Market research : सौम्या मोहंती 28 सालों से मार्केटिंग रिसर्च में है, जहां वे उपभोक्ताओं को समझ, उन की आवाज प्लान और स्ट्रैटजी के रूप में सामने रखती है. आज गृहशोभा उन के इंटरव्यू के जरीए स्कूल से कालेज की ओर बढ़ते स्टूडैंट्स के लिए कुछ एडवाइस और गाइडैंस ले कर आई है. पेश है सौम्या मोहंती मैनेजिंग डाइरैक्टर ऐंड चीफ क्लाइंट औफिसर, कांतार से की गई बातचीत –
आप का बचपन कैसा रहा?
मेरे पेरैंट्स सिविल सर्विसेज में थे तो मेरा बचपन अपने होमटाउन उड़ीसा से दूर मेरठ में गुजरा. वहां मैं ने सोफिया गर्ल्स स्कूल में अपनी पढ़ाई की. बचपन की काफी अच्छी मैमोरीज हैं. हम अपनी गेम्स बनाते थे, बाहर खेलते थे, कौमिक्स पढ़ते थे, साथ ही मैं ने बहुत सी फिल्में थिएटर पर देखी थीं. मगर आज के बच्चों के लिए ये सब थोड़ा अजीब है क्योंकि उन का अधिकतर समय इंटरनैट पर ही बीतता है.
अपनी ऐजुकेशन जर्नी के बारे में कुछ बताएं?
दरअसल, मैं इंग्लिश लिटरेचर करना चाहती थी लेकिन उस समय यह औप्शन नहीं था. मैं पढ़ने में तेज थी तो साइंस ली क्योंकि उस समय डाक्टर, इंजीनियर बनने की ही होड़ थी. लेकिन कुछ समय बाद वह खास पसंद नहीं आई तो मैं ने फिर आर्ट्स लिया और टौप किया. मगर उस समय आप के पास साइंस नहीं थी तो फिर बैटर औप्शन इकौनौमिक्स ही था. इसलिए दिल्ली के इंद्रप्रस्थ कालेज से इकौनौमिक्स में ग्रैजुएशन की. फिर एडवरटाइजिंग में पोस्ट ग्रैजुएशन ‘इंडियन इंस्टिट्यूट औफ मास कम्युनिकेशन’ से की.
पोस्ट ग्रैजुएशन में मेरी बहुत रुचि हुई क्योंकि वह क्रिएटिविटी की फील्ड है. क्रिएटिव राइटिंग, क्रिएटिव आइडिया जो मुझे बहुत पसंद था. मगर यह पहले से बनाई कोई रणनीति नहीं थी. अचानक मेरे सामने विकल्प आ रहे थे और मैं उन का चुनाव कर रही थी.
मार्केट रिसर्च में कैरियर जर्नी कैसे शुरू हुई?
पोस्ट ग्रैजुएशन के बाद एक दोस्त ने एक मार्केट रिसर्च जौब का बताया. मार्केट रिसर्च के बारे में पहले मुझे कुछ पता नहीं था लेकिन फिर मैं ने रिस्क लेनी की सोची और वहां जौइन किया. पहले तो यह बहुत अलग था लेकिन कुछ समय बाद इसे सीखने, करने के बाद मेरा इंटरैस्ट बनने लगा क्योंकि मेरी हमेशा से और चीजों को जाननेसमझने की जिज्ञासा रहती थी. आज मुझे इस फील्ड में 28 साल हो गए हैं. मैं इस फील्ड में बिताया हर पल ऐंजौय करती हूं.
क्या कभी कैरियर चौइस को ले कर संदेह में आईं?
अपनी कैरियर चौइस तो नहीं लेकिन अपने सब्जैक्ट को ले कर मैं थोडा निराश थी क्योंकि उस समय सब्जैक्ट चुनने के विकल्प थे ही नहीं. उस समय आप साइंस के साथ लिटरेचर नहीं पढ़ सकते थे, न लिटरेचर के साथ मैथेमैटिक्स. तो हमारे पास औप्शन बहुत सीमित थे.
मगर मेरी लाइफ में जैसेजैसे अच्छे औप्शन आते गए, मैं ने उन्हें चुना और मेहनत की. मैं मानती हूं कि अगर आप पूरी मेहनत करते रहें तो किसी न किसी तरीके से आप को अपनी मंजिल मिल ही जाती है.
ऐकैडमिक परफौर्मैंस के साथ एक स्टूडैंट को और किन बातों पर ध्यान देना चाहिए?
देखिए स्कूल ऐकैडमिक नौलेज का बेस तैयार करते हैं जो बहुत जरूरी है. आप की लाइफ में डिसिप्लिन भी लाते हैं. मगर और भी चीजे हैं जो आप को सीखनी होती हैं जैसे फ्रैंडशिप कैसे करें, नैटवर्क कैसे बनाएं, कैसे लोगों से डील करें. तो यह सब कालेज से शुरू होता है, जहां बुक्स से बाहर निकल इन की प्रैक्टिस करनी होती है. जैसे जब मैं कालेज में थी तो मैं ने बहुत सी डिबेट कीं, क्विज में भाग लिया, जिस से मेरी पब्लिक स्पीकिंग डैवलप हुई, जिस में एक स्ट्रैटजी की जरूरत होती है.
इस से मैं ने स्ट्रैटजी प्लानिंग, ग्रुप को मैनेज करना सीखा जो आगे जा कर आप की प्रोफैशनल जर्नी में बहुत काम आता है. इसलिए बुक्स की थ्योरी के साथसाथ लाइफ की प्रैक्टिकल नौलेज भी बहुत जरूरी है.
आज के स्टूडैंट्स अपने कैरियर में किस बात से मात खा सकते हैं?
आज स्टूडैंट्स में, युवाओं में हृश्वङ्कश्वक्त्र त्रढ्ढङ्कश्वक्क वाली फीलिंग नहीं है. मैं ने देखा कोई बात हुई नहीं कि वह हार मान जाते हैं. आज बहुत जेन जी काम करने आते हैं और जल्दी जौब छोड़ कर चले जाते हैं क्योंकि प्रैशर बहुत है या किसी ने थोड़ा ऊंचा बोल दिया तो छोड़ गए. आज की पीढ़ी में धैर्य नहीं है, सब्र नहीं है.
अब इस पर मैं कहूंगी कि मेरे पास खुद की इंस्पायरिंग स्टोरी है. जैसे मैं स्कूल में वाइस हैड गर्ल थी जो एक वोट से हार गई. कालेज में मैं कुछ वोट से हार गई थी. मैं ने सिविल सर्विसेज के भी ऐग्जाम दिए, लेकिन नही हुआ. फिर पोस्ट ग्रैजुएशन की प्लेसमैंट के टाइम भी 10 इंटरव्यूज के बाद भी सलैक्शन नहीं हो पा रहा था. लेकिन मैं ने हार नहीं मानी. कोशिश करती रही और उस समय एक दोस्त ने एक जौब का बताया. वहां गई और काम किया. लेकिन मुश्किलें वहां भी मिलीं.
मैं ने जौइन तो किया मगर मुझे कंप्यूटर नहीं आता था तो एक सीनियर नाराज रहते थे क्योंकि उस समय तो स्कूल में कंप्यूटर थे ही नहीं जो कुछ नौलेज मिलता, कोई टाइपिंग प्रैक्टिस होती तो मैं ने 1 हफ्ते में रातरातभर बैठ कर कंप्यूटर सीखा. इसलिए परेशानियों से भागो मत बल्कि खुद को बेहतर बनाने पर ध्यान दो.
क्या एआई एडवरटाइजिंग और मार्केटिंग स्टूडैंट्स के लिए खतरा है?
जो एडवरटाइजिंग और मार्केटिंग फील्ड के युवा प्रोफैशनल हैं या जो इस में आगे कैरियर बनाना चाहते हैं और सोच रहे हैं कि एआई एक बड़ा खतरा है, उन की जौब खा जाएगा. तो एआई सिर्फ आप के लिए नहीं, सब के लिए कोई न कोई खतरा ले कर आया है. मगर आप को उस से डरना नहीं है बल्कि उस से ऊपर उठना है. जैसे आज मैं खुद भी इसे सीख रही हूं न कि कोई टैंशन ले रही. ठीक वैसे ही आज जेन जी को भागना नहीं चाहिए बल्कि रिस्क लेना चाहिए. चैलेंज लो और सीखो.
क्या एक कालेज की निर्णायक भूमिका होती है कैरियर में?
देखिए एक कालेज की अच्छी भूमिका तो होती है लेकिन पूरी निर्णायक नहीं. वह इसलिए कि पहले आप को समझना होगा कि आप का इंटरैस्ट है क्या. अगर आप को ऐकैडेमिक फील्ड में जाना है, साइंस रिसर्च करनी है तो हां कालेज की भूमिका बहुत अहम है.
मगर आप को और कोई फील्ड जैसे कौरपोरेट तो अच्छे कालेज की रेस में पीछे रह जाने पर निराश न हों. जो कालेज मिले, उस में अपनी मेहनत करें.

