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पिछला भाग- लंबी कहानी: कुंजवन (भाग-9)

पर उस दिन रात भर वो सो नहीं पाए. आधी रात के बाद वो मोबाइल पर दबे गले से किसी से बात करते रहे. सुबह नाश्ता करते समय जानकीदास सामान्य लग रहे थे. बंटी के धमकी के विषय में उन्होंने कोई बात नहीं उठाई. यों ही साधारण बातें कर रहे थे. तनाव भी नहीं था उन के मुख पर. शिखा थोड़ी अवाक हुई. कल रात भी जब सोने गए थे तब भयानक तनाव में थे शिखा को चिंता थी कि कहीं उन की तबियत ना खराब हो जाए पर इस समय उन को देख लग ही नहीं रहा कि उन को कुछ भी चिंता है. चैन की सांस ली उस ने. हलकीफुलकी बातों के बीच में ही अचानक उन्होंने प्रश्न किया,

‘‘बेबी, क्या तू जानती है कि सुकुमार कहां है.’’ अवाक हुई शिखा. उस दिन की घटना को 5 वर्ष बीत गए. दादू ने कभी सुकुमार का नाम तक नहीं लिया और आज अचानक. उस ने अवाक हो दादू को देखा.

‘‘मैं...मुझे क्या पता दादू? मैं ने वचन दिया था कि उस से संपर्क नहीं रखूंगी.’’

बात संभालते जानकीदास ने कहा.

‘‘नहीं... कहीं रास्ते में या बाजार में दिखाई पड़ा हो.’’

‘‘ना दादू. कहीं नजर नहीं आया. आता तो बताती.’’

‘‘लड़का कहां खो गया.’’

‘‘खो ही गया होगा. इस शहर में उस के लिए है ही क्या. पर दादू आज इतने दिनों बाद उस की याद?’’

‘‘संकट की घड़ी में ही कोई भरोसे की जगह खोजता है.’’

‘‘वो होता भी तो इन बदमाशों से नहीं भिड़ पाता पर हां मेरा मनोबल बढ़ जाता.’’

‘‘बेटा अब तुझे फैसला लेना ही होगा. मेरी ढलती उम्र है किसी भी दिन चला जाऊंगा और तू इतने बड़े संसार में इतने बड़े कारोबार के साथ एकदम अकेली तेरे पापा को भी क्या जवाब दूंगा.’’

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