रामायण और महाभारत काल से ही पुरुष प्रधान भारतीय समाज बच्चा न होने पर महिला को ही दोषी ठहरा कर उसे बांझ कहना शुरू कर देता है. लेकिन यदि देखा जाए तो वर्तमान समय में एकतिहाई जोड़ों में स्त्रियां बांझ हैं तो एकतिहाई जोड़ों में केवल वीर्य की खराबी प्राकृतिक गर्भाधान की विफलता का कारण है. फिर क्यों अकेले महिलाओं को ही बच्चा न हो पाने का दोषी ठहराया जाता है?
शादी के बाद एक निश्चित अवधि के अंदर यदि गर्भधारण न हो तो पतिपत्नी स्वाभाविक तौर पर स्त्रीरोग विशेषज्ञा के पास जाते हैं, जिस के बाद महिला को हर तरह की जांचपड़ताल से गुजरना पड़ता है. महिलाओं की जांच से पहले पुरुष की जांच बेहद जरूरी है, जो कई बार नहीं करवाई जाती और बच्चा न हो पाने का दोष महिला के सिर मढ़ दिया जाता है. जबकि सही रूप में देखा जाए तो बांझ दंपती में पुरुष के वीर्य का टैस्ट पहले होना चाहिए क्योंकि पुरुष के वीर्य विश्लेषण से ज्यादा आसानी से पता लगाया जा सकता है कि दिक्कत कहां है. यदि वीर्य अच्छा नहीं पाया जाता तो विकल्प के रूप में स्त्रीरोग विशेषज्ञा द्वारा वीर्यदाता (डोनर सीमन) की पेशकश कर दी जाती है. लेकिन अत्यधिक उन्नत चिकित्सा विज्ञान की दुनिया में पति की जगह किसी और के वीर्य का प्रतिस्थापन सही नहीं है.
