legal education : गृहशोभा की हमेशा से कोशिश रही है कि वह अपने पाठकों के सामने सही बात और अच्छा मार्गदर्शन रखे. आज अपनी उसी कोशिश को आगे बढ़ाते हुए स्टूडैंट्स की कैरियर गाइडैंस में हम दिल्ली हाई कोर्ट की एडवोकेट और फीडस ला चैंबर्स की फाउंडर ऐंड मैनेजिंग पार्टनर एडवोकेट श्वेताश्री मजूमदार से हुई एक चर्चा लाए हैं, जहां उन्होंने अपनी कैरियर जर्नी और ऐक्सपीरियंस के आधार पर स्टूडैंट्स के लिए खासकर ला स्टूडैंट्स के लिए बहुत सी गाइडैंस और एडवाइस सा झा की :
क्या आप अपनी लाइफ जर्नी की छोटीसी झलक देना चाहेंगी?
मेरा जन्म और परवरिश कोलकता में हुई. मेरे पिता इंजीनियर थे और मां टीचर. जब मैं 18 वर्ष की थी तब मैं ने औल इंडिया ऐंट्रैंस का ऐग्जाम दिया और मेरी सलैक्शन इंडिया के सब से बड़े ला कालेज नैशनल ला स्कूल में हुआ. आज अपने परिवार में मैं पहली वकील हूं.
हाई स्कूल में वह कौन से सब्जैक्ट्स थे जो आप के ला कैरियर में महत्त्वपूर्ण रहे?
जब मैं स्कूल में थी तब मेरे पास साइंस थी और मैं मैडिकल ऐंट्रैंस की तैयारी कर रही थी. तब मेरे एक मित्र ने अपने नैशनल ला स्कूल के बारे में बहुत सी अच्छी बातें लिख कर चिट्टियों के द्वारा बताया, जिस से मैं बहुत प्रभावित हुई और मैं ने आल इंडिया ऐंट्रैंस ऐग्जाम दिया और मेरा नैशनल ला स्कूल, बैंगलुरु में सलैक्शन हो गया. अब यहां मेरी माता के बड़ी भूमिका रही.
उन्होंने कहा कि जब तुम्हें लगता है कि तुम्हारा मैडिकल के टौप कालेज में चांस कम है और एक तरफ ला का सब से बड़ा कालेज तुम्हें बुला रहा है तो मैं कहूंगी कि तुम्हें ला स्कूल जाना चाहिए और मैं ने वह अवसर चुना और आज मैं इस फील्ड में सफल हूं.
मैं यही कहूंगी कि आप के पास सब्जैक्ट कोई भी हो लेकिन लगन और इच्छा पूरी है तो आप किसी भी सब्जैक्ट के साथ ला का चुनाव कर सकते हैं. जैसे मैं ने बायोलौजी पढ़ने के बाद भी ला की डिगरी की और अच्छा कैरियर हासिल किया.
साथ मैं यह भी कहूंगी कि आप का कुछ पढ़ा वेस्ट नहीं जाता. आज मैं अपनी साइंस की पढ़ाई अपने प्रोफैशन में बहुत चीजों की रिसर्च पर यूज करती हूं तो ऐसा नहीं है कि कोई साइंस कर के या कोई और सब्जैक्ट पढ़ कर ला नहीं कर सकता.
एक अच्छे कालेज का चयन कितना आवश्यक है?
कालेज का बहुत बड़ा रोल है और मैं यह एडवाइस करूंगी कि आप कालेज की रैंकिंग को नहीं बल्कि वहां की फैकल्टी को देखें. देखें उन का ऐक्सपीरियंस क्या है? उन्होंने अपनी फील्ड में क्या किया? उन का अपना पब्लिकेशन क्या है? आज मैं बहुत से कालेज की फैकल्टी से जब बातचीत करती हूं तो पाती हूं कि उन की नौलेज बहुत लिमिटेड है.
दूसरा जितना हो सके आप कालेज विजिट करो. इंडिया में अभी भी यह प्रैक्टिस नहीं है लेकिन बाहर के देशों में बच्चे कालेज में एडमिशन लेने से पहले उन्हें विजिट करते हैं जो बहुत जरूरी है. आप वहां जाए, वहां की लाइब्रेरी देखें, वहां का वातावरण देखें, वहां स्टूडैंट्स से कालेज और फैकल्टी के बारे में जाने, वहां की इंटर्नशिप, उन के टाईअप जाने.
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ला की पढ़ाई के साथ और कौन सी स्किल्स है जो ला स्टूडैंट्स में होनी चाहिए?
सब से पहले तो रीडिंग और राइटिंग. आज यह बहुत कम होता जा रहा है. यह तकलीफ की बात है कि अगर आप वकील बनना चाहते हैं और आप में रीड करने की हैबिट नहीं. जब रीडिंग अंडरस्टैंडिंग, रीडिंग नौलेज ही नहीं तो फिर आप मेंइंडिपैंडैंट थिंकिंग, थौट लीडरशिप कैसे डैवलप होगी. इस के बिना तो आप अंदर से खोखले रहोगे.
साथ ही राइटिंग. अपना काम, रिसर्च खुद लिखो. लीगल राइटिंग एक बहुत अच्छी स्किल है. अगर आप का लिखा पब्लिश हुआ तो वह आप के सीवी को भी और मजबूत करता है और लिखा हुआ प्रूफरीड करो.
आज बहुत से स्टूडैंट्स में प्रूफरीड की स्किल नहीं है. अपना काम अच्छे से प्रूफरीड करें. छोटीछोटी मिस्टेक, डिटेल्स मिस करना आप की परफौरर्मैंस पर असर डालता है क्योंकि अगर आप अपना काम अच्छे से नहीं करोगे तो किसी और का दिया काम कैसे बिना किसी गलती के करोगे.
किताबों का ला और असल ला प्रैक्टिस कितना अलग है?
किताबों का ला और प्रैक्टिकल ला दोनों बहुत अलग हैं. मैं ने जो किताबों में पढ़ा है उस का सिर्फ 15 से 20त्न की काम में लेती हूं बाकी मेरी स्किल्स हैं. क्लासरूम टीचिंग एक बौक्स की तरह है लेकिन रियल लाइफ में आप वह रूम तोड़ दो, साथ ही मैं ओपन बुक ऐग्जाम में विश्वास रखती हूं. आप को किताबों को याद करना नहीं बल्कि आप को जवाब कहां मिलेंगे, कहां उन्हें देखना है यह एक स्किल है.
वे स्टूडैंट्स जो कोर्ट में जाना चाहते हैं मैं उन से कहूंगी कि पहले कालेज में बहुत सी ऐक्टिविटीज होती हैं जैसेकि मूट कोर्ट उस में खुद को परखें. वहां आप को एक प्रौब्लम दी जाती है और एक कोर्ट की तरह आप को अपना केस सामने रखने, डिफैंड करने का मौका दिया जाता है. यह ऐक्टिविटी नैशनल, इंटरनैशनल लैवल की होती है. इस तरह की ऐक्टिविटीज में भाग लेने से आप की प्रैक्टिस बनती है.
एक ला स्टूडैंट के लिए सब्जैक्ट औप्शन और इंटर्नशिप कितना बड़ा रोल रहता है?
पहले तो सब्जैक्ट औप्शन की बारी ग्रैजुएशन के आखिरी 3-4 साल में आती है. पहले ही साल कोई स्टूडैंट यह नहीं डिसाइड कर सकता कि उसे कौरपोरेट वकील बनना है क्योंकि उस समय आप को उस सब्जैक्ट का कुछ ज्ञान ही नहीं है. आप को धीरेधीरे सम झ आता है कि आप का इंटरैस्ट कहां है, साथ ही एक वकील को सारे सब्जैक्ट की सम झ और पकड़ होनी चाहिए. सिलेबस गाइडैंस यही है कि आप को सारे ही लौ सब्जैक्ट पढ़ने हैं.
दूसरा इंटर्नशिप जरूरी है लेकिन आज इंटर्नशिप मिलना बहुत मुश्किल हो रहा है. यहां मु झे लगता है कि कालेज को आगे आना चाहिए. फर्म से मिलें, टाईअप करें ताकि उन के स्टूडैंट्स को इंटर्नशिप मिले.
सिर्फ किसी प्रोफैसर को लैटर लिखना कि मेरे स्टूडैंट को रख लो काफी नहीं. आज हजारों स्टूडैंट्स इंटर्नशिप के लिए घूम रहे हैं, साथ ही इंटर्नशिप किसी बड़ी जगह से की लेकिन वहां काम नहीं सिखाया गया तो उस इंटर्नशिप का कोई फायदा नहीं इसलिए फर्म भले छोटी मिले लेकिन काम रोज सिखाया जाए तो वह जगह सही है ताकि जब किसी रिक्रूटर के पास जाओ और वह आप से सवाल करे कि आप ने इंटर्नशिप में क्या सीखा? आप उस का जवाब दे पाओ.
कैरियर टिप्स
इंटर्नशिप के लिए फर्म ऐसी चुनें जहां रोज काम सीखने को मिले फिर चाहे वह फर्म छोटी ही क्यों न हो.
बुक्स में पढ़ाया गया ला और प्रैक्टिकल ला दोनों में बहुत अंतर है. इस फील्ड में डिबेटिंग स्किल्स इंप्रूव करना ही सफलता की चाभी है.
रीडिंग और राइटिंग पर काम करने से ही इंडिपैंडैंट थिंकिंग डैवलप होगी.

