late pregnancy : हाल के वर्षों में कई बौलीवुड और टीवी सैलिब्रिटीज ने 35 से 40 वर्ष या उस से अधिक की उम्र में मां बनने का निर्णय लिया. इन में करीना कपूर (40 वर्ष), गौहर खान (39 वर्ष), फराह खान (43 वर्ष), करिश्मा तमन्ना (42 वर्ष), कैटरीना कैफ आदि कई हैं. इतना ही नहीं अभिनेत्री ऐश्वर्या राय, शिल्पा शेट्टी, और रानी मुखर्जी जैसी अभिनेत्रियां भी 35 से 40 की उम्र के बाद मां बनी हैं. ऐसा इन सिलेब्स ने अपने कैरियर और निजी कारणों से किया है और आज वे अपने बच्चे के साथ खुश हैं.
असल में आज की बदलती जीवनशैली और उच्च शिक्षा ने अधिकतर स्त्रियों को पहले से अधिक आत्मनिर्भर बनाया है, जिस का आनंद आज की हर नारी ले रही है। ऐसे में शादी और बच्चे की प्राथमिकता पहले से अलग देखी जा रही है. शादी कर केवल परिवार और बच्चों की देखभाल को वे प्राथमिकता नहीं देतीं.
गुरगांव की फर्टिलिटी स्पैशलिस्ट, नोवा आईवीएफ फर्टिलिटी की डा. रश्मि अग्रवाल कहती हैं कि आज के अधिकतर कपल्स पहले अपना घर लेना, पैसे बचाना और घूमनाफिरना चाहते हैं, इस के बाद वे बच्चे की जिम्मेदारी लेना सही समझते हैं और यह ठीक भी है. इस के अलावा कई बार सही और भरोसेमंद पार्टनर मिलने में समय लगता है.
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वे कहती हैं कि परिवार की जिम्मेदारी लेना आसान नहीं होता, खासकर कामकाजी स्त्रियों के लिए बहुत मुश्किल होता है। ऐसे में कुछ महिलाएं पहले अपने शौक पूरे करना, खुद और परिवार की जिम्मेदारियां समझना चाहती हैं, इसलिए वे बच्चा प्लान करने में देरी करती हैं. वे जल्दी शादी नहीं करना चाहतीं और प्रैगनैंसी की प्लानिंग भी देर से करती हैं. यही वजह है कि आज की स्त्रियां कई बार गर्भधारण के लिए फर्टिलिटी ट्रीटमैंट का भी सहारा भी लेती हैं.
देर से बच्चा प्लान करने के लिए शारीरिक, मानसिक और रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े मामलों को ध्यान में रख कर सही तरीके से योजना बनाना बहुत जरूरी है, ताकि आप जब भी चाहें मातृत्व सुख प्राप्त कर सकती हैं.
गर्भधारण से पहले
प्रैगनैंसी प्लान करने से पहले स्त्रीरोग विशेषज्ञ की सलाह जरूर लेनी चाहिए. आप को किसी प्रकार की बीमारी है या नहीं इस की जांच करवा लें. अगर परिवार में कोई आनुवंशिक बीमारी है, तो उस के बारे में भी खास टेस्ट करवा लें.
जरूरी टेस्ट
गर्भधारण से पहले कुछ बेसिक टेस्ट करना जरूरी होता है। जैसे खून की जांच (सीबीसी), ब्लड ग्रुप, रूबेला और चिकनपौक्स से सुरक्षा (इम्युनिटी), थायरायड टेस्ट, शुगर टेस्ट (फास्टिंग या एचबीए 1सी), कोलेस्ट्रौल (लिपिड प्रोफाइल), हेपेटाइटिस और एचआईवी की जांच आदि.
कुछ मामलों में एएमएच टेस्ट और अल्ट्रासाउंड से यह देखा जाता है कि अंडाशय (ओवरी) की स्थिति कैसी है. पुरुषों को भी जरूरत पड़ने पर वीर्य (सीमेन) टेस्ट कराने की सलाह दी जाती है.
लाइफस्टाइल में सुधार करना
धूम्रपान और किसी भी तरह के नशे से दूर रहें. वजन नियंत्रण में रखें. गर्भधारण से कम से कम 1 महीने पहले फोलिक एसिड (400-800 एमसीजी) रोज लेना शुरू करें। इस से बच्चे में कुछ जन्म से जुड़ी समस्याओं का खतरा कम होता है. रोजाना पौष्टिक खाना खाएं, विटामिन डी का ध्यान रखें और नियमित व्यायाम करें.
पुरानी बीमारियों को कंट्रोल में रखना
अगर आप को हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, थायरायड, औटोइम्यून बीमारी या मानसिक तनाव जैसी समस्या है, तो पहले इन्हें कंट्रोल करना जरूरी होता है. डाक्टर से अपनी दवाइयों के बारे में भी बात करें क्योंकि कुछ दवाइयां गर्भावस्था में नुकसान भी कर सकती हैं.
फर्टिलिटी का समय
अगर आप की उम्र 35 साल से अधिक है और 6 महीने तक कोशिश करने के बाद भी गर्भधारण नहीं होता, तो डाक्टर से सलाह जरूर लें. कम उम्र की महिलाओं के लिए यह समय 12 महीने होता है. उम्र बढ़ने के साथ अंडों की संख्या और गुणवत्ता कम होती जाती है. इस के अलावा अगर आप देर से बच्चा प्लान कर रहे हैं, तो पहले से फर्टिलिटी सुरक्षित रखने जैसे कि एग फ्रीजिंग करने के बारे में सोच सकती हैं. इस के अलावा लेट प्रैगनैंसी होने से निम्न बातों पर भी ध्यान अवश्य दें :
-40 की उम्र में गर्भधारणा हुई है, तो स्वास्थ्य की समस्या बढ़ने का खतरा होता है, मसलन गैस्टेशनल डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर से जुडी समस्या, बच्चे में जन्म से जुड़ी कुछ दिक्कतें, गर्भपात, प्लेसेंटा की समस्या (प्लेसेंटा प्रीविया) समय से पहले डिलीवरी होना आदि. इस उम्र में कई बार नौर्मल डिलीवरी के अलावा सी सैक्शन से डिलीवरी होने की संभावना अधिक होती है.
-इस उम्र में गर्भावस्था के दौरान मां और बच्चे दोनों की सेहत पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत होती है. डाक्टर कुछ जरूरी टेस्ट करवाने की सलाह देते हैं, जैसे शुरुआती महीनों की स्क्रीनिंग, एनआईपीटी (खून से होने वाला टेस्ट), डिटेल अल्ट्रासाउंड और जरूरत होने पर सीवीएस या ऐम्नियोसेंटेसिस जैसे टेस्ट करवाने पड़ते हैं, ताकि बच्चे की ग्रोथ, मां का ब्लड प्रेशर और शुगर लेवल सही तरह से चैक किया जा सके.
कुछ मामलों में मैटरनल फिटल मैडिसिन ऐक्सपर्ट की सलाह भी ली जाती है, ताकि किसी भी जोखिम को समय पर संभाला जा सके.
-डिलीवरी कैसे होगी और कब होगी इस की योजना पहले से बना ली जाती है. साथ ही खून की कमी (एनीमिया) से बचने के लिए सही खानपान और दवाइयों पर ध्यान दिया जाता है. डिलीवरी के बाद मां की शारीरिक और मानसिक सेहत का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है, जैसे डिप्रैशन की जांच, स्तनपान में मदद और शरीर को ठीक होने के लिए सही आराम और देखभाल काफी जरूरी है. इस के साथ ही नवजात बच्चे की देखभाल कैसे करनी है, इस की भी पहले से तैयारी जरूरी है, ताकि मां और बच्चा दोनों स्वस्थ रहें.
एग डोनेशन (दूसरी महिला के अंडों से गर्भधारण)
डाक्टर आगे कहती हैं कि कई बार लेट प्रैगनैंसी होना संभव नहीं होता, ऐसे में जांच के बाद एग डोनेशन, सेरोगेसी या एडौप्शन से भी पीछे नहीं हटना चाहिए. अगर किसी महिला के अपने अंडे सही तरह से काम नहीं कर रहे हैं या उन की गुणवत्ता अच्छी नहीं है, तो वह दूसरी महिला के अंडों की मदद ले सकती है। इसे एग डोनेशन कहा जाता है. इस में एग डोनेट करने वाली स्त्री कोई जानपहचान या अनजान भी हो सकती है. इन एग की मदद से गर्भधारण करने के चांस अकसर अधिक होते हैं, लेकिन इस प्रक्रिया में सिर्फ मैडिकल ही नहीं, बल्कि भावनात्मक और कानूनी बातें भी जुड़ी होती हैं, मसलन डोनर के साथ क्या संबंध रहेगा, बच्चे को आगे चल कर यह बात बतानी है या नहीं वगैरह.
इसलिए इस फैसले से पहले डाक्टर, काउंसलर और कानूनी सलाहकार से बात करना बहुत जरूरी है, ताकि आगे कोई परेशानी न हो.
पेरैंट्स की जिम्मेदारियां और प्रसव के बाद नवजात की देखभाल
डाक्टर आगे कहती हैं कि लेट पेरैंटिंग में पति की भूमिका बराबर होनी चाहिए। उन्हें बच्चे का ‘मेल मदर’ बनने की आवश्यकता होती है. इस के अलावा अगर बच्चा एग डोनेशन, सेरोगेट या एडौप्शन से मिला है, तो बच्चे के साथ पेरैंट्स के भाईबहन या किसी रिश्तेदार को भी इस की जानकारी नहीं होनी चाहिए, ताकि बच्चा स्वस्थ वातावरण में पलें.
आइए, जानते हैं नवजात की देखभाल पेरैंट्स कैसे करें :
-बच्चे के जन्म के बाद मां और पिता दोनों को मिल कर उस की देखभाल करनी चाहिए. इस में बच्चे को दूध पिलाना, डायपर बदलना, नहलाना, उसे आराम देना और सही तरीके से सुलाना शामिल है. शुरुआत के कुछ हफ्तों में घर के काम और बच्चे की देखभाल के लिए परिवार या किसी की मदद लेना अच्छा रहता है, ताकि मां को आराम मिल सकें.
-डिलीवरी के बाद मां को मानसिक सहारे की बहुत जरूरत होती है. अधिक उम्र में मां बनने से एक स्त्री थक जाती है, ऐसे में पति की भूमिका बड़ी होती है क्योंकि इस समय थकान, मूड बदलना या उदासी होना आम है, जो अधिक होने पर डिप्रैशन का रूप ले सकती है. स्तनपान करने में कोई परेशानी हो, तो तुरंत डाक्टर की सलाह लेनी चाहिए.
-बच्चे के आने के बाद आगे की योजना बनाना भी जरूरी होता है, मसलन बच्चे की देखभाल के लिए पेरैंट्स का औफिस से छुट्टी लेना, जरूरत के अनुसार बच्चे को संभालना आदि. हर काम में मिल कर फैसला लेने से बच्चे की परवरिश में कोई समस्या नहीं आती है. इस के अलावा बच्चे को शांत करना और रात में उठ कर देखभाल करना भी पिता को सीखना चाहिए, ताकि नवजात की जिम्मेदारियां दोनों मिल कर बराबर बांट सकें.
इस प्रकार देर से मातापिता बनना सही योजना, सही मैडिकल देखभाल और मजबूत रिश्ते के साथ एक अच्छा अनुभव होता है. अगर शुरुआत से सही प्लानिंग के साथ गर्भधारण कोई स्त्री करती है और दोनों मिल कर नवजात की जिम्मेदारियां निभाते हैं, तो किसी भी उम्र में एक स्वस्थ परिवार बनाया जा सकता है और खुशहाल जिंदगी जिया जा सकता है.
