हिमानी का सपना हमेशा ऐसे पेशे में जाने का था जहां वे संवाद कर सकें, लोगों से बात कर सकें और अपने विचारों को अपने तरीके से साझा कर सकें. उन्हें हमेशा लोगों के साथ जुड़ना, बातचीत करना और मंच पर रहना पसंद रहा, इसलिए वे अकादमिक क्षेत्र को अपने कैरियर के रूप में सब से ज्यादा पसंद करती थी क्योंकि यह उन की कम्युनिकेशन स्किल्स को और बेहतर करने का मौका प्रदान करता था.

पेश हैं, उन से की गई बातचीत के कुछ खास अंश:

बचपन और टीनऐज के वक्त आप अपने भविष्य को कैसे देखती थीं और क्या समय के साथ वह सोच बदली?

किशोरावस्था में मैं ने खुद को कभी भी एक शिक्षक के रूप में नहीं देखा था. मुझे हमेशा लगता था कि ऐजुकेशन मेरी स्किल्स का एक हिस्सा है, लेकिन मेरी पहचान एक मजबूत लेखिका और संवाद करने वाले व्यक्ति के रूप में थी. मेरी भाषा पर अच्छी पकड़ थी, लिखने में मैं उत्कृष्ट थी और लोगों से मिलनाजुलना, बातचीत करना मुझे बहुत पसंद था. सीखना मेरे लिए हमेशा बहुत महत्त्वपूर्ण रहा. मुझे पढ़ना और नई चीजों को जानना अच्छा लगता था. मेरे भीतर एक जिज्ञासा थी जो मुझे अलगअलग चीजें करने के लिए प्रेरित करती थी.

मगर एक किशोर के रूप में, जैसे हर युवा के साथ होता है मैं भी उस मोड़ पर खड़ी थी जहां यह तय करना चुनौतीपूर्ण होता है कि भविष्य में आगे किस दिशा में बढ़ना है. आज के समय में भी छात्रों के सामने यही सब से बड़ी चुनौती है. वे बहुत कुछ करना चाहते हैं लेकिन यह तय नहीं कर पाते कि किस दिशा में जाएं.

अपने कैरियर की शुरुआत मैं ने विज्ञापन के क्षेत्र से की, जहां मैं एक कौपीराइटर के रूप में 2 प्रतिष्ठित विज्ञापन एजेंसियों के साथ काम कर रही थी. उसी दौरान मैं ने अपनी एम.ए. की पढ़ाई भी पूरी की. उस समय तक मैं पूरी तरह से विज्ञापन के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए तैयार थी.

हालांकि, धीरेधीरे शिक्षा के क्षेत्र की ओर मेरा झुकाव बढ़ने लगा. जैसाकि मैं ने कहा मुझे संवाद करना और सीखना बहुत पसंद था. मेरे भीतर का अकादमिक पक्ष सक्रिय होने लगा और आखिर में मैं ने विज्ञापन के बजाय शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ने का निर्णय लिया.

आप ने विशेष रूप से इंगलिश साहित्य को अपने अध्ययन का विषय क्यों चुना?

मेरा मानना है कि इस की सब से बड़ी वजह मेरा पढ़ने का शौक था. बचपन से ही मैं बहुत पढ़ती थी, चंपक, नंदन, रीडर्स डाइजैस्ट जैसी पत्रिकाएं मेरी नियमित साथी थीं. जितना ज्यादा मैं पढ़ती, उतनी ही मेरी जिज्ञासा बढ़ती जाती. लोगों की संस्कृति, उन का जीवन, परंपराएं और उन के आपसी संबंध मुझे आकर्षित करते थे. इतिहास और कला के प्रति भी मेरा खास झुकाव था- चाहे भारतीय कला हो या यूरोपीय. प्रसिद्ध चित्रकारों और उन की कृतियों ने मुझे बहुत प्रभावित किया.

इन्हीं रुचियों ने मुझे साहित्य की ओर आगे बढ़ाया. बड़े होने पर साहित्य के सिद्धांतों को समझने में मेरी दिलचस्पी और गहरी होती गई.

मेरे अनुसार साहित्य तभी चुनें जब किसी को सच में पढ़ने का शौक हो और वह चीजों को गहराई से समझना चाहता हो. अगर कोई व्यक्ति यह जानने में रुचि रखता है कि परिवेश किस तरह कहानी को प्रभावित करता है, पात्र कैसे विकसित होते हैं और पृष्ठभूमि किस तरह स्टोरी को आकार देती है तभी उसे साहित्य के क्षेत्र में आना चाहिए.

किसी रचना का परिवेश और प्रस्तुति लेखक का दृष्टिकोण होता है लेकिन उसे हम कैसे समझते हैं, वह हमारा अपना नजरिया होता है. सब से प्रभावशाली कहानियां वही होती हैं जिन में हर पाठक अपने तरीके से जुड़ सके और उन का मजा ले सके.

यही बात मुझे साहित्य की ओर ले गई. मुझे लोगों की कहानियों और उन के नजरियों को समझना और उस कहानी में उतर कर उसे महसूस करना अच्छा लगता था.

आप ने कालेज के दौरान पढ़ाई से अलग कुछ ऐसा सीखा जो पढ़ाई से परे जा कर जीवनभर आप के साथ रहा?

कालेज ने मुझे बहुत कुछ सिखाया. खुद को हर हालात में ढालना, फ्लैक्सिबल बनना और देश के अलगअलग हिस्सों से आए लोगों के साथ सहज और मिलजुल कर रहना खासकर एम.ए. के दौरान मुझे विभिन्न राज्यों और पृष्ठभूमियों से आए छात्रों से मिलने का मौका मिला. एम.फिल में लोग कम मिलते थे क्योंकि पढ़ाई अधिक गहन होती है लेकिन एम.ए. का अनुभव बहुत अच्छा था.

ऐक्स्ट्रा करिकूलर ऐक्टिविटीज ने कैसे आप के आत्मविश्वास और लीडरशीप की क्षमता को निखारा?

ऐक्स्ट्रा करिकूलर ऐक्टिविटिज मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा रही हैं. मेरे पिता क्रिकेटर थे, इसलिए खेल हमारे जीवन में शुरू से ही शामिल था. मैं बचपन से ही पिता और भाई के साथ क्रिकेट खेलती थी. मैं बैडमिंटन खेलती थी, रनिंग, वाकिंग सब करती थी और ये सब अनुभव मेरे व्यक्तित्व को आकार देने में बहुत महत्त्वपूर्ण रहे हैं.

आज मेरा आत्मविश्वास विचारों की स्पष्टता और कई चीजों को संतुलित करने की क्षमता, यह सब कहीं न कहीं उन्हीं अनुभवों से आया है. मैं हर स्टूडैंट खासकर हर लड़की को यह जरूर कहूंगी कि वह पढ़ाई के साथसाथ इन गतिविधियों में भी हिस्सा ले.

क्या आप की शिक्षा ने आप को जीवन की असल चुनौतियों के लिए तैयार किया?

मेरी कोचिंग की मूल सोच एक जापानी फिलौसफी ‘मा’ पर आधारित है, जिस का अर्थ है पाज लेना, एक ठहराव बनाना, थोड़ा रुकना, पीछे हट कर अपने ऐक्शन के बारे में सोचना और फिर नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ना.

जब मैं अपने अनुभवों को देखती हूं तो महसूस होता है कि हम खासकर युवा हमेशा अगली चीज की ओर दौड़ते रहते हैं. हम जल्दीजल्दी आगे बढ़ना चाहते हैं लेकिन इस प्रक्रिया में रुक कर सोचने, सम?ाने और खुद को देखने का समय नहीं लेते.

मेरा मानना है कि जीवन में समयसमय पर ठहरना बहुत जरूरी है. हमें खुद से यह पूछना चाहिए कि हम कहां जा रहे हैं? भले ही वह एक साल या 2 साल का छोटा लक्ष्य ही क्यों न हो लेकिन उस पर स्पष्टता होनी जरूरी है.

क्विक इंट्रो

जन्मस्थान          :               दिल्ली.

ऐजुकेशन              :               लेडी श्रीराम कालेज से

अंग्रेजी साहित्य में स्नातक, हिंदू

कालेज से परास्नातक, भारतीय विद्या

भवन प्रबंधन विज्ञान संस्थान से

विज्ञापन में मास्टर्स, दिल्ली

विश्वविद्यालय से एमफिल, केंटकी

विश्वविद्यालय से सर्टिफिकेशन इन

ऐजुकेशनल टेक्नोलौजी, मिशिगन

स्टेट यूनिवर्सिटी से सर्टिफिकेशन इन

फोटोग्राफी और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से

स्कूल प्रबंधन और नेतृत्व में

प्रमाणपत्र.

प्रोफैशन :               परफौर्मेंस कोच, लीडरशीप ऐंड वैलनैस

ऐक्सपर्ट, ग्रीन और्किड वैलनैस की

संस्थापक, आईसीएफ (एमसीसी)

प्रमाणित कोच, हार्वर्ड प्रशिक्षित पेशेवर,

30+वर्षों का वैश्विक लीडरशीप अनुभव.

कैरियर टिप्स

साहित्य विषय तब ही चुनें जब पढ़ने और चीजों को गहराई से समझने की ललक हो.

ऐक्सट्रा करिकुलर ऐक्टिविटीज क्रिएटिविटी को नए आयाम देती हैं. इन्हें अपनी लाइफ का हिस्सा जरूर बनाएं.

किसी विषय को गहराई से समझना है तो प्रोफैशनल कोचिंग जौइन जरूर करें.