Mother’s Day 2025 : “मां चली गई”, पति ने कमरे में आते ही धीमी आवाज़ में कहा. मेरी प्रतिक्रिया देखे बिना वे तेज़ी से बाथरुम की ओर चले गए. मुझे भी अचानक मिली खबर से चौंकने की आवश्यकता नहीं थी. चाहे कितनी भी विषम परिस्थिति क्यों न हो धीरज खोने का साहस मुझमें नहीं है.

जीवन के थपेड़ों से हुए अपने पाषाण ह्रदय की कठोर चट्टान पर एक बूंद आंसू क्या मायने रखता है? जैसे गर्म तवे पर पानी का छींटा. पलकों की कोरें नम होने में काफी समय लगा. घड़ी में वक्त देखने के लिए नज़रें उठाई, तो पाया, पलकों पर आए आंसू छलक कर गालों को भिगोने लगे हैं. भावनाओं का ज्वार उठा और ह्रदय से एक सिसकी, कुछ बूंदे और बस एक चुप्पी.

कमरे में अंधेरा था, अंधेरे में उठते ,सवालों को जवाबों की आवश्यकता नहीं होती.” अभी जाओगी?” “नहीं सबेरे”. सारी समस्याओं का जैसे अंत हो गया. रात के दस बजे थे. “सबेरा कब होगा? ” अपने आप से सवाल कर बिस्तर पर लेट गई. मन अतीत के अंधेरों से घिरने लगा.

तब जब अनचाहे गर्भ से मुक्ति पाने के लिए मां ने क्या-क्या युक्ति की होगी. लेकिन मां के सारे प्रयास विफल रहे. बचपन तितली और परियों की कहानियां सुनते कहते बीतने लगा. पिता का स्नेह और मां की फटकार के बाद का दुलार मन को हर्षोन्मत्त कर देता.

जीवन धारा मंथर गति से बह रही थी कि अचानक किसी ने जैसे शांत झील में पत्थर फेंक दिया. मां और पिता में कभी धीमी तो कभी तेज़ आवाज़ में बहस होने लगी. बालमन कुछ समझ नहीं पाता था.

समय सरकता गया और माहौल शांत होता गया. परपिता की नम आंखों ने सारी कहानी कह डाली थी. पिता के पक्ष में केवल मैं थी, पर मां का विरोध भी कभी सामने आ कर नहीं किया. मन में सवाल उठते, क्या स्त्री को मां बनने के बाद अपनी गरिमा क ध्यान नहीं रखना चाहिए? समाज स्त्री को त्याग की मूर्ति समझकर पूजता है. उसे संयम रखना चाहिए? स्त्री की छोटी सी गलती उसे समाज में, परिवार में और संतान की नज़रों में गिरा देती है.

“मां ” शब्द की मर्यादा स्त्री को देवताओं से भी ऊपर का स्थान प्रदान करती है और वह संस्कारों की धुरी भी है. कभी सोचती,पर मां एक स्त्री भी तो है. कई वर्ष बीत गए. मैंने कभी “मां “शब्द की गरिमा को ठेस नहीं पहुंचाई. हमेशा कोशिश रही कि अपने चरित्र, व्यवहार और त्याग से समाज में एक स्थान पा सकूं.

आज वर्षों बाद मां से मिली, बहुत कष्ट हो रहा था उन्हें, दर्द असहनीय था. लगा कुछ कहना चाहती हैं. मैं भी चाहती थी कि अपने अंतिम क्षणों मां मुझसे कुछ कहे. लेकिन नहीं आज भी मां के अंदर छिपी स्त्री ने उनके होंठ सी दिए थे.

मुझसे रहा नहीं गया, कहा -“मां” प्राण ऐसे नहीं छूटेंगे. मानव जब दुनिया में आता है तो वह निश्छल, निष्पाप, सरल ह्रदय और दोषरहित एक पवित्र आत्मा होता है. वापसी में भी उसे शुद्ध और पवित्र होना चाहिये. तो मां पश्चाताप कर लें. अंतर्मन की पीड़ा का बोझ कम कर लें. आत्मा अपराध-बोध से मुक्त हो जाएगी, पवित्र हो जाएगी. देखा, मां की आंखें भर आईं. मैं बाहर आ गई. पति से कहा,” घर चलें “.

घर पहुंचकर मन विचलित रहा. क्या आवश्यकता थी मां को नीचा दिखाने की? इतने वर्षों तक मौन रहने वाली यह जिव्हा क्यों आज वाचाल हो गई?

आत्मग्लानि से ह्रदय कंपकंपा रहा था कि…………….मां की खबर आ गई………
मन शांत हो गया, यह सोचकर कि मां के अंतर्मन ने शायद पश्चाताप कर लिया होगा जो भी हो.
अब ह्दय और आत्मा दोनों को ही शांति का अनुभव हो रहा था.
एक गहरी सांस के साथ मन से आवाज़ आई, आखिर “मां चली गई.”

 राइटर- ज्योति दिग्विजय सिंह

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