पूर्णिमा मायके चली जरूर गई थी, लेकिन उस का मन इंद्र पर ही टिका रहा. सोच रही थी कि अब तो वह आजाद पंछी की तरह रहेगा. पता नहीं वह क्या करता होगा. मन नहीं माना तो उस ने इंद्र को फोन लगाया.

‘‘कौन?’’ उधर से आवाज आई.

‘‘अब तुम्हें मेरी आवाज भी पहचान में नहीं आ रही.’’ पूर्णिमा ने उखड़े स्वर में कहा.

‘‘पूर्णिमा, तुम से बाद में बात करूंगा.’’ कह कर इंद्र ने काल डिसकनेक्ट कर दी.

इस दरमियान उस के कानों में कुछ ऐसी आवाजें आईं मानो कोई पिक्चर चल रही हो. घड़ी की तरफ देखा, शाम के 5 बज रहे थे. शक के कीड़े फिर कुलबुलाए. इंद्र कहीं अपनी उसी सहकर्मी के साथ पिक्चर तो नहीं देख रहा. सोच कर पूर्णिमा की बेचैनी बढ़ गई. पूर्णिमा की मां की नजर उस पर पड़ी, तो वह बोलीं, ‘‘यहां अकेले क्यों बैठी हो?’’

‘‘तो कहां जाऊं?’’ पूर्णिमा झल्लाई.

‘‘जब से आई हो परेशान दिख रही हो. इंद्र से कुछ कहासुनी तो नहीं हो गई.’’ मां ने पूछा.

‘‘हांहां, मैं ही बुरी हूं. झगड़ालू हूं.’’ पूर्णिमा रुआंसी हो गई. मां ने करीब आ कर स्नेह से उस के सिर पर हाथ फेरा तो वह शांत हो गई.

पूर्णिमा को मायके में रहते 15 दिन हो गए. इस बीच एक दो बार इंद्र का फोन आया लेकिन मात्र औपचारिकता के लिए. एक दिन पूर्णिमा की सास का फोन आया, ‘‘पूर्णिमा, कब आ रही हो?’’

‘‘मम्मीजी, मैं जानती हूं आप को मेरी फिक्र है, लेकिन इंद्र ने एक बार भी नहीं कहा कि आ जाओ. जब उसे मेरी जरूरत ही नहीं है तो मैं आ कर क्या करूंगी.’’ पूर्णिमा ने कहा.

‘‘ऐसे कैसे हो सकता है, उस ने तो तुम्हें कई बार फोन किए.’’ सास बोलीं.

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‘‘वह तो कह रहा था कि तुम आने के लिए तैयार नहीं हो.’’

सास की बात सुन कर पूर्णिमा तिलमिला गई. अब इंद्र झूठ भी बोलने लगा था. काफी सोचविचार कर पूर्णिमा ने वापस ससुराल जाने का मन बनाया. इंद्र के मन में क्या चल रहा है, यह जानना उस के लिए बेहद जरूरी था. वह अपनी ससुराल चली गई.

इंद्र ने अचानक आई पूर्णिमा को देखा तो अचकचा गया. बोला, ‘‘बताया होता तो मैं लेने आ जाता.’’

‘‘तुम्हें फुरसत हो तब न?’’ पूर्णिमा के चेहरे पर व्यंग्य की रेखाएं खिंच गईं.

इंद्र ने पूर्णिमा को मनाने की कोशिश की, ‘‘आज शाम को पिक्चर चलते हैं.’’

‘‘नहीं जाना मुझे पिक्चर.’’ वह बोली.

‘‘जैसी तुम्हारी मरजी.’’ कह कर इंद्र अपने दूसरे कामों में लग गया.

एक रात इंद्र गंभीर था. पूर्णिमा को अहसास हो गया था कि उस के मस्तिष्क में कुछ चल रहा है. उस वक्त पूर्णिमा कोई किताब पढ़ रही थी. लेकिन बीचबीच में इंद्र के चेहरे पर आतेजाते भावों को चोर नजरों से देख लेती थी.

‘‘पूर्णिमा, मैं अंजलि से शादी करना चाहता हूं.’’ इंद्र का इतना कहना भर था कि पूर्णिमा की जिंदगी में भूचाल सा आ गया. उस ने किताब एक तरफ रखी, ‘‘मेरा शक ठीक निकला. अंजलि नाम है न उस का. बहुत खूब.’’ पूर्णिमा हंसी.

इस हंसी में रोष भी था तो बेवफाई की एक गहरी पीड़ा भी, जिस का अहसास सिर्फ उस स्त्री को ही हो सकता है, जिस ने पति को देवता मान कर अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया हो.

‘‘तुम ऐसा सोच भी कैसे सकते हो? अभी मैं जिंदा हूं.’’ वह बोली.

‘‘काफी सोचविचार कर मैं ने यह फैसला लिया है.’’ इंद्र ने कहा, ‘‘डाक्टर ने साफ कह दिया है कि तुम्हारे मां बनने की संभावना क्षीण है.’’

‘‘नहीं बनूंगी. मगर इस घर में सौतन कभी नहीं आएगी. कैसी बेगैरत लड़की है. एक शादीशुदा मर्द को फंसाया और तुम कैसे पुरुष हो जिस ने लाज, शरम, सब को ताक पर रख कर एक लड़की को जाल में फांस लिया.’’

‘‘वह स्वयं तैयार है.’’

‘‘मैं तुम से बहस नहीं करना चाहता. बात काफी बढ़ चुकी है. वह पेट से है.’’

‘‘बगैर शादी के?’’ वह चौंकी.

‘‘उस की इजाजत तुम से चाहता हूं.’’

‘‘न दूं तो?’’

‘‘तुम्हारी मरजी. अगर तुम मां बन सकती तो यह नौबत ही नहीं आती.’’

‘‘सोचो, अगर तुम बाप नहीं बन पाते और मैं यही रास्ता अपनाती, तब क्या तुम मुझे ऐसी ही इजाजत देते?’’ इंद्र के पास इस का कोई जवाब नहीं था.

पूर्णिमा की मनोदशा अब एक परकटे परिंदे की तरह हो गई. जब कुछ नहीं सूझा तो वह गुस्से में बोली, ‘‘बताओ, तुम ने मेरे साथ इतना बड़ा धोखा क्यों किया? क्यों मेरे अस्तित्व को गाली दी? क्या सोचा था कि मेरी नाक के नीचे व्यभिचार करोगे और मैं चुप बैठी रहूंगी.’’

‘‘तो जाओ चिल्लाओ. कुछ मिलने वाला नहीं है.’’ इंद्र भी ढिठाई पर उतर आया.

‘‘अगर न चिल्लाऊं तो?’’

‘‘बड़ी मां का दरजा मिलेगा.’’ इंद्र ने कहा.

‘‘तुम्हारी उस रखैल के बच्चे की बड़ी मां का दरजा घिन आती है मुझे उस के नाम से.’’ इंद्र ने गुस्से में पूर्णिमा को मारने के लिए हाथ उठाया.

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‘‘खबरदार, जो मुझे हाथ भी लगाया.’’ पूर्णिमा के तेवर देख कर इंद्र ने हाथ पीछे खींच लिया. उस रात जो कुछ हुआ, उस से पूर्णिमा का मन व्यथित था. सुबह उस का किसी काम में मन नहीं लगा. वह बीमारी का बहाना बना कर लेटी रही. इंद्र औफिस चला गया तब उठी. सास ने पूर्णिमा का हाल पूछा.

डायनिंग कुरसी पर बैठी पूर्णिमा बोली, ‘‘मांजी, इंद्र दूसरी शादी करना चाहता है. क्या आप इस के लिए तैयार हैं?’’

कुछ पल सोच कर वह बोलीं, ‘‘यह इंद्र का निजी मामला है, इस में मैं कुछ नहीं कर सकती.’’

‘‘इस का मतलब इंद्र के इस फैसले पर आप को कोई आपत्ति नहीं है?’’ पूर्णिमा ने पूछा.

‘‘देखो पूर्णिमा, हर आदमी बाप बनना चाहता है. उस ने भरसक प्रयास किया. जब डाक्टरों ने तुम्हारे बारे में साफसाफ कह दिया. तो वह जो कर रहा है उस में मैं कुछ भी नहीं कर सकती.’’

‘‘ऐसे कैसे हो सकता है कि एक छत के नीचे मेरी सौत रहे?’’

‘‘यह तुम्हें सोचना होगा. रही मानसम्मान की बात, तो मैं जब तक रहूंगी तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी.’’

‘‘न रही तब?’’ पूर्णिमा ने कहा तो सास ने कोई जवाब नहीं दिया.

इंद्र औफिस से देर से आया. आने के बाद कपड़े उतार कर बिना खाएपीए बिस्तर पर पड़ गया. पूर्णिमा सोच रही थी कि किस हक से इंद्र से मनुहार करे. पर मन नहीं माना.

‘‘खाना लगा दूं?’’

‘‘मैं खा कर आया हूं.’’ सुनते ही पूर्णिमा का पारा चढ़ गया. क्योंकि वह जानती थी कि खाना किस के साथ खाया होगा. गुस्से में पूर्णिमा भी बिना खाएपीए अलग बिस्तर लगा कर सोने चली गई.

नींद आने का सवाल ही नहीं था. बारबार मन एक ही बात पर आ टिकता. इंद्र के बारे में उस ने जैसा सोचा था, वह उस से अलग निकला. उसे सपने में भी भान नहीं था कि वह ऐसा कदम भी उठा सकता है.

‘‘क्या सोचा है तुम ने?’’ इंद्र का स्वर अपेक्षाकृत धीमा था.

‘‘जब तुम ने फैसला ले ही लिया है तो मैं कुछ नहीं कर सकती. पर इतना जरूर बता दो कि मेरी इस घर में क्या स्थिति होगी? स्वामिनी या नौकरानी. अर्द्धांगिनी तो अब कोई और कहलाएगी.’’ पूर्णिमा भरे मन से बोली.

‘‘तुम्हारा दरजा बरकरार रहेगा?’’ इंद्र का चेहरा खिल गया.

‘‘रात का बंटवारा कैसे करोगे?’’ पूर्णिमा के इस अप्रत्याशित सवाल पर वह सकपका गया. जब कुछ नहीं सूझा तो उलटे उसी पर थोप दिया.

पूर्णिमा गुस्से में बोली, ‘‘अंजलि से प्यार मुझ से राय ले कर किया था?’’

इंद्र पूर्णिमा के कथन पर झल्ला गया, ‘‘पुराने पन्ने पलटने से कोई फायदा नहीं.’’

पूर्णिमा ने यह खबर अपने मायके पहुंचा दी. उस के मम्मीपापा, भाईबहन सभी रोष से भर गए. पापा तल्ख स्वर में बोले, ‘‘पूर्णिमा, तुम यहीं चली आओ. कोई जरूरत नहीं है, उस के पास रहने की.’’

‘‘वहां आ कर क्या मिलेगा? एक नीरस उबाऊ जिंदगी. सब का अपनाअपना लक्ष्य रहेगा, वही मेरे लिए एक बांझ स्त्री का अभिशप्त जीवन. बहुत होगा किसी स्कूल में नौकरी कर लूंगी. क्या इस से मेरा दुख कम हो जाएगा?’’ कहतेकहते पूर्णिमा की आंखों में आंसू भर आए.

‘‘मैं तुम्हारी दूसरी शादी करवा दूंगा.’’ पापा बोले.

‘‘कोई जरूरत नहीं है. वहां भी दूसरे के बच्चे पालने होंगे. इस से अच्छा सौतन के ही खिलाऊं.’’

‘‘मैं उसे जेल भिजवा दूंगा.’’ पिता ने कहा.

‘‘उस से मिलेगा क्या? बेहतर है कि समय का इंतजार करूं. हो सकता है मेरी गोद भर जाए.’’ पूर्णिमा ने आशा नहीं छोड़ी थी. अंतत: इंद्र से अपनी मर्जी से अंजलि के साथ शादी कर ली. उस की पत्नी बन कर वह घर में आ गई.

औफिस से आ कर इंद्र सब से पहले पूर्णिमा के कमरे में आता था. पर जल्द ही उसे पूर्णिमा से ऊब होने लगी थी. अंजलि की खुशबू वह पूर्णिमा के कमरे तक महसूस करता. फिर तेजी से चल कर उस के पास जाता. अंजलि उसी के इंतजार में सजधज कर तैयार बैठी रहती. गोरीचिट्टी अंजलि जब होंठों पर लिपस्टिक लगाती तो उस के होंठ गुलाब की पंखुडि़यां जैसे लगते थे.

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एक हफ्ते बाद पहली बार इंद्र रात बिताने पूर्णिमा के पास आया.

पूर्णिमा को कहीं न कहीं विश्वास था कि वह मां अवश्य बनेगी. बेमन से उस के पास 2 घंटे बिता कर वह अंजलि के पास चला गया. पूर्णिमा अपने अरमानों का कत्ल होते देखती रही. इंद्र उस की भावनाओं को रौंद रहा था. सोचतेसोचते उस की आंखें भीग गईं.

एक दिन वह भी आया, जब अंजलि मां बनने वाली थी. इंद्र काफी परेशान था. पूर्णिमा से बोला, ‘‘हो सके तो अस्पताल में तुम रह जाओ. पता नहीं किस चीज की जरूरत हो.’’

यह सुन कर पूर्णिमा का दिल भर आया. वह सोचने लगी कि आज इंद्र, अंजलि के लिए कितना परेशान है. अगर वह सक्षम होती तो उस की परेशानी पर उस का हक होता. पूर्णिमा की आंखों में आंसू छलक आए. इंद्र की नजर उस पर पड़ी, ‘‘रोनेधोने से क्या मिलने वाला है. खुशियां मनाओ कि इस घर में एक चिराग जलने वाला है. जिस की रोशनी में हम सब नहाएंगे.’’

‘‘सिर्फ तुम दोनों.’’ वह बोली.

‘‘वह तुम्हें बड़ी मां कहेगा.’’ इंद्र ने खुश हो कर कहा.

‘‘नहीं बनना है मुझे किसी की बड़ी मां.’’ पूर्णिमा गुस्से में बोली.

इंद्र जाने लगा तो कुछ सोच कर पूर्णिमा ने कहा, ‘‘किस नर्सिंगहोम में जाना होगा?’’

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