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विशाल ने घुटनों पर बैठते हुए उसे प्रोपोज किया तो लक्षिता समझ नहीं पा रही थी कि सौगात पर हंसे या रोए. असमंजस में उलझ वह विशाल को भी असमंजस में उलझ छोड़ कर डाइनिंगहौल से बाहर निकल आई.

‘यह आज की पीढ़ी भी न. सपनों में ही जीती है. अरे सपनों से परे समाज भी तो होता है न? उस ने भी तो संसार के सफल संचालन के लिए कुछ नियम बनाए ही हैं. हां, जरूरी नहीं कि ये नियम सब को रास आएं ही, लेकिन नियम किसी एक व्यक्ति की खुशी या सुविधा को

ध्यान में रख कर तो नहीं बनाए जा सकते न?’ लक्षिता कैब में बैठी मन ही मन खुद को

समझने का प्रयास कर रही थी. रातभर विशाल के प्रश्नों के जवाब ही तैयार करती रही. वह जानती थी कि विशाल सवालों की लिस्ट लिए उसे औफिस के मुख्य दरवाजे पर ही खड़ा मिलेगा. लेकिन विशाल को इतना चैन कहां.

उस ने तो सुबहसवेरे ही लक्षिता के घर की घंटी बजा दी.

‘‘आज के दौर के बदलाव को देखते हुए बात करें तो मेरे और तुम्हारे बीच पूरी एक पीढ़ी का फासला कहा जा सकता है. समझ रहे हो न तुम? उम्र का यह फासला बहुत माने रखता है विशाल,’’ लक्षिता ने उसे चाय का कप पकड़ाते हुए कहा, लेकिन उस के तो रोमरोम पर जैसे इश्क तारी था.

लक्षिता से झगड़ ही पड़ा, ‘‘प्यार हर फासले को पाट देता है,’’ कुछ संयत होने के बाद उसने लक्षिता के दोनों हाथ पकड़ लिए.

लक्षिता उन आंखों की तरलता को सहन नहीं कर सकी. वह पिघलने लगी. न केवल पिघली बल्कि वह तो विशाल के प्रेम प्रवाह में बह ही गई. बहतीबहती इतनी दूर निकल आई कि किनारे न जाने कहां पीछे छूट गए.

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