Kids Screen Time  : गूगल हेड ऑफिस से 3 किमी दूरी पर चल फेमस वाल्डोर्फ स्कूल में फोन पूरी तरह से बैन है. इस स्कूल की सालाना फीस लगभग 40 लाख रुपये है, जहां सिलिकॉन वैली के शीर्ष टेक एग्जीक्यूटिव्स और एआई रिर्सचर अपने बच्चों को पढ़ने भेजते हैं.

स्कूल का मानना है कि फोन से बच्चे भटक जाते हैं, और बिना फोन के बच्चे ‘असली बचपन’ जीते हैं. यहां मशीनी सीख के बजाय इंसानी सोच, क्रिएटिविटी और विजन डवलप करने पर जोर दिया जाता है.

स्क्रीन को लत बनाने वाले अपने घरों में सख्त

एक तरफ टेक कंपनियों ने आम बच्चों और युवाओं को स्क्रीन का लती बनाने के लिए एल्गोरिदम डिजाइन किए हैं, वहीं दूसरी तरफ सिलिकॉन वैली के अपर एग्जीक्यूटिव्स अपने ही घरों में टेक्नोलॉजी पर सख्त पहरा रखते हैं. आम परिवारों में गैजेट्स, एंटरटेनमेंट का साधन बन चुके हैं, जबकि टेक दिग्गजों के घरों में डिजिटल दुनिया के मुकाबले सादगी, और ‘बोरियत’ को ज्यादा महत्व दिया जाता है.

टेक दिग्गजों के अपने बच्चों के लिए नियम

मेटा के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने दूसरी बेटी के जन्म पर लिखे खुले पत्र में बेटी को बाहर खेलने, फूलों की खुशबू लेने और सूखे पत्ते बटोरने की सलाह दी. ओपन एआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन ने कहा कि वे अपने बच्चे को एआई  से जल्द नहीं जोड़ेंगे. वे उसे मिट्टी में खेलने और ‘बोरियत’ का अनुभव करने देंगे, क्योंकि बोरियत से ही क्रिएटिविटी जन्म लेती है. अब जानिए, माइक्रोसौफ्ट के सह संस्थापक बिल गेट्स क्या सोचते हैं, उन्होंने अपने बच्चों को 14 वर्ष की उम्र से पहले मोबाइल फोन नहीं दिया और तो और दुनिया भर को हर बात के लिए गुगल करने की आदत लगाने वाले गुगल के सीईओ सुंदर पिचाई ने अपने बेटे को 11 साल की उम्र तक फोन नहीं दिया.स्नैपचैट पर घटनों बिताते हैं, तो आप भी जान लें कि इसके सीईओ इवान स्पीगल अपने दो साल के बेटे को स्क्रीन टाइम बिल्कुल नहीं देते और बड़े बच्चों के लिए हफ्ते में केवल 90 मिनट तय स्क्रीन टाइम तय कर रखा है. स्पीगल ने कहा टीवी से दूरी बच्चों में पढ़ने की आदत और  क्रिएटिव सोच डेवलप करती है, फेसबुक के इंवेस्टर पीटर थील का कहना है कि  वे अपने बच्चों को हफ्ते में सिर्फ 1.5 घंटे  स्क्रीन देखने की अनुमति देते हैं. माइक्रोसौफ्ट के सीईओ सत्या नडेला भी अपने बच्चों के स्क्रीन टाइम और कंप्यूटर के इस्तेमाल को लेकर सख्त हैं. एप्पल के सीईओ टिम कुक को भी जान लें, वह अपने भतीजे और फैमिली के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने की वकालत करते रहते हैं. दिनभर यूट्यब देखने वाले यह जान लें कि यूट्यूब के फाउंडर स्टीव चेन इस बात से परेशान है कि रील्स और शॉर्ट वीडियो बच्चों की फोकस पावर को घटा रहे हैं. वे चाहते हैं कि बच्चे पेसेंस के साथ धीरे-धीरे सीखें.

न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक जोनाथन हाइड  का कहना है: “स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ने बचपन को बदल दिया है. ‘खेल- कूद वाला बचपन’ अब ‘फोन- वाले बचपन’ में बदल गया है, जिससे बच्चों में एंग्जायटी, डिप्रेशन और फोकस की कमी तेजी से बढ़ी है. सिलिकॉन वैली के दिग्गज यह सच जानते हैं, इसलिए वे अपने बच्चों के बेहतर मानसिक विकास के लिए उन्हें स्क्रीन से दूर और असल दुनिया के अनुभवों के करीब रखते हैं.”

 

फोन की लत और किताबों से दूरी

फोन की लत और किताबों से दूरी हर दूसरे घर की सच्चाई बन चुकी है. स्क्रीन से मिलने वाला क्विक डोपामाइन और रील्स का तेज फ़ॉर्मेट दिमाग को गहरी पढ़ाई और धैर्य की आदत से दूर कर देता है. शॉर्ट वीडियो और रील्स देखने से दिमाग को हर 15 सेकंड में नया कंटेंट देखने की आदत हो जाती है. इसके विपरीत, किताब पढ़ने के लिए लंबे समय तक एक जगह ध्यान लगा कर रखने की और पेसेंस की ज़रूरत होती है.

सोशल मीडिया पर लाइक, नोटिफिकेशन और स्क्रॉलिंग से दिमाग को तुरंत खुशी मिलती है. किताबों से मिलने वाला ज्ञान और शांति धीमा प्रोसेस है, जो बोर करता है. इतना ही नहीं, फोन हमेशा हाथ में रहता है और बिना किसी दिमागी मेहनत के मनोरंजन देता है. दिनभर स्क्रीन देखने के बाद आंखें और दिमाग इतने थक जाते हैं कि किताब उठा कर पढ़ने में आलस आ जाता है. डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बिना फिल्टर और अन-एडिटेड कंटेंट का तेजी से फैलना खतरा है.

किसी भी किताब के छपने से पहले लेखक का रिसर्च, एडिटर्स की समीक्षा, फैक्ट-चेकिंग और पब्लिशिंग हाउस का अप्रूवल होता है. इस प्रोसेस में समय लगता है, जिससे गलत या मिसलीडिंग जानकारी की गुंजाइश बहुत कम हो जाती है.

सोशल मीडिया पोस्ट करने के लिए किसी अप्रूवल या फैक्ट-चेक की ज़रूरत नहीं होती. कोई भी बिना किसी जवाबदेही के अपनी राय, आधी-अधूरी जानकारी या अफ़वाह को सेकेंडों में लाखों लोगों तक पहुँचा सकता है.

सोशल मीडिया के एल्गोरिदम का मकसद लोगों को ऐप पर रोके रखना है. इसलिए यहां निष्पक्ष जानकारी से ज्यादा ऐसी चीजें वायरल होती हैं जो लोगों में गुस्सा, डर या उत्सुकता पैदा करें.

एआई और एडिटिंग टूल्स के इस दौर में नकली फोटो, मनगढ़ंत खबरें और ऑडियो/वीडियो को सच बताकर फैलाया जा रहा है.  किताबों को पढ़कर आप विषय के ‘क्यों’ और ‘कैसे’ को समझते हैं, जबकि अन-एडिटेड डिजिटल कंटेंट आपको बिना सोचे-समझे एकतरफा राय बनाने पर मजबूर करता है.

दिमाग पर कंट्रोल करता है

इम्पल्सिव होना और फोन का क्विक रिस्पॉन्स मनोवैज्ञानिक रूप से यह हमारे दिमाग को कंट्रोल करने लगता है. फोन पर एक नोटिफिकेशन आता है, और दिमाग में तुरंत जिज्ञासा पैदा होती है. जैसे ही हम तुरंत स्क्रीन देखते हैं या रिप्लाई करते हैं, दिमाग में डोपामाइन रिलीज होता है. इससे दिमाग को हर छोटी बात पर ‘तुरंत एक्शन और तुरंत रिजल्ट’ की आदत पड़ जाती है.

क्विक रिस्पॉन्स की आदत इंसान के ‘पॉज को खत्म कर देती है. इंसान किसी भी हाल में बिना सोचे-समझे तुरंत रिएक्शन  देने लगता है, जिससे फैसलों में गलती और गुस्सा बढ़ता है.

इंसान सोचता अगर मैंने तुरंत मैसेज नहीं देखा या रिप्लाई नहीं किया तो कुछ छूट जाएगा” – यह डर इंसान को मानसिक रूप से हर वक्त बेचैन और उतावला बनाए रखता है.

इम्पल्सिव आदतों के नुकसान

असल ज़िंदगी में नतीजे तुरंत नहीं मिलते. पढ़ाई, रिश्ते, करियर या कोई काम हो—सब समय मांगते हैं. लेकिन फोन की यह आदत इंसानों को जीवन में भी अधीर बना देती है.

जब दिमाग तुरंत रिस्पौन्स करने की फिराक में रहता है, तो गहराई से सोचने, विश्लेषण करने और सही-गलत का फर्क करने की क्षमता घटने लगती है.

डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से खुद को और परिवार को सुरक्षित रखें

किसी भी खबर या फैक्ट को सच मानने या आगे शेयर करने से पहले देखें कि वह किसी भरोसेमंद समाचार एजेंसी या आधिकारिक सोर्स से है या नहीं. अगर कोई पोस्ट पढ़कर तुरंत गुस्सा या ज्यादा हैरानी हो, तो उसे तुरंत सच न मानें. यह अक्सर क्लिकबेट या भ्रामक कंटेंट हो सकता है.

सोशल मीडिया पर भड़काऊ या गैर-जरूरी अन-एडिटेड कंटेंट पर रिएक्ट न करें और न ही उसे देर तक देखें; इससे ऐप आपको वैसा कंटेंट दिखाना कम कर देगा. सूचना का होना बुरी बात नहीं है, लेकिन बिना जांचीपरखी सूचना जहर का काम कर सकती है इसलिए डिजिटल दौर में किताबों पर भरोसा ही खुद को सेफ रखने का तरीका है.

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