Women Equality in Marriage: पतिपत्नी में शादी हो, खुशी मनाई जाए, बच्चे हों, कुछ साल बीत जाएं पर यह गारंटी नहीं कि झगड़ा, सीरियस झगड़ा, न हो कि पत्नी घर छोड़ कर नहीं चली जाए और बिना दूसरी शादी किए बच्चों को खुद पाल ले. जब बच्चे पतिपत्नी दोनों के हैं तो जाहिर है कि जिम्मेदारी भी दोनों की ही होनी चाहिए. पत्नी अपनी जवानी खो चुकी है, शायद नौकरी कर के कमाने की हैसियत भी न हो तो उस के रहने, जीने का पैसा किसी और को तो देना होगा ही.
यह पति ही हो सकता है जिस ने पत्नी के साथ सुखद दिन देखे थे. इलाहाबाद हाई कोर्ट का एक नया फैसला दिखाता है कि किस तरह पति का घर छोड़ी पत्नियां पैसेपैसे को मुहताज रहती हैं. बुलंद शहर के एक फैमिली कोर्ट ने दिसंबर, 2023 में फैसला दे दिया कि पति का घर छोड़ कर आई पत्नी को पति कोई भी मैंटेनैंस पैसा न दे क्योंकि पत्नी के पेरैंट्स पैसे दे रहे हैं और 2 बच्चों के खर्च के लिए सिर्फ 3000 रुपए मासिक दे.
डेढ़ साल बाद हाई कोर्ट में पत्नी की फैमिली कोर्ट के निर्णय पर अपील में पत्नी को पेरैंट्स की सहायता मिलने के इशू को बदल दिया और कहा कि पत्नी को 5000 रुपए महीना दिए जाएं और बच्चों को 3000 रुपए की जगह 6000 रुपए प्रति माह.
इस मामले में गलती चाहे किसी की हो, पति शराबी हो, खर्चीला हो या पत्नी झगड़ालू हो, जब शादी के कुछ साल एक छत के नीचे किसी को दिए हों और पत्नी ने अपने पुराने पेरैंट्स के घर को छोड़ कर अलग गृहस्थी बना ली हो तो पुरानी स्थिति लौट ही नहीं सकती. पतिपत्नी में कुछ तो कभी था तभी तो बच्चे हुए. इन बच्चों की देखभाल वह अगर अकेले नहीं कर सकती तो पति को करनी ही होगी. अंगरेजों ने अपने ही जमाने में इस कानून को क्रिमिनल प्रोसीजर कांड में डाल दिया था कि मजिस्ट्रेट किसी भी बेसहारा पत्नी को घर से निकालने पर कुछ गुजाराभत्ता दिला सकें.
इस तरह की और वीडियो देखने के लिए गृहशोभा के चैनल को सब्सक्राइब करें
वह समाज जो हमेशा समझता रहा है कि पत्नी पैर की जूती है, घिस जाए या काटने लगे तो फेंक दो, इस कानून से सदा परेशान रहा है. इसीलिए इस पति ने दलील रखी थी कि पत्नी के पेरैंट्स इस का खयाल रख तो रहे हैं, वह क्यों पैसे दे? यह बेमतलब की दलील है. जब तक पत्नी खुद कमाऊ और पैरों पर खड़ी न हो, किसी पति के यूज कर के रिटर्न करने का हक नहीं क्योंकि पत्नी कोई सामान नहीं कि उसे पेरैंट्स के पास भेजा जा सके.
पतिपत्नी में राइट चौइस तो यही है कि वे ?ागड़ा होने पर खुद मेज पर बैठ कर फैसला करें कि अलग होना तो कौन किसे कितना दे. पतियों के पास पत्नी को घर से बाहर निकालने का हक अब नहीं है, दोनों पार्टनर हैं, खुशीखुशी दोनों ने पिछली आजादी एकदूसरे के लिए दी है. अब यदि विवाद होने लगे तो उस का हल सही होना चाहिए. एक पक्ष की परंपराओं के नाम पर धौंस नहीं चलनी चाहिए. अगर औरत जिद्दी, नकारा, लड़ाकू हो तो भी सहना पड़ेगा जैसे पूरे देश कू्रर शासक को सहते हैं, लोग भारी टैक्स देते हैं, पुलिस का अत्याचार सहते हैं.
इस मामले में यदि बुलंद शहर का फैमिली कोर्ट ऐसा फैसला देता कि पत्नी को संतोष होता तो ठीक रहता. फैमिली कोर्टों के फैसले की अपील ही यह बताती है कि एक पक्ष का साथ दिया जा रहा है. यह अपनेआप में गलत है.
