तारा गुप्ता , (लखनऊ)
गांव में अपने मम्मी-पापा और भाई-बहनों के साथ जो जीवन बीत रहा था उसमें कड़वी यादों के सिवा कुछ न था. हम सब आकाश में उड़ान भरना चाहते थे, जो संभव नहीं लग रहा था. पापा की बीमारी और मां की चिंता, दोनों ने ही हम सबके जीवन को कष्टमय बना दिया था. हम भाई-बहनों ने वहां से निकलने का निश्चय किया. अपने मामा से बात कर, हमने शहर जाने का निर्णय लिया.
शहर में भी हमारा जीवन पतंग के समान डगमगाता रहा. लगता था अब गिरी तब गिरी. परंतु हम सब ने हिम्मत नहीं हारी. मां हमारी प्रेरणा बनी रही और घर संभालती रही. हम सब भाई-बहन छोटे-छोटे काम कर भविष्य की ओर बढ़ चले. धीरे-धीरे हमारी मेहनत रंग लाने लगी. छोटे भाई को बैंक में जौब मिल गई. बड़े भाई ने बिजनेस संभाला. हमने भी अपनी पढ़ाई पूरी कर जौब कर ली.
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बड़े भाई ने पापा को संभाला, अच्छा सा मकान किराए पर लिया गया, तभी दीदी की शादी तय हो गई. हमारे घर भी शहनाई बज उठी. दीदी के बाद भैया की शादी और फिर छोटे भाई की शादी बाद में मेरी भी शादी बड़ी धूमधाम से हो गई.
