‘मदर  औफ वाटर’ के नाम से पहचानी जाने वाली अमला रुइया ने देश के कई सूखा प्रभावित गांवों में जल संकट को दूर करने के लिए काम किया. उन का मानना है कि सही सोच, सामुदायिक भागीदारी और शिक्षा के जरीए बड़े सामाजिक बदलाव संभव हैं. उन की यात्रा युवाओं को संवेदनशीलता, नेतृत्व और समाज के लिए काम करने की प्रेरणा देती है.

जब आप छात्रा थीं तब आप क्या बनना चाहती थीं? क्या कभी सोचा था कि आप का सफर ग्रामीण विकास और जल संरक्षण तक पहुंचेगा?

मैं एक यूपी के साधारण परिवार से हूं. मेरे घर में सादा जीवन और उच्च विचार की भावना को काफी महत्त्व दिया जाता था. मेरी मां को समाजसेवा हमेशा प्रिय रही. एक वक्त था मेरे जीवन में जब हम देहरादून में थे, उस वक्त इंडोचाइना युद्ध छिड़ गया था. हमारे सैनिक पर्याप्त गरम कपड़ों के अभाव में ग्लेशियर में जा कर युद्ध कर रहे थे. तब मेरे पिता अपनी सामर्थ्य से ज्यादा उन के लिए रजाइयां बनवा कर भेजते थे. हम घर बैठे उन के लिए मोजे, दस्ताने, टोपियां और स्वैटर बुनते थे. यह सब देखते हुए मेरा दिल हमेशा होता था कि मैं भी जीवन में कुछ सार्थक करूं, देश के लिए, समाज कल्याण के लिए कुछ कर गुजरूं.

अपने छात्र जीवन से ही मैं दृढ़ निश्चई रही हूं. पढ़ाई के अलावा मुझे कुछ अच्छा नहीं लगता था. मैं मानती हूं कि मेरी सब से बड़ी ताकत यही है कि मैं शुरू से दृढ़ निश्चयी रही हूं. मैं जो कुछ भी अपने जीवन में आज तक कर पाई हूं उस में ये गुण आप को जरूर देखने को मिलेंगे. यही मेरे जीवन का आधार रहा है.

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किसी टीचर की कही कोई बात जो आज भी आप को बेहतर करने की लगातार प्रेरणा दे रही है?

मेरे सभी शिक्षकों ने मेरा आत्मविश्वास बढ़ाने में बहुत मदद की. मैं मेहनती थी और कुछ न कुछ करने में लगी रहती थी. अपनी पढ़ाई के अलावा क्लास में कोई भी ऐक्टिविटी हो, चार्ट बनाने हों या कोई और काम मैं हमेशा आगे रहती थी. मुझे टीचरों से जो प्रोत्साहन मिला वह मेरे जीवन में बहुत काम आया क्योंकि मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि मैं इस काम में उत्तीर्ण नहीं हो पाऊंगी. ऐसा आत्मविश्वास था कि यह काम मेरे सामने आया है तो यह हो कर ही रहेगा.

क्या आप ने कभी कोई पारंपरिक कैरियर अपनाने के बारे में सोचा था?

नहीं मुझे कुछ काम करना है यह कभी मेरे दिमाग में नहीं था. मेरी बहुत से हौबीज रही हैं जैसे गार्डनिंग, पैटिंग, बोनसाई, प्राणिक हीलिंग, योग. अध्यात्म से मैं काफी जुड़ी रही हूं. मुझे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना है यह कभी सोचा नहीं. मैं मानती हूं यह रास्ता मुझे कुदरत ने दिखाया है और इस पर मुझे चलने की ताकत भी कुदरत ने ही दी है. उस ने कभी मेरे मन में लेश मात्र संदेह नहीं आने दिया.

समाजसेवा के रास्ते को चुनना आसान नहीं होता, इस में व्यक्तिगत, आर्थिक और भावनात्मक स्तर पर सामने आई चुनौतियों को कैसे दूर किया?

यह बात सच है इस रास्ते पर चलना काफी कठिन है. लेकिन मुझे अपने परिवार की तरफ से हमेशा साथ मिला. हम काफी संकीर्ण सोच के परिवार में रहते थे, शुरुआत में परिवार के लोग समझ नहीं पा रहे थे कि मैं क्या करना चाहती हूं, लेकिन मैं ने बातचीत कर उन को समझाया, अपना उद्देश्य बताया तो बाद में सभी ने मेरा साथ दिया.

आप के काम का असर खासकर महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा पर भी पड़ा है आप जल संरक्षण और शिक्षा के बीच क्या संबंध देखती हैं?

हमारे काम के काफी फायदे हैं, जिस का सब से ज्यादा प्रभाव महिलाओं के जीवन पर पड़ता है क्योंकि कुछ जगहें ऐसी थीं कि वहां महिलाओं का सारा जीवन सिर्फ पानी के घड़े भरने में गुजरता था. अब जब महिलाएं घर संभाल रही हैं तो बच्चियां अब शिक्षा पा रही हैं. उन लड़कियों के सपने इतने ऊंचे हैं कि वे अब अच्छे भविष्य की उड़ान भर रही हैं.

महिला होने के नाते क्या कभी आप को प्रौबल्म्स आईं और उन चुनौतियों को कैसे पार किया?

मेरे घर वालों की तरफ से काफी शुरू में सवाल खड़े हुए कि कैसे कर पाएगी. गांव वालों की तरफ से कभी ऐसा संशय नहीं पेश आया कि महिला है तो कैसे करेगी या सही करेगी कि नहीं. उन का पूरा भरोसा मेरे साथ रहा. जब मेरा मन हो किसी काम को करने का तो कोई भी चुनौती आए, रास्ता निकल ही जाता है. मेरी टीम भी अच्छी रही है तो उस के बल पर यह काम होता रहा है.

आप के अनुसार आज की शिक्षा कैसी होनी चाहिए जो युवाओं को सिर्फ डिगरी नहीं बल्कि समस्याओं का समाधान करने वाला बनाए?

मुझे लगता है स्कूल्स की तरफ से इस तरह के ट्रिप शुरू होने चाहिए, जहां पर कुछ समृद्ध बच्चे अंडरप्रिविलिज से मिलें जुलें, उन की तकलीफें समझें और उन की कुछ न कुछ अपने स्तर पर मदद करें. बच्चों को बचपन में आप दया का पाठ पढ़ा देंगे, तो उन्हें सोचने का मौका मिलेगा कि उस दिन उन्होंने किसी की मदद की तो उन्हें कितना अच्छा लगा था. अगर बचपन से उन में मदद का गुण डालें तो वे सम?ा पाएंगे कि छोटी सी मदद से उन्हें कितनी आत्मसंतुष्टि मिली. अगर उस पैसे से वे फिल्म देख लेते या किसी रैस्टोरैंट में खाना खा लेते तो वह शायद उन्हें याद भी नहीं रहता. मैं भी स्कूल चलाती हूं और कोशिश करती हूं बच्चों के अंदर मानवीय गुण हों. लोगों की तकलीफों को वे समझ सकें यह मैं उन्हें सिखाने की कोशिश करती हूं. मैं ने हाल ही में बच्चों के लिए किताब भी लिखी है जिस में 80 ह्यूमन वैल्यूज कविताओं के माध्यम से मैं ने उस में जोड़ा है, साथ ही 40 पानी से संबंधित गीत उस में जोड़े हैं जिस से बच्चों को किसी स्कूल फंक्शन में कुछ अलग साउंडट्रैक पर परफौर्म करने का मौका मिले, सिर्फ बौलीवुड म्यूजिक तक ही वे सीमित न रहें. मैं ने इस के बाकायदा वीडियो यूट्यूब पर डाले हैं और पुस्तक में क्यूआर कोड दिए हैं ताकि बच्चे, पेरैंट्स और टीचर्स उसे आसानी से ढूंढ़ सकें.

पेरैंट्स बच्चों का सुरक्षित कैरियर चाहते हैं, ऐसे में जो युवा समाज के लिए कुछ करना चाहते हैं, उन्हें संतुलन कैसे बनाना चाहिए?

मुझे लगता है वे बैलेंस खुद ही बना लेंगे, वे अपना भी काम सुचारु रूप से कर लेंगे और जितना बन पड़ेगा उतना देश के लिए कुछ काम भी जरूर करेंगे. मैं मानती हूं इतने करोड़ हमारे देशवासी हैं, अगर वे थोड़ा भी देश में सामाजिक सद्भाव के काम करें तो सब मिल कर हमारे देश के विकास में बहुत मदद कर पाएंगे. हर इंसान उतना ही करे जितना वह कर सकता है. अगर हम कर्म के सिद्धांत को सच मानते हैं तो हमें जरूर अच्छे कर्म करने ही चाहिए.

अगर आप को 17 साल की अमला को सलाह देने का मौका मिले, तो आप क्या कहेंगी?

मैं यही कहूंगी कि अपने जीवन को यूजफुल जरूर करना. तुम्हें कुदरत ने एक बबल औफ ऐनर्जी ऐंड टाइम दिया है उसे जरूर यूटिलाइज करना ऐसे कि तुम्हारे देश को कुछ फायदा हो. अपने देश को संवारो और बनाओ.