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बहुत देर उस के पास मैं चुप बैठा रहा. वह इसे समझ रही थी. बाद में शायद दूसरी बार उस के हाथों को अपने हाथों में ले कर मैं ने कहा, ‘नहीं, कुछ ऐसा मत सोचो. सब ठीक हो जाएगा.’

पर वह फिर फफकफफक कर रोने लगी. मैं उसे देखता रहा और मैं कुछ कह नहीं सका. इस तरह बैठेबैठे जब बहुत रात हो गई तो उस ने ही कहा, ‘जाओ. घर पर रमा चिंता कर रही होगी. बहुत रात हो गई है.’

और जब घर आया तो रात के 2 बज रहे थे. रमा इंतजार कर रही थी. उस ने कहा, ‘बहुत देर कर दी. सब ठीक तो है न?’

मैं ने कहा, ‘अनिता से मिल कर आने में देरी हो गई.’

और फिर रमा को मैं ने अनिता के बारे में सब कुछ बताया. उस रात हम दोनों बिना कुछ खाए ही लेट गए. रात भर हमें नींद नहीं आई. मैं अनिता के बारे में ही सोचता रहा. उस के जीवन का अंत इस तरह होगा, इस की कभी मैं ने कल्पना तक नहीं की थी.

2 दिन बाद कुछ मित्रों की सहायता से उसे निर्मला अस्पताल में ऐडमिट करा जब चलने को हुआ तो उस ने मेरी ओर बड़ी करुणा से देखा. बहुत दर्द था उस में. मैं ने कहा, ‘इस ऐडवांस स्टेज में तुम जानती हो कुछ नहीं हो सकता. यहां रहोगी तो कोई पास तो होगा, कम से कम छोटीमोटी जरूरतों के लिए.’

उस ने कुछ नहीं कहा. धीरे से उस ने अपनी पलकें उठाईं. पलकें उठाते ही वहां से आंसू ढलकते देख मेरी आंखें भर आईं. मैं कुछ देर बैठा रहा. चलने को हुआ तो उस ने कहा, ‘अमित कैसा है?’

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