Mumbai local train journey : कहते हैं कि मुंबई शहर कभी थमता नहीं. यहां पर लोग चलते नहीं दौड़ते हैं. सफर सुहाना हो या संघर्ष से भरा, यहां लोग जान हथेली पर रख कर भी सफर करते हैं. हालात कैसे भी हों, मुंबई के लोग न तो सफर करना छोड़ते हैं और न ही नौकरी या काम पर जाना.
अगर मुंबई में ट्रैवल करने की बात करें तो आर्थिक स्थिति के हिसाब से लोकल ट्रेन, लोकल बस का सफर सस्ता और टिकाऊ होता है. लेकिन साथ ही यह सफर जोखिम से भी भरा है क्योंकि ट्रेन में सफर करने वाले लाखोंकरोड़ों लोग जान हथेली पर रख कर ट्रेन का सफर करते हैं.
एक रेलडब्बे में जहां 100 लोगों की जगह है तो उस में जल्दी औफिस पहुंचने के चक्कर में 200 लोग ठूंसठूंस कर किसी तरह लटकते हुए थोड़ी सी भी जगह में खड़े रह कर 1-2 घंटे का लंबा सफर तय करते हैं ताकि वे समय पर औफिस पहुंच सकें.
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विरार टू चर्चगेट जाने वाली लोकल ट्रेन लगभग 4 स्टेशनों पर रुकती है- अंधेरी, बांद्रा, दादर, बोरीवली और विरार. लिहाजा, यह फास्ट ट्रेन होती है और हर स्टेशन पर नहीं रुकती. इसलिए जो लोग विरार से चर्चगेट काम के लिए निकलते हैं उन सभी को इसी ट्रेन में सफर करना होता है.
हालांकि उद्योगपति, जो लोगों को नौकरी देते हैं वे अगर चाहें तो बोरीवली से अंधेरी के बीच भी औफिस ले सकते हैं या विरार के आसपास भी अपना औफिस या कारखाना खोल सकते हैं. मगर ये सारे लोग चर्चगेट के आसपास ही औफिस खोलते हैं.
गौरतलब है कि जो विरार से चर्चगेट नौकरी करने पहुंचते हैं वे कम पैसे में घर लेने के चक्कर में विरार के आसपास घर खरीद लेते हैं ताकि कम पैसे में बड़ी जगह मिल सकें, भले ही उन को नौकरी के नाम पर 4-5 घंटे का सफर रोज क्यों न करना पड़े.
इस ट्रेन में चढ़ने और उतरने वाले लोग इतने ज्यादा होते हैं कि हर स्टेशन पर 2 मिनट के आसपास रुकने वाली ट्रेन में चढ़नेउतरने वाले यात्रियों में कई बार मारपीट हो जाती है क्योंकि न तो ट्रेन में चढ़ने वालों के लिए जगह होती है और न ही ट्रेन से उतरने वालों के लिए जगह होती है. लिहाजा, जबरदस्ती में जल्दबाजी चढ़ने और उतरने के चक्कर में लोगों के बीच मारपीट तक हो जाती है.
इतना ही नहीं, अगर कोई यात्री जिस को बोरीवली में उतरना है और कोई विरार ट्रेन में चढ़ जाए तो विरार ट्रेन के यात्री उस बंदे को ट्रेन से उतरने भी नहीं देते और पीटते अलग हैं. इस नाराजगी के साथ कि जब बोरीवली की अलग ट्रेन है तो वह बंदा विरार ट्रेन में क्यों चढ़ा?
मुंबई में बढ़ती महंगाई को देखते हुए स्त्री हो या पुरुष हरकोई नौकरी करता है या अपना खुद का छोटाबड़ा व्यवसाय करने के चक्कर में विरार टू चर्चगेट या चर्चगेट टू विरार रोज ट्रैवल करता है ताकि अपनी जिंदगी या अपने बच्चों का भविष्य संवार सकें, एक नौर्मल जिंदगी जी सकें.
मुंबई में स्त्री हो या पुरुष, अपने काम के सिलसिले में रोज लोकल ट्रेन का सफर करते हैं, जोकि सिर्फ लंबा ही नहीं मुश्किलों से भी भरा होता है. ऐसे मुश्किल सफर को आसान बनाती है मुंबई की वे औरतें जो हर दिन विरार टू चर्चगेट लोकल ट्रेन से सफर करती हैं.
ऐसे में अगर विरार ट्रेन के लेडीज कंपार्टमैंट की बात करें तो खचाखच भरी इस ट्रेन में महिलाएं सफर करने के साथसाथ मनोरंजन की बातें, पौलिटिक्स पर डिस्कशन, जातिवाद का टैंशन झेलती हुई आगे बढ़ती हैं, गाना बजाती हैं.
बहुत सारी महिलाओं का मानना है कि सफर मुश्किल भले हो लेकिन बोरिंग नहीं हो. विरार ट्रेन के लेडीज कंपार्टमैंट में वह सबकुछ देखने को मिलता है जो दिलचस्प होने के साथसाथ शिक्षाप्रद भी होता है.
रोज एक ही टाइम एक ही ट्रेन के डब्बे में सफर करने की वजह से कई सारी औरतों के ट्रेन में खास दोस्त और ग्रुप भी बन जाते हैं जहां पर दोस्तों के बीच सिर्फ मन ही हलका नहीं करते, बल्कि कई समस्याओं का समाधान भी पा लेते हैं.
विरार टू चर्चगेट ट्रेन में लेडीज डब्बे के दिलचस्प पहलू
मुंबई में लोकल ट्रेन के टाइमिंग फिक्स रहते हैं और उसी टाइम पर लोकल ट्रेन विरार से चर्चगेट के लिए रवाना होती है और इस दौरान ज्यादातर औरतें उसी डब्बे में कोशिश करती हैं चढ़ने की जहां पर उन के दोस्त मौजूद होते हैं या उन का ग्रुप पहले से इंतजार कर रहा होता है. ट्रेन में मौजूद यह ग्रुप किसी परिवार से काम नहीं होता क्योंकि ये लोग सिर्फ एकदूसरे की परवाह ही नहीं करते, थक जाने या बीमार होने पर अपनी सीट से उठ कर उन्हें बैठा भी देते हैं.
जैसेजैसे ट्रेन अपनी गति पकड़ती है वैसेवैसे हर ग्रुप के बीच गौसिप, ज्ञान की बातें, मनोरंजन के कार्यक्रम जैसे गाना बजाना, ढेर सारी बातों का सिलसिला शुरू हो जाता है. कई बार कोई सास की बुराई करती है तो कोई पति और ननद की. कोई अपनी लवस्टोरी सुनाती है तो कोई अपनी ब्रेकअप स्टोरी सुनाती है.
इतना ही नहीं, कई सारी लड़कियां अपने ग्रुप में मजेदार बातें, मजाक, मस्ती, नौनवेज जोक्स भी सुनाती नजर आती हैं और ठहाकों का सिलसिला शुरू हो जाता है.
अगर कोई लड़की ग्रुप का हिस्सा नहीं भी होती तो भी अपने पास के लोगों की मजेदार बातें सुन कर मजा लेती है क्योंकि ट्रेन का सफर लंबा होता है और घर जा कर खाना बनाने में देरी होती है. इसलिए कई औरतें ट्रेन में सब्जी काटने का काम भी कर लेती हैं.
ट्रेन के खचाखच भरा होने के बावजूद कई लड़कियां इतनी भीड़ में भी अपना सामान बेचती नजर आती हैं, जैसे मेकअप का सामान, ज्वैलरी, खानेपीने का सामान आदि क्योंकि यह सारी चीजें अच्छी होती हैं. इसलिए लोग लेने से भी नहीं चूकते.
राजनीति और जातिवाद का तड़का
जैसा कि कहते हैं कि बड़ी मछली हमेशा छोटी मछली को खाती है, ठीक वैसे ही ट्रेन में कुछ लेडीज ग्रुप ऐसे भी होते हैं, जो अन्य लोगों को कई बार नुकसान पहुंचाने की भी कोशिश कर देते हैं, जैसे मराठी ग्रुप और गुजराती ग्रुप जातिवाद के चलते अपनी अपनी दादागिरी कर के अन्य लोगों को धमकाने की कोशिश करते भी नजर आते हैं. अगर कोई लड़की अकेली है और किसी लेडीज ग्रुप से उस का झगड़ा हो जाता है तो कई बार वह झगड़ा इतना बढ़ जाता है कि बात मारपीट तक पहुंच जाती है.
विरार ट्रेन में कई बार लड़कियों को बाल खींच कर मारपीट करते हुए भी देखा गया है, जिस के बचाव के लिए कई बार अन्य औरतों को सामने आना पड़ता है. कई बार तो इतना गंभीर मामला हो जाता है कि ट्रेन में मौजूद पुलिस को दखलअंदाजी करनी पड़ती है.
इसी तरह मौजूदा हालात के चलते स्त्रियों के बीच राजनीतिक पार्टियों को ले कर भी झगड़ा शुरू हो जाता है. जैसे अगर कोई बीजेपी सपोर्टर है और दूसरा ग्रुप कांग्रेस या शिवसेना का सपोर्टर है. इस वजह से कई बार ग्रुप में झगड़ा शुरू हो जाता है.
ट्रेन में बने खास दोस्त सिर्फ ट्रेन तक ही सीमित नहीं
ट्रेन में साथ सफर करने वाले रोज के दोस्त ट्रेन तक की सीमित नहीं रहते बल्कि उन के घर के फंक्शन, पिकनिक, पार्टी तक भी पहुंच जाते हैं. कई बार ट्रेन फ्रैंड आपस में इतना घुलमिल जाते हैं और उन की दोस्ती इतनी गहरी हो जाती है कि यह सिर्फ ट्रेन तक की सीमित नहीं रहती, बल्कि आपस में दोबारा भी मिलते हैं, एकदूसरे को अपनी शादी, बर्थडे पार्टी, घरेलू फंक्शंस या दोस्तों के साथ की गई पार्टी में भी बुलाते हैं. कई बार ट्रेन वाले सारे फ्रैंड छुट्टी के दिन एकसाथ पिकनिक मनाने भी चले जाते हैं. ऐसे में कहना गलत न होगा कि मंजिल मिले न मिले इस का गम नहीं मंजिल की जुस्तजू में मेरा कारवां तो है.
कहने का तात्पर्य यह है कि विरार ट्रेन का लेडीज कंपार्टमैंट आम स्त्रियों की जिंदगी का वह हिस्सा है जहां वर्किंग औरतें अपनी सारी दुखतकलीफ को साइड में रख कर अपने घरपरिवार के लिए पैसा कमाने सिर्फ दूरदराज ही नहीं जातीं, बल्कि अपने इस सफर को दिलचस्प बनाने की कोशिश में भी जुटी रहती हैं.
ट्रेन के सफर में कड़ा संघर्ष करते हुए ये सभी औरतें बहादुरी और कर्मठता का प्रतीक हैं क्योंकि ये औरतें अपनी जिंदगी में सिर्फ अपने लिए नहीं जीतीं बल्कि अपने परिवार व बच्चों के लिए विरार टू चर्चगेट का लंबा सफर तय कर के अपने बच्चों का भी भविष्य संवारती हैं.
