जिस क्षणिक सुख के लिए वह अपनी पत्नी अनुराधा को छोड़ संगीता के प्यार में पागल था, वहीसंगीता उसे गहरी मुसीबत में डालने की योजना बना रही है… अपनी प्रेमिका संगीता के साथ उस के फ्लैट में घंटाभर गुजारने के बावजूद नीरज का मूड उखड़ा सा ही बना रहा. उस ने न मौजमस्ती करने में रुचि ली, न खानेपीने में.‘‘जो घट चुका है उस के बारे में सोचसोच कर दिमाग खराब करना नासम झी है, स्वीट हार्ट. आज तो तुम्हें ढंग से मुसकराता देखने को तरस गई हूं मैं,’’
नीरज के बालों में प्यार से हाथ फिराते हुए संगीता ने शिकायत सी करी.‘‘उस बेवकूफ लड़की ने बिना बात नौकरी से त्यागपत्र दे कर दिमाग खराब कर दिया है. अरे, 75 हजार की नौकरी अपनी जिद के कारण छोड़ देने की क्या तुक हुई?’’ नीरज अपनी पत्नी अनुराधा के बारे में बोलते हुए एक बार फिर से भड़क उठा.नीरज और अनुराधा की शादी एक तरह से प्रेमविवाह था.
वह उसे लखनऊ में अपने चाचा की बड़ी बेटी की शादी में मिला था. उस की चचेरी बहन की सहेली थी अनुराधा, पढ़ने में तेज, सुंदर पर रहने में बिलकुल सिंपल. शादीमें भी वह बिलकुल साधारण कपड़ों में थी पर सारी सहेलियां उस की इज्जत करती थीं क्योंकि वही सब को हर साल पढ़ा कर ऐग्जाम में पास कराती थी. उसे एमवीए में आसानी से एडमिशन मिल गया था पर उस का पहनावा, रंगढंग नहीं बदला था.नीरजके मांबाप को वह बहुत पसंद आई थी. नीरज सामने अपनी प्रेमिका संगीता का भूत चढ़ा था पर कई बार कहने पर भी वह शादी को तैयार नहीं हुई थी. जब संगीता को अनुराधा का पता चला तो उस ने एकदम नीरज को शादी करने को कहा और सम झाया कि सीधीसादी पत्नी होगी तो वे दोनों अपनी जिंदगी इसी तरह प्रेम रस में डूब कर चलाते रहेंगे.
फिर अनुराधा दिल्ली आ गई शादी कर के. नीरज के मातापिता लखनऊ में रहते थे. अनुराधा को अच्छी नौकरी मिल गई और उन का एक बेटा भी हो गया. उसे संगीता के बारे में पता चल गया था पर 1-2 बार बोल कर चुप रह गई. उस का सारा पैसा हर माह नीरज तो लेता था.‘‘वैसे है तो यह हैरानी की बात कि तुम्हारी सीधीसादी पत्नी ने इतना महत्त्वपूर्ण फैसला तुम से बिना सलाह किए हुए ले लिया.’’
‘‘दिमाग में भूसा भरा है उस बेवकूफ के.’’‘‘मु झे लगता है कि जब कुछ दिनों के बाद उस का घर में रहने का शौक पूरा हो जाएगा, तो वह बोर हो कर फिर से नौकरी करने लगेगी.’’‘‘अब उस ने कभी नौकरी करने का नामभी लिया मेरे सामने तो मैं उस का सिर फोड़दूंगा.
अब तो सारी जिंदगी रसोई में ही खटना पड़ेगा उसे.’’‘‘जब तुम ने ऐसा फैसला कर ही लिया है, तो फिर इतना गुस्सा क्यों हो रहे हो? मेरा कुसूर क्या है जो तुम सप्ताह में 1 बार मिलने वाले प्यार करने के इस मौके को अपना मूड खराब रख कर गंवा रहे हो?’’संगीता की आंखों में उभरे उदासी के भावों को नीरज ने फौरन पकड़ा. अपनी चिड़ व गुस्से को भुलाते हुए उस ने संगीता को अपने नजदीक खींच लिया.अपनी प्रेमिका के सुडौल बदन से उठ रही महक को मादक एहसास फौरन ही उस के रोमरोम को उत्तेजित करने लगा. प्यार के मामले में संगीता उस की हर जरूरत, रुचि और खुशी को पहचानती थी.
अगले 1 घंटे तक उस के जेहन में अपनी पत्नी अनुराधा से जुड़ा कोई खयाल पैदा ही नहीं हो पाया.वह करीब 10 बजे अपने घर पहुंचा. अपनी पत्नी पर नजर पड़ते ही उस का दिमाग फिर से भन्ना उठा.‘‘कैसा लगा आज सारा दिन घर में बिताना. जरा मैं भी तो सुनूं कि किस महान कार्य को निबटाया है तुम ने घर बैठने के पहले दिन?’’
नीरज के लहजे से साफ दिख रहा था कि वह अनुराधा से झगड़ा करने के लिए पूरी तरह से तैयार है.अनुराधा ने लापरवाही से जवाब दिया, ‘‘छोटेछोटे कामों से फुरसत मिलती, तो ही किसी महान कार्य को करने की सोचती न. वैसे एक बात जरूर सम झ में आ गई.’’‘‘कौन सी?’’
‘‘पहले तुम मेरे औफिस से लौटने का इंतजार करते थे और आज वही काम मु झे करना पड़ा. इस में कोई शक नहीं कि इंतजार करते हुए वक्त के खिसकने की रफ्तार बड़ी धीमी प्रतीत होती है. कहां अटक गए थे?’’ ‘‘पहले ही दिन से किसी बेवकूफ गृहिणी की तरह पूछताछ शुरू कर दी न,’’
नीरज की आवाज में व्यंग्य के भाव उभरे.‘‘तुम छिपाना चाहते हो, तो छिपा लो,’’ लापरवाही से कंधे उचकाने के बाद अनुराधा रसोई की तरफ चली गई.गुस्से से भरे नीरज ने खाना खाने से इनकार कर दिया. वैसे उसे भूख भी नहीं थी क्योंकि उस ने संगीता के साथ पिज्जा खा रखा था.खामोश बनी अनुराधा जल्द ही अपने6 वर्षीय बेटे रोहित के साथ सोने चली गई.
नीरज ने मोबाइल खोला और सोफे पर थकाहारा सा पसर गया.मोबाइल या टीवी में आ रहे किसी भी कार्यक्रम को देखने में उस का मन नहीं लग रहा था. मन की चिंता व बेचैनी के चलते उस की आंखों में नींद की खुमारी आधी रात के बाद ही पैदा हुईर्.अगले दिन रविवार की छुट्टी थी. इसी दिन से नीरज की परेशानियों और मुसीबतों का लंबा सिलसिला आरंभ हो गया.अनुराधा ने स्वादिष्ठ गोभी व आलू के पकौड़ों का नाश्ता उसे कराया. रोहित के साथ खेलते हुए वह काफी खुश नजर आ रह थी. नीरज की नाराजगी भरी खामोशी उस के जोश और उत्साह को कम करने में नाकामयाब रही थी.
सुबह 11 बजे के करीब अनुराधा ने उसे महीने भर के सामान की लंबी लिस्ट पकड़ा दी.‘‘इस का मैं क्या करूं?’’ नीरज ने चिड़कर पूछा.‘‘बाजार जा कर सब खरीद लाइए, हुजूर,’’ अनुराधा ने मुसकराते हुए जवाब दिया.‘‘मैं ने यह काम पहले कभी नहीं किया है, तो अब क्यों करूं?’’ ‘‘मैं घर का सारा काम संभालूंगी तो बाहर के कामों की जिम्मेदारी अब आप की रहेगी.’’
‘‘ये सब मु झ से नहीं होगा.’’ ‘‘घर में सामान के आए बिना खाना कैसे बनेगा, वो मु झे जरूर सम झा देना,’’
कह कर अनुराधा रोहित के साथ लूडो खेलने लगी.‘‘मैं ही मरता हूं,’’ नीरज झटके से उठ खड़ा हुआ, ‘‘सामान लाने के लिए रुपए दे दो.’’‘‘रुपए मेरे पास कहां से आएंगे अब?’’‘‘क्यों? तुम्हें पगार तो मिली है न?.’’‘‘मिली है और मैं ने 8 साल लगातार जो नौकरी करी है उस की आखिरी पगार को मैं ने अपने व रोहित के जरूरी कामों के लिए बचा कर रखने का फैसला किया है.’’‘‘इस बार तो यह खर्चा तुम ही उठाओ.’’‘‘सौरी, डियर.’’‘‘गो टू हैल,’’ नीरज जोर से चिल्लाया और फिर फर्श को रौंदता हुआ बाजार जाने को घर से निकल गया. अगले शनिवार की शाम को जब वह संगीता से मिला, उस समय तक उस की चिंताएं व तनाव जरूरत से ज्यादा बढ़ चुके थे.वे दोनों एक महंगे होटल में डिनर कर रहे थे, लेकिन नीरज स्वादिष्ठ भोजन का आनंद लेने के बजाय अपनी पत्नी की बुराइयां करने में ज्यादा ऊर्जा बरबाद कर रहा था.‘‘कार और फ्लैट की किश्तें… घर का सामान इधर अखबार का खर्चा, रोहित कीफीस. बिजलीपानी का बिल, ये सब खर्चे मु झे पिछले हफ्ते में करने पड़े हैं, संगीता. मेरी सारी पगार उड़नछू करवा दी है उस पागल ने,’’ इन बातों को याद कर के नीरज बुरी तरह से जलभुन रहा था.
