मेडिकल कॉलेज में बेड बढ़ाने के लिए पैसा क्यों नहीं? नए मेडिकल कॉलेज और सरकारी हॉस्पिटल्स खोलने में इतना खर्च क्यों नहीं हो रहा? नर्सिंग कॉलेज खोलने के लिए जमीन नहीं? किस कॉलेज के उद्घाटन के लिए हेलीपेड बना? किस सरकारी स्कूल के लिए सड़क बिछी? आप तय कर रहे हो कि 12वीं के बाद बच्चा क्या पढ़ेगा. आप तय कर रहे हो कि पासिंग 33% होगी. तो फिर पास होने के बाद एडमिशन की गारंटी क्यों नहीं?