Modern fiction author : यशोधरा लाल एक बैस्टसेलिंग लेखिका, कोच और थेरैपिस्ट हैं जो प्राइवेट प्रैक्टिस करती हैं. उन्होंने एसआरसीसी दिल्ली और आईआईएम बैंगलुरु (2002) से ग्रैजुएशन की है और 20 सालों से कौरपोरेट वर्ल्ड में ऐक्टिव हैं. वे एरिक्सन सौल्यूशन फाक्स्ड कोचिंग और ट्रांजैक्शनल ऐनालिसिस (सीटीए और पी टीएसटीए, साइकोथेरैपी) में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सर्टिफाइड हैं.
एक कपल्स काउंसलर के रूप में यशोधरा सैन फ्रांसिस्को के कपल्स इंस्टिट्यूट के साथ एडवांस्ड ट्रेनिंग और मैंटरशिप प्रोग्राम में हैं. यशोधरा एक टेडएक्स स्पीकर, फिटनैस इंस्ट्रक्टर और योगा प्रैक्टिशनर भी हैं. उन्हें लिखने का भी शौक है. उन की रचनाओं में बैस्टसेलर ‘जस्ट मैरिड,’ ‘प्लीज ऐक्सक्यूज’ (2012) और ‘हाउ आई बिकेम अ फार्मर्स वाइफ’ (2016) शामिल हैं. उन की लेटैस्ट रचना ‘व्हाट दे डौंट टैल यू अबाउट मैरिज’ (2026) थेरैपिस्ट और कपल्स के लिए रिश्तों को नैविगेट करने पर एक गाइड है. पेश है, उन से की गई बातचीत के मुख्य अंश :
क्या आप की अंडर ग्रैजुएट ऐजुकेशन ने आप के एमबीए के बाद के मार्केटिंग कैरियर में मदद की?
कुछ हद तक मैं कहूंगी हां मेरी अंडर ग्रैजुएट ऐजुकेशन यानी बी.कौम औनर्स ने शायद मुझे मार्केटिंग के कुछ ऐस्पैक्टस से जोड़ा. बिजनस, इकौनोमिक्स और मैथेमैटिक्स की मेरी बेसिक अंडरस्टैंडिंग ने मुझे ब्रैंडस मैनेज करने और प्रौफिटेबिलिटी के ऐस्पैक्ट्स को समझने में उपयोगी थी. मैं यंग जैनरेशंस से कहना चाहूंगी कि वह जो उसे रुचिकर लगता है उसे पढ़े बिना इस दबाव के कि यह उस के लंबे समय के कैरियर को कैसे प्रभावित करेगा.
मेरी नजर में सीखने की क्षमता, आलोचनात्मक सोच, अच्छी तरह से कम्युनिकेट करना, दूसरों से रियल कनैक्शन बनाना ये सभी अंतत: सफलता से अधिक जुड़े हुए हैं न कि स्पैसिफिक सब्जैक्ट जो आप पढ़ते हैं.
बी.कौम के बाद फाइनैंस रूट के बजाय आप ने मार्केटिंग क्यों चुना और क्या एमबीए की पढ़ाई जौब मार्केट में उपयोगी साबित हुई या यह मोस्टली थिऔरिटिकल ही थी?
इस स्टेज पर भी जो मेरी पहली नौकरी थी मुझे लगता है कि यह औप्शंस को खत्म करने की प्रक्रिया थी. मेरे एमबीए ने मुझे यह जानने के लिए ऐक्सपोजर दिया कि मैं कंसल्टिंग या इनवैस्टमैंट बैंकिंग में कैरियर नहीं बनाना चाहती थी और मार्केटिंग ने मेरी क्रिएटिव और कम्युनिकेटिव क्वालिटी को आकर्षित किया. मु?ो लगता है कि यूनिलीवर में मेरी समर इंटर्नशिप ने मुझे एहसास दिलाया कि मैं वास्तव में मार्केटिंग में कैरियर बना सकती हूं.
अब आप एक कपल्स काउंसलर के रूप में हैं. इस ऐजुकेशन चौइस के पीछे की वजह क्या थी?
लगभग 17 वर्षों तक कौरपोरेट जगत में रहने के बाद जिस में मैं ने कई कंपनियों (यूनिलीवर, हिंदुस्तान टाइम्स, डायसन, यम ब्रांड्स) में मार्केटिंग लीडर के रूप में काम किया, मैं ने खुद को असंतुष्ट पाया. यह ऐसा था जैसेकि मेरा एक सफल कैरियर होने के बावजूद मुझे यह काम अपने सच्चे मकसद से जुड़ा हुआ नहीं लगता था.
मैं ने पाया कि मैं अपनी टीम को मैंटर करने, ‘आर्गेनाइजेशनल पौलिसीज को औब्जर्व करने और व्यक्तियों और ग्रुप्स की साइकोलौजी को देखने और समझने में ज्यादा इंटरैस्टेड थी. इसलिए जब मैं ने एक कोचिंग सर्टिफिकेशन और बाद में 2020 में ट्रांजैक्शनल ऐनालिसिस के जरीए साइकोथेरैपी की डीप स्टडी की पौसिबिलिटी खोजी तो मैं ने खुद को एक थैरेपिस्ट के रूप में प्रैक्टिस करने हेतु रीऐजुकेट करने का कौन्फिडैंस पा लिया.
क्वालिफिकेशन होने के अलावा क्या ट्रेनिंग वास्तव में जौब में मदद करती है?
साइकोथेरैपिस्ट के रूप में ट्रेनिंग मेरे वास्तविक काम से डाइरैक्टली कोरिलेटेड है. मैं अब प्राइवेट प्रैक्टिस में हूं और पाती हूं कि अपनी ट्रेनिंग के दौरान सीखे गए फ्रेमवर्क्स और थियोरीज मेरे क्लाइंट्स के साथ काम करते समय काफी उपयोगी है. यह इसलिए है क्योंकि ट्रेनिंग के दौरान भी प्रैक्टिस पर बहुत जोर दिया गया था और हमें हमेशा अपने काम को ट्रांजैक्शनल ऐनालिसिस के संदर्भ में समझने के लिए प्रोत्साहित किया गया था.
एक सर्टिफाइड ट्रांजैक्शनल ऐनालिस्ट बनने के लिए एक एग्जाम होता है जो लिखित और ओरल दोनों है और यह आईटीएए द्वारा आयोजित किया जाता है जो ट्रांजैक्शनल ऐनालिस्ट का एक इंटरनैशनल और्गेनाइजेशन है.
एक काउंसलर के रूप में मेरा प्रशिक्षण सैन फ्रांसिस्को के कपल्स इंस्टिट्यूट में हुआ. मुझे भारत में कपल्स थेरैपी के लिए अच्छी ट्रेनिंग खोजने में व्यक्तिगत रूप से संघर्ष करना पड़ा इसलिए मैं ने इस के लिए विदेश जाने का फैसला किया. मैं ने कपल्स थेरैपी में लीडिंग एलिन बेडर और पीट पियर्सन में स्टडी की है. अमेरिका और भारत के बीच सांस्कृतिक अंतर के बावजूद उन का विकासवादी मौडल मौडर्न इंडियन कपल्स के लिए अत्यधिक उपयोगी है.
कौरपोरेट जौब और क्रिएटिव पैशन के बीच फंसे छात्रों के लिए आप कौन सी एक प्रैक्टिस या माइंडसैट की सिफारिश करेंगी?
एक माइंडसैट जो मैं सिफारिश करूंगी वह यह है कि कौरपोरेट जौब और क्रिएटिव पैशन को एकदूसरे के विपरीत न देखें. विभिन्न मौडल हैं. आप अपनी कौरपोरेट जौब के संदर्भ में बहुत सारी क्रिएटिव पैशन खोज सकते हैं. यदि नहीं तो आप इस संतुष्टि को पाने के लिए कंपनियों की भूमिकाएं बदलने पर विचार कर सकते हैं या आप अपनी कौरपोरेट नौकरी को अपने ‘क्रिएटिव स्पौंसर’ के रूप में देख सकते हैं या तो पर्याप्त कैपिटल जमा करें ताकि आप वास्तव में जो करना पसंद करते हैं उसे करने के लिए फाइनैंशियल फ्रीडम प्राप्त कर सकें या अपने जीवन को इस तरह से स्ट्रक्चर करें कि आप की नौकरी आप के बिल्स को पे करे और आप की होब्बीज को स्पौंसर करे.
मेरा मानना है कि फाइनैंसियल स्टैबिलिटी और कैरियर सैटिस्फैक्शन दोनों को बैलेंस किया जा सकता है लेकिन प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह अलग है. अपना रास्ता खोजें, दूसरों से प्रेरणा लें लेकिन किसी और की नकल करने की कोशिश न करें.
यदि कोई थेरैपिस्ट के रूप में कैरियर बनाना चाहता है तो आप उस की ऐजुकेशनल जर्नी पर क्या सलाह देंगी?
मैं कहूंगी कि अगर कोई वास्तव में इस रास्ते पर आना चाहता है तो बैचलर और मास्टर्स स्तर पर साइकोलौजी की पढ़ाई करना महत्त्वपूर्ण हो सकता है. इस के अलावा मैं अभी भी कहूंगी कि अपनी जर्नी के दौरान भी नई स्किल्स सीखने के लिए खुले रहना चाहिए. आप का सीखना एक जीवनभर की प्रक्रिया होगी. एक तेजी से बदलते ग्लोबल और डिजिटल वर्ल्ड में ट्रेनिंग या स्टडी के लिए देश के बाहर जाने के लिए भी तैयार रहें.

