Fake private center : नर्सरी से ले कर ग्रैजुएशन तक हर जगह एडमिशन के लिए लंबी कतारें हैं. बच्चे ने अगर स्कूलिंग किसी आम स्कूल, सरकारी स्कूल आदि से कर भी ली और अच्छे अंक भी ले आया, तब भी वह कालेज की पढ़ाई आम तरीके से यानी सरलता से नहीं कर पाएगा क्योंकि अब कोई कालेज आम कालेज रहा ही नहीं. हर कालेज के लिए बच्चों की एक लंबी कतार, ऐंट्रैंस ऐग्जाम, कोटा या आरक्षण और बड़ी सिफारिश चलन में है, साथ ही डोनेशन, घूस का पैरेलल बिजनैस भी चल रहा है. जो युवाओं और पेरैंट्स के भविष्य और मनोबल दोनों पर दुष्प्रभाव डाल रहा है.

हायर स्टडीज यानी स्कूल के बाद की ऐजुकेशन का आज एक यंग पर्सन और फैमिली के लिए अफोर्ड करना बहुत मुश्किल हो गया है क्योंकि अब ज्ञान के क्षेत्र में एक बच्चे की कौशलकुशलता, उस के परिश्रम का ही मोल नहीं बल्कि धन की भी जरूरत है.

आज हर बड़े प्राइवेट कालेज को बिजनैस की तरह चलाना पड़ रहा है, जिस में कस्टमर स्टूडैंट हैं पर उन्हें डिलिवर करने की जिम्मेदारी इंस्टीट्यूट की है. कभी मोटे डोनेशन की मार, तो कभी बड़ी सिफारिश की, तो कभी किसी कोटे से एडमिशन तो मिल सकता है पर डिलिवरी यानी प्लेसमैंट की गारंटी नहीं दी जा सकती. लेकिन यह भी बड़े अचंभे की बात है कि मांबाप उन कालेजों में भी अपने बच्चों के एडमिशन में अपनी पूरी पूंजी, जिन की कोई रैपूटेशन या रिकौर्ड नहीं होता अपना घर लुटा देते हैं क्योंकि उन्हें इन के पीछे इश्तिहारों, खबरों और टीवी में इन के बड़े चर्चे, हाई रैंकिंग और सुनहरा भविष्य देने की बातें ही दिखाईसुनाई देती हैं.

भविष्य से खिलवाड़

बड़ेबड़े ऐक्टर पैसा ले कर इन की वाहवाही कर रहे हैं और एडवर्टाइजमैंट वाले जो उन की रैंकिंग को कवर पेज पर छाप रहे हैं उन का उद्देश्य किसी स्टूडैंट के भविष्य के लिए उसे किसी अच्छे कालेज का औप्शन देना नहीं होता बल्कि सिर्फ लोगों को आकर्षित करना होता है ताकि इन कालेजों को फंड करने वाले, इन के पीछे के ठेकेदार जो मिनिस्टर, सत्ताधारियों के रिश्तेदार, बिजनैसमैन, फंड करने वाले बैंक होते हैं.

इन का उद्देश्य देश के बच्चों को सुनहरा भविष्य देना नहीं होता बल्कि अपनी जेबें गरम करना, अपनी विदेशी बैंक अकाउंट भरना और एक दिन पैसों के दम पर अपने सारे काले चिट्ठों से पीछा छुड़ा विदेशों में भाग वहां की नागरिकता का उपभोग करना होता है. इस में ये हाई रैंकिंग के इश्तिहार इन की पूरी मदद करते हैं.

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ऐसे एड या विज्ञापन का उद्देश्य सिर्फ इन लोगों की जेबें एक स्टूडैंट के मातापिता की जीवनभर की पूंजी से भरनी होती हैं. अब चाहे यह पूंजी एक बच्चे के मांबाप दिनरात एक कर कमा के लाए हों, उधार लाए हों या अपना घरबार बेच कर लाए हों.

ये एक असली और टू द पाइंट एजूकेशन देने वाले प्राइवेट इंस्टीट्यट्स को बदनाम कर रहे हैं.

स्टूडैंट्स और उन के मांबाप का यूं बड़े नाम के सही व गलत के कालेजों का डिफरेंस व समझ पाने के कारण उन के पीछे पूंजी लुटाने में इन की अपनी गलती नहीं करते बल्कि एक मायाजाल में फंसते है.

पैसों पर न जाएं

इन कुछ कालेजों ने अपने फेक या गलत डाटा दर्शा कर बनाया है. डाटा में इन की रैंक ऊपर, इन के यहां के पढ़े बच्चों की परफौरमैंस ऊपर और इन की सफलता के चर्चे भी ऊपर होते हैं जबकि फैर्क्ट्स इस डाटा से कोसों दूर होते हैं. न तो उन की रैंकिंग सही होती है और न ही यहां के पढ़े बच्चों का कैरियर. यहां के पढ़े इंजीनियर, प्रोफैशनल्स अपनी जौब में अच्छी परफौर्म नहीं कर पाते, बहुतों को नौकरी नहीं मिलती बस कुछ ही अच्छी जगह काम पाते हैं.

बहुतों को इस आधार पर नौकरी नहीं मिलती कि कुछ कंपनियां तो इन कालेजों की गुणवत्ता को सही ही नहीं मानतीं क्योंकि यहां तो शिक्षा से पहले घूस, डोनेशन और सिफारिश की पहल होती है.

दूसरा शिक्षा की क्वालिटी भी कोई खास नहीं होती क्योंकि पैसों के ही आधार पर कोचिंग की नौकरी और स्टूडैंट्स की सीट दोनों मिली होती हैं और फैकल्टी ही जब पैसों या सिफारिश के दम आई हो न कि अपनी काबिलीयत के दम पर तो हम क्वालिटी ऐजुकेशन कैसे देगी?

जब एडमिशन सीट भी पैसों के आधार पर मिले तो पैसे दे कर तो कोई नालायक भी एडमिशन ले सकता है और पैसों और सिफारिश के आधार पर पास भी हो सकता है. इसलिए आवश्यक है कि योग्य और ज्ञान अर्जित करने की चाह वाले स्टूडैंट्स और उन के मांबाप सिर्फ बड़े एडवर्टाइज करने वाले कालेजों के प्रलोभन में न पड़ें. उन के   झूठे वादे कि हम बड़ी प्लेसमैंट देंगे के झूठे झांसे में न फंसें.

हमारा देश आज दुनिया के उन टौप देशों में शामिल है जहां टीचर्स गैरहाजिर होते हैं अर्थात वह अपना कार्य करने यानी बच्चों को पढ़ाने नहीं आते. एक सर्वे के अनुसार गैरहाजिरी का यह आंकड़ा 25% का है, जिस में स्कूल से ले कर छोटेबड़े सभी कालेज शामिल हैं.

अब यहां भी गौर करें. हाल ही में भारत में कुछ प्राइवेट यूनिवर्सिटीज एवं कालेज विशेष रूप से यूजीसी द्वारा गैरमान्यताप्राप्त या फर्जी घोषित किए गए संस्थानों पर मनी लौंड्रिंग का आरोप लगाया गया है. यह अकसर एडमिशन फीस के रूप में लिए गए धन का दुरुपयोग करते हैं, इनलीगल फीस वसूलते हैं या अवैध गतिविधियों के लिए फर्जी संस्थाओं के रूप में काम करते हैं या धन का हस्तांतरण अथवा हेराफेरी करते हैं. इन में अलफलाह विश्वविद्यालय (फरीदाबाद) और अन्य हाईप्रोफाइल मामले शामिल हैं. ईडी ने अलफलाह विश्वविद्यालय की क्व415 करोड़ से अधिक की मनी लौंड्रिंग के आरोप में जांच की है. यह यूनिवर्सिटी लालकिला बम ब्लास्ट के कारण निशाने पर आई है.

चौंकाने वाले आंकड़े

एक सर्वे में उत्तर प्रदेश में 20 से अधिक शिक्षण संस्थानों की जांच की गई, जिन पर आर्थिक रूप से कमजोर, अल्पसंख्यक और दिव्यांग छात्रों के लिए निर्धारित छात्रवृत्ति निधि यानी स्कौलरशिप फंड में से लगभग 75 करोड़ रुपए के गबन का आरोप है.

2023 की रिपोर्ट में यूजीसी ने 20 फर्जी यूनिवर्सिटीज की लिस्ट निकाली थी, जिस में 8 फर्जी यूनिवर्सिटीज सिर्फ दिल्ली की ही थी और उस के साथ आंध्र प्रदेश, केरल, वैस्ट बंगाल, महाराष्ट्र पांडिचेरी, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश भी शामिल है.

यह देखने की बात है कि किसी भी आम छोटी यूनिवर्सिटी में भी लगभग 500 से 2000 हजार बच्चे हर साल एडमिशन लेते हैं. तो अगर 20 यूनिवर्सिटीज ही फर्जी निकल जाएं तो भी 1 साल में कम से कम 20 से 50 हजार तक बच्चे एक फर्जी कालेज में अपना भविष्य गंवाते हैं और यह तो सिर्फ एक साल का अनुमानित आंकड़ा है. वास्तविकता तो इस से कहीं अधिक होगी क्योंकि यहां तो सिर्फ 20 यूनिवर्सिटीज पर अनुमान लगाया है.

वास्तव में तो अभी भी हमारे देश में ऐसी बहुत सी यूनिवर्सिटीज हैं जो सरकार से छिप कर या उस के साथ मिल कर बच्चों के भविष्य का मजाक बना रही हैं. यह भी   झूठ नहीं कि बहुत सी प्राइवेट यूनिवर्सिटीज और कालेज पैसे के दम पर   झूठी प्रमाणिकता अर्थात ग्रांट खरीदते हैं और इसी ग्रांट को देख कर स्टूडैंट्स इन कालेजों के   झांसे में फंसते हैं. इसलिए बच्चे, स्टूडैंट्स और उन के मांबाप कालेज का चयन सिर्फ उस की   झूठी शान, हाई रैंक या विज्ञापन देख कर न करें बल्कि उस की सचाई देख कर करें.

एडमिशन लेने से पहले कालेज जाएं. वहां की फैकल्टी को देखें. देखें कि उन का ऐक्सपीरियंस क्या है? थोड़ी रिसर्च करें. वहां पढ़ रहे स्टूडैंट्स से मिलें, उन से पूछें कि पढ़ाई कैसी है? कालेज के रिसोर्सेज, ऐजुकेशन पैटर्न, लाइब्रेरी, वातावरण यह सब देखें. जो स्टूडैंट्स वहां से पासआउट हो गए हैं उन से मिलें, पूछें कि इंटर्नशिप प्रोग्राम कैसा है? क्या हैल्प यूनिवर्सिटी देती है?

इन सभी बातों को जांचपरख कर अपना समय, पैसा और भविष्य इन कालेजों के हाथों में दें न कि सिर्फ इन की चकाचौंध देख कर.

फर्जीवाड़े से बचें

कालेज की हाई रैंकिंग, हाई प्रोफाइल आप के काम नहीं आएगा बल्कि उस की शिक्षा गुणवत्ता और उस का सत्यापन आप का भविष्य निर्धारित करेगा.

बड़े नामों वाले प्राइवेट कालेजों के फर्जीवाड़े से बचें और छोटा ही सही लेकिन सत्य प्रमाणिक कालेज का ही चयन करें. यहां चकाचौंध भले न हो लेकिन यह आप का भविष्य अंधकार में जाने से बचा लेगा.