Smart City Development : सुप्रीम कोर्ट ने कंस्टिट्यूशन के आर्टिकल 21 में दिए राइट टू लाइफ को ऐक्सपैंड करते हुए कहा है कि सड़कों के किनारे बने फुटपाथ राइट टू लाइफ हैं, लोगों के पास राइट टू वाक हैं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जहां रोड है वहां फुटपाथ होना ही चाहिए चाहे वह रोड किसी भी प्रशासनिक बौडी का क्यों न हो.
सुप्रीम कोर्ट ने तो अपने सद्वचन पंडितों की तरह बोल दिए पर क्या देश की जनता, दुकानदार, मंदिर, मसजिदें, म्यूनिसिपल कौरपोरेशनें, कार ओनर्स यह राइट लोगों को देने को तैयार होंगे? कतई नहीं, हरगिज नहीं. सुप्रीम कोर्ट चाहे कहता रहे फुटपाथ तो बाजारों, पार्किंग स्टोरों, दुकानों, ऐनक्रोचमैंट, मंदिरों, खाने के खोमचों के आगे झुके ही रहेंगे.
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औरतों की जो चेन स्नैचिंग या पर्स स्नैचिंग होती है वह इसीलिए होती है कि औरतों को सड़क पर बाइकों के साथ चलना पड़ता और चोरउचक्के बाइक पर बैठ कर क्षणों में सोेने की चेन, मोबाइल ले उड़ते हैं. अगर फुटपाथ हों तो बाइक सवार तो औरतों, लड़कियों को लूट न सकेंगे.
आज शहरों में यंग मदर्स अपने बच्चों को प्रैम में ले कर नहीं चल सकतीं क्योंकि ऊबड़खाबड़ या भरी हुई पटरी की जगह उन्हें बाइक्स और काम के बीच चलना पड़ता है. छोटे टोडलर्स को न केवल खतरा रहता है, व्हीकल्स का धुआं भी सीधे उन की नाक में घुसता है.
फुटपाथ शहरीकरण की जरूरत हैं. अब तो ये गांवों में भी जरूरी हो गए हैं क्योंकि गांवों में भी व्हीकल्स भर गए हैं. अगर गली संकरी है तो कम से कम एक तरफ पटरी तो होनी ही चाहिए.
जिस रोज सुप्रीम कोर्ट ने यह और्डर दिया उसी रोज एक और न्यूज पब्लिश हुई कि अहमदाबाद म्यूनिसिपल कौरपोरेशन पटरियों को छोटा करेगी ताकि लोग वहां सो न सकें. सुप्रीम कोर्ट ने अपने और्डर में पहले के होमलैस लोगों को पटरियों पर रहने के हक और वैंगर्स को वहीं सामान बेचने के आवर्स को इस नए और्डर में ओवररूल कर दिया है, ऐसा नहीं लगता.
सदा सुहागिन रहो, 56 गुण मिल रहे हैं, दानपुण्य करोगे तो तुरंत बिगड़ा काम बन जाएगा की तरह का सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश भी पंडिताई डिक्लेरेशन है. गौड टेक्स केयर औफ आल सुनसुन कर कान पक गए हैं पर सदियों से लोग बेमौत मर रहे हैं, लूटे जा रहे हैं, लड़कियों का रेप हो रहा है, सरकारें निर्दोषों को जेलों में भर रही हैं. इसी तरह सुप्रीम कोर्ट का राइट टू वाक सिर्फ स्लोगन बन कर रह जाएगा, यह पक्का है.
राइट टू वाक पाने के लिए लोगों को हक के लिए हर फुटपाथ पर लड़ना होगा. हर दुकानदार को टोकना होगा. उन से खरीदारी बंद करनी होगी. पटरी पर बैठे भिखारी को 5 रुपए देने बंद करने होंगे. सब्जी वाले की दुकान के अंदर जा कर सब्जी खरीदने की आदत डालनी होगी.
पटरियां, फुटपाथ सड़कों की सेफ्टी शील्ड हैं. वहां चलते हुए आदमी सुरक्षित रहता है. बच्चे मस्ती कर के चल सकते हैं. लड़कियां हाई हील में खटखट कर के चल सकती हैं. यह सेफ्टी जोन पक्का हो, ऊंचानीचा न हो, नीचे नाला न बह रहा हो, टैलीफोन, बिजली वालों ने खोद न रखा हो, यह देखना अथौरिटीज का कार्य तो है, रैजिडैंट्स का भी है वरना सुप्रीम कोर्ट का कहना सत्यमेव जयते जैसा बन कर रह जाएगा जिस के नीचे झूठ, छल, फरेब कर कैक्टस खूब फूलफल रहे
