Public health career : हर व्यक्ति की पेशेवर यात्रा के पीछे उस के बचपन, शिक्षा और जीवन के अनुभवों की एक खास भूमिका होती है. पब्लिक हैल्थ और सोशल डैवलपमैंट जैसे संवेदनशील क्षेत्र में वर्षों से काम कर रहीं डा. निधि पुंढीर ने शिक्षा, रिसर्च और जमीनी अनुभव—तीनों को साथ ले कर अपनी अलग पहचान बनाई है. इस विशेष बातचीत में उन्होंने अपने शुरुआती जीवन, शिक्षा, कैरियर की चुनौतियों और आज के युवाओं के लिए जरूरी सीखों पर खुल कर बात की :

स्कूल के दिनों में आप अपने भविष्य को किस नजर से देखती थीं? क्या उस समय कभी लगा था कि आगे चल कर आप का सफर पब्लिक हैल्थ और सोशल सैक्टर तक पहुंचेगा?

बचपन में क्योंकि मैं ज्यादातर अपने मातापिता के साथ रही, अगर वे स्कूल जाते थे तो मैं उन के साथ स्कूल चली जाती थी, पिता के साथ उन के दफ्तर. जब मेरी मां बच्चों के रिजल्ट तैयार करती तो हम उन की मदद करते. तब ऐक्सैल शीट नहीं था तो बड़े चार्ट पेपर को आपस में जोड़ कर पूरी जमीन पर बिछा देते थे, 10-10 चार्ट पेपर जोड़े जाते. फिर उस पर लाइनें खींचते ताकि मां को काम में कुछ आसानी हो सके. जब मेरे पिता दूसरे स्कूलों में इंस्पैक्शन के लिए जाते थे तो एक बार ऐसा हुआ कि जौइंट सैकरेटरी ऐजुकेशन आईं और वे देख रही थीं कि उन का काम कैसे चल रहा है. यह मेरे लिए काफी अलग अनुभव था जिसे देख कर मुझे इंस्पिरेशन मिली कि इस तरह का कैरियर जिस में आप के पास थोड़ी सी अथौरिटिव पावर भी हो चीजों को बदलने की और मीनिंगफुल काम करने का भी जरीया मिले. उस के लिए सिविल सर्विस ऐसी स्ट्रीम होती है तो मैं ने आरएएस का एग्जाम दिया और उस में मेरा काफी अच्छा लैवल भी था, लेकिन उसी समय मैट भी शुरू हुआ था, जिस के जरीए ग्रैजुएशन के बाद में आइएचएमआर पहुंची.

इस तरह की और वीडियो देखने के लिए गृहशोभा के चैनल को सब्सक्राइब करें

वहां जा कर एहसास हुआ कि यह एक अलग और पारंपरिक रास्तों से हट कर क्षेत्र है. इस में हमें मैनेजमैंट, पब्लिक हैल्थ जैसे सब्जैक्ट पढ़ने को मिलते. फिर मैं लाइफ साइंस की स्टूडैंट थी तो रु?ान पब्लिक हैल्थ की तरफ था.

आईएचएमआर पहुंची तो दिशा मिली. लगा यह पब्लिक हैल्थ सैक्टर में काम करने का अच्छा जरीया है. शुरुआत में तो यह पता भी नहीं था कि इस तरह का कैरियर भी होता है लेकिन यह तय था कि इस तरह का काम करना है जो समाज उपयोगी हो.

आप ने साइंस और फिर हैल्थ मैनेजमैंट जैसे विषय चुने, क्लासिकल डांस में आप विषारद तक पहुंचीं, लेकिन उसे कैरियर के तौर पर नहीं चुना. आप की इन फैसलों के पीछे क्या सोच थी? तब ‘सफलता’ आप के लिए किस माने में थी?

मैं ने अपनी हर एग्जाम, हर रियाज को बड़ी गंभीरता से लिया है. मैं ने विषारद किया लेकिन कभी मैं ने इसे कैरियर के तौर पर नहीं लिया. यह मेरी हौबी थी. अब तक भी मैं रैग्युलरली रियाज करती हूं. मैं पेंटिंग्स में भी बहुत सक्रिय थी. लेकिन साइंस मेरे दिल के सब से करीब थी.

पब्लिक हैल्थ में आने के बाद काम को समझने और करने का एक व्यवस्थित तरीका मिला. उस के बाद में अपनी एमफिल के लिए बीआईटीएस पिलानी पहुंची. क्योंकि आईआईएचएमआर में हमें ज्यादतर हौस्पिटल मैनेजमैंट पढ़ने को मिला और जब मैं ने एनजीओ सैक्टर में काम किया तब मुझे लगा कि पब्लिक हैल्थ स्पैशलाइज्ड फील्ड है और उसे भी पढ़ने की जरूरत है. मुझे लगता है कि जब आप अपनी पसंद की फील्ड में गहराई से पढ़ते हैं, उस के बारे में जानते हैं तो आप को अलग ही तरीके की आत्म संतुष्टि मिलती है.

मैं ने काफी काम किया लेकिन मुझे लगा कि मुझे और बड़े स्तर पर पब्लिक हैल्थ में काम करना है. तब मैं ने सेव द चिल्ड्रन में काम किया. वहां चाइल्ड राइट्स का मैं ने एक चैप्टर शुरू किया. मैं ने उस से पहले कभी मानवाधिकारों के बारे में नहीं पढ़ा था लेकिन मैं ने उस फ्रेम वर्क को समझ और उस पर मैं ने काफी साल काम किया. उस के बाद प्लान इंटरनैशनल में मैं काफी सालों तक वायलैंस अगेंस्ट चिल्ड्रन को ले कर ग्लोबल एडवाइजर रही. उस एरिया ने भी मैं ने काफी रुचि ली. लेकिन उस में भी उस के फंडिंग पार्ट पर ज्यादा काम कर रही थी और उस का टैक्निक्ल एडवाइजर रोल मेरा था.

ये दोनों ही ऐसे विषय थे जिन की पढ़ाई कोई यूनिवर्सिटी नहीं कराती. जौब के दौरान इन चीजों की हमें स्पैश्लाइज ट्रेनिंग मिली. इंटरनैशनल डैवलपमैंट स्पेस में जब मैं रही तो 40 से ज्यादा देशों में ट्रैवल किया, अलगअलग देश और कम्यूनिटी के साथ मैं ने काम किया.

आज पीछे मुड़ कर देखने पर क्या लगता हैं, क्या आप की शिक्षा ने शुरू से ही आप की दिशा तय कर दी थी या रास्ता धीरेधीरे बनता गया?

मैं हमेशा यह कहती हूं कि पढ़ाई आप को कभी नहीं बताएगी कि अतंत: आप को यही बनना है, शिक्षा अपनेआप में खोज और सीखने की एक यात्रा होती है, जिस में आप अपनेआप को भी खोजते हो, अपनी क्षमता को समझते हो. तो इसलिए मैं कहती हूं कि कोई भी आप डिग्री करें उसे सीखने के लिए करें.

जरूरी नहीं जिस जरीए से हम आमदनी करेंगे. वह आप की डिगरी से ही जुड़ी हो. आप के सीखने से बहुत सारी फील्ड्स खुल जाती हैं. औन द जौब ट्रेनिंग आप की लर्निंग अलग होती है, जब आप ट्रैवल करते हैं, लोगों से मिलते हैं, रोज अपनी कौमन सैंस अप्लाई करते हैं. लेकिन यह सैंस डैवलपमैंट या चरित्र निर्माण तब होता है जब आप खुद को उस चीज के लिए खुला रखते हैं.

मेरे साथ भी यही हुआ, इंटरनैशनल डैवलपमैंट स्पेस उस समय देश में बहुत नया था,  बहुत कम लोग इस दिशा में आते थे, महिलाएं तो खासकर नहीं आती थीं क्योंकि इस में आप को बहुत यात्रा करनी पड़ती है. लेकिन यह बहुत अच्छा सैक्टर है और अगर ऐनालिटिकल डिगरी और सम?ा आप के पास है तो आप कर सकते हैं.

अगर आज कोई छात्र इस क्षेत्र में कैरियर बनाना चाहता है तो उसे शुरुआत से किन स्किल्स और आदतों पर ध्यान देना चाहिए?

मुझे ऐसा लगता है कि जेन जी बहुत ज्यादा क्रिएटिव है क्योंकि वह किसी भय के माहौल में नहीं पली हैं. अभी की जो यंग जैनरेशन है उस में अधिकतर को शैल्टर और फूड इन 2 मूलभूत चीजों की चिंता करने की जरूरत ही नहीं है और तीसरी सब से जरूरी चीज है ट्रांसपोर्ट. अब उस की सुविधा भी बहुत है.

दूसरी अहम चीज है क्रिएटिव इंडिपैंडैंस जिसे विकसित और उस का अभ्यास करना भी बहुत जरूरी है ताकि बच्चा कहीं इतना संकोची न बन जाए कि उस में क्या रुचि है, क्या क्रिएटिविटी है वह यह बता ही न पाए. इसलिए कौन्फिडैंस बिल्डिंग बचपन से ही बहुत जरूरी है. अब यह सिर्फ बोलने से नहीं होगा कि आत्मनिर्भर बनो. यह होगा आप के पार्टिसिपेशन से, इन्वौल्वमैंट से होगा. यह पूरा प्रोसैस संस्थाओं को फौलो करना होगा. तभी बच्चे में सैल्फ कौन्फिडैंस पैदा होगा.