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लेखिका-  रेणु सिंह

‘‘क्या... पुलिस हमारे घर... क्यों... क्या हुआ?’’

‘‘क्या हुआ? नाक कटा दी तू ने हमारी और भोला बन कर पूछ रहा है क्या हुआ? कहां है वह लड़की?’’ पापा ने जोर से एक थप्पड़ मार कर पूछा.

‘‘क... कौन लड़की? क्या किया है मैं ने?’’

‘‘नाटक कर रहा है? मैं ने क्या समझा था तुझे और तू क्या निकला. रोमा कहां है? कहां छिपाया है तू ने उसे?’’ तूफान की तरह कमरे में संजीव घुसा और उसे घसीटते हुए कमरे से बाहर ले गया. बाहर का दृश्य देख कर कुंदन के पैरों तले जमीन खिसक गई.

बरामदे में इंस्पैक्टर 2 सिपाहियों के साथ खड़ा था. रोमा की मां जलती नजरों से उसे घूर रही थी. उस का परिवार घबरायासहमा सा खड़ा था और पूरा महल्ला उस के गेट पर खड़ा अंदर झांक रहा था.

‘‘इंस्पैक्टर साहब, गिरफ्तार कर लीजिए इसे. इस ने मेरी बेटी को फुसला कर घर से भगा लिया है. जाने कहां छिपा दिया है उसे. रात को वह घर नहीं लौटी. मोबाइल भी बंद है उस का और जिस सहेली के घर जाने के बहाने यह उसे ले गया, वह कहती है कि रोमा उस के घर आई ही नहीं. जाने किस हाल में है मेरी बेटी. कहां रखा है तू ने उसे?’’ रोमा की मां गरजी.

‘‘म... मैं ने कहीं नहीं रखा. मैं तो कल उसे नर्मदा के घर दयाल कालोनी छोड़ कर वापस आ गया था.’’

‘‘झूठ बोलता है ये. नर्मदा दयाल कालोनी नहीं इंद्रपुर में रहती है. कहीं इस ने गहनों और पैसों के लालच में उसे मार तो नहीं दिया?’’ संजीव ने पूछा.

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