Hindi Stories : आपरेशन थियेटर के दरवाजे पर लालबत्ती अब भी जल रही थी और रुखसाना बेगम की नजर लगातार उस पर टिकी थी. पलकें मानो झपकना ही भूल गई थीं, लग रहा था जैसे उसी लालबत्ती की चमक पर उस की जिंदगी रुकी है.

रुखसाना की जिंदगी जिस धुरी के चारों तरफ घूमती थी वही रज्जाक मियां अंदर आपरेशन टेबल पर जिंदगी और मौत से जूझ रहे थे. जिन बांहों का सहारा ले कर वह कश्मीर के एक छोटे से गांव से सुदूर कोलकाता आई थी उन्हीं बांहों पर 3-3 गोलियां लगी थीं. शायद उस बांह को काट कर शरीर से अलग करना पड़े, ऐसा ही कुछ डाक्टर साहब कह रहे थे उस के मकान मालिक गोविंदरामजी से. रुखसाना की तो जैसे उस वक्त सुनने की शक्ति भी कमजोर पड़ गई थी.

क्या सोच रहे होंगे गोविंदरामजी और उन की पत्नी शीला उस के और रज्जाक के बारे में? कुछ भी सोचें पर भला हो शीला बहन का जो उन्होंने उस के 1 साल के पुत्र रफीक को अपने पास घर में ही रख लिया, वरना वह क्या करती? यहां तो अपने ही खानेपीने की कोई सुध नहीं है.

रुखसाना ने मन ही मन ठान लिया कि अब जब घर लौटेगी तो गोविंद भाई साहब और शीला भाभी को अपने बारे में सबकुछ सचसच बता देगी. जिन से छिपाना था जब उन्हीं से नहीं छिपा तो अब किस का डर? और फिर गोविंद भाई और शीला भाभी ने उस के इस मुसीबत के समय जो उपकार किया, वह तो कोई अपना ही कर सकता है न. अपनों की बात आते ही रुखसाना की आंखों के आगे उस का अतीत घूम गया.

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