देश के शहरों में बढ़ता प्रदूषण घरों के लिए बड़ी आफत बन रहा है. बाहर व घर के कामों के बोझ से पहले से ही दबी औरतों को प्रदूषण के कारण पैदा होने वाली बीमारियों व गंद दोनों से जूझना पड़ रहा है.

दिल्ली जैसे शहर में अब कपड़े सुखाना तक मुश्किल हो गया है, क्योंकि चमकती धूप दुर्लभ हो गई है और साल के कुछ दिनों तक ही रह गई है.

इस का मतलब है कि गीले कपड़े सीले रह जाते हैं और बीमारियां व बदबू पैदा करते हैं. घरों के फर्श मैले हो रहे हैं, परदों के रंग फीके पड़ रहे हैं, घरों के बाग मुरझा रहे हैं और फूल हो ही नहीं रहे.

प्रदूषण के कारण अस्पतालों और डाक्टरों के चक्कर लग रहे हैं. जीवन में से हंसी लुप्त हो रही है क्योंकि हर समय उदासी भरी उमस छाई रहती है, जो मानसिक बीमारियों को भी जन्म दे रही है.

छोटे घरों में अब और कठिनाइयां होने लगी हैं क्योंकि बाहर निकल कर साफ हवा में सांस लेना असंभव हो गया है और घर के अंदर धूप न होने की वजह से हर समय एक बदबू सी छाई रहती है.

सरकारें हमेशा की तरह आखिरी समय पर जागती हैं, जब दुश्मन दरवाजे पर आ खड़ा हो. दुनिया के बहुत शहरों ने प्रदूषण का मुकाबला किया है और इस के उदाहरण भी मौजूद हैं.

यह दुनिया में पहली बार नहीं हो रहा है पर हमारी सरकारें तो केवल आज की और अब की चिंता करती हैं. बाबूओं और नेताओं को तो अपना पैसा बनाने और जनता को चूसने की लगी रहती है. उन्हें प्रदूषण जैसी फालतू चीज से कोई मतलब नहीं है.

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