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एक दिन मैं तोते का बच्चा खरीद कर घर ले आया. उस के खानेपीने के लिए 2 कटोरियां पिंजरे में रख दीं. नयानया कैदी था इसलिए अकसर चुप ही रहता था. हां, कभीकभी टें...टें की आवाज में चीखने लगता.

घर के लोग कभीकभी उस निर्दोष कैदी को छेड़ कर आनंद ले लेते. लेकिन खाने के वक्त उसे भी खाना और पानी बड़े प्यार से देते थे. वह 1-2 कौर कुटकुटा कर बाकी छोड़ देता और टें...टें शुरू कर देता. फिर चुपचाप सीखचों से बाहर देखता रहता.

उसे रोज इनसानी भाषा बोलने का अभ्यास कराया जाता. पहले तो वह ‘हं...हं’ कहता था जिस से उस की समझ में न आने और आश्चर्य का भाव जाहिर होता पर धीरेधीरे वह आमाम...आमाम कहने लगा.

अब वह रोज के समय पर खाना या पानी न मिलने पर कटोरी मुंह से गिरा कर संकेत भी करने लगा, फिर भी कभीकभी वह बड़ा उदास बैठा रहता और छेड़ने पर भी ऐसा प्रतिरोध करता जैसे चिंतन में बाधा पड़ने पर कोई मनीषी क्रोध जाहिर कर फिर चिंतन में लीन हो जाता है.

एक दिन तोतों का एक बड़ा झुंड हमारे आंगन के पेड़ों पर आ बैठा, उन की टें...टें से सारा आंगन गूंज उठा. मैं ने देखा कि उन की आवाज सुनते ही पिंजरे में मानो भूचाल आ गया. पंखों की निरंतर फड़फड़ाहट, टें...टें की चीखों और चोंच के क्रुद्ध आघातों से वह पिंजरे के सीखचों को जैसे उखाड़ फेंकना चाहता था. उस के पंखों के टुकड़े हवा में बिखर रहे थे. चोंच लहूलुहान हो गई थी. फिर भी वह उस कैद से किसी तरह मुक्त होना चाहता था. झुंड के तोते भी उसे आवाज दे कर प्रोत्साहित करते से लग रहे थे.

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