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माहौल बिगड़ता देख सुनीता ने रश्मि को समझाते हुए कहा, ‘‘रश्मि इस में इतना नाराज होने की बात नहीं है. जो परंपराएं सदियों से चली आ रही हैं उन्हें तोड़ना इतना आसान नहीं होता. कुछ ही दिनों की तो बात है. निभा लेंगे जितना निभा सकेंगे. तुम हमारे लिए परेशान मत हो.’’

‘‘यही तो त्रासदी है भाभी हम लोगों की. हमआप जैसे पढ़ेलिखे लोग भी इन परंपराओं से सहमत न होते हुए भी ‘कुछ ही दिन की तो बात है’ सोच कर निभाते चले जा रहे हैं. अगर हम साहस नहीं करेंगे इन्हें तोड़ने की शुरुआत आखिर कौन करेगा?’’ रश्मि बोली.

‘‘अच्छा अभी यह बहस करने का समय नहीं है. अभी चलो यहां से. भैया लोगों को आने दो फिर बैठ कर समस्याओं का निदान करते हैं कि क्या और कैसे करना है,’’ सुनीता ने बात बदलते हुए कहा.

5 बजतेबजते घर के पुरुष सदस्य अंतिम संस्कार कर के वापस आ गए. ताईजी और बुआजी की चलती तो वे उन्हें बाहर ही नहाए बिना घर में प्रवेश नहीं करने देतीं. मगर कोई गुंजाइश न देख कर चुपचाप बैठी रहीं.

शाम हो आई थी. बच्चे अपनीअपनी मां के इर्दगिर्द कुछ खाने की इच्छा जताते हुए घूम रहे थे. सुनीता और अनामिका असमंजस की स्थिति में पड़ी हुई थीं. चूल्हा जलाने की इजाजत है नहीं और छोटेबड़े सभी भूख से बेहाल हो रहे हैं और वे लाचार थीं कि करें तो क्या करें.

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महानगरीय जीवन में सदियों पुरानी परंपराओं के साथ तालमेल बैठा पाना और उसे निभा पाना किसी हाल में संभव नहीं हो पा रहा था. इस समय गांव में होतीं तो अब तक सचमुच अड़ोसपड़ोस और आसपास के रिश्तेदारों के यहां से इतना कुछ बन कर आ गया होता कि उन्हें किसी के खाने की कोई चिंता न रहती और अपने लोगों का उबला खाना वे बना लेतीं, कैसे भी.

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