Amarkantak: मुझे अमरकंटक कई बार जाने का अवसर प्राप्त हुआ. पहली बार 2001 में गया था, जब शहडोल में कार्यरत था. मन में बड़ी उत्सुकता थी कि देश के इस बड़े पर्यटन स्थल को देखूं. वहां जब नर्मदा कुंड के पास पहुंचा तो मन में एक सवाल था कि क्या यही है वह नर्मदा, जिसे मैं ने मंडला, जबलपुर और होशंगाबाद में देखा है, जिस की विशालता और गहराई ने मुझे हमेशा हर्षित किया है? मगर सामने जो दृश्य था वह मेरी सारी कल्पनाओं से परे था.
यहां नर्मदा एक विशाल नदी के रूप में नहीं बल्कि एक नन्ही परी की तरह बह रही थी. वह कुंड से बाहर निकल कर एक बेहद पतली, निर्मल धारा के रूप में बह रही थी मानो कोई नन्ही बालिका अपने पांवों में पायलें पहने छमछम करती हुई अपने आंगन में दौड़ रही हो.
सुबह की पहली किरणें जब नर्मदा पर पड़तीं तो पानी इतना चमकता कि पलकें ?ापकना भी मुश्किल हो जाता. हरेभरे पेड़ों के बीच यह धारा इतनी शांत और सुखद लग रही थी कि उस पर विश्वास करना मुश्किल था. यह देख कर मुझे यकीन ही नहीं हुआ कि यही धारा बाद में एक विशाल नदी का रूप ले लेगी.
यह सुखद आश्चर्य था. यह नर्मदा का वह बाल स्वरूप था, जिस से मैं आज तक अनजान था. यह एक ऐसा अनुभव था, जिस ने नर्मदा से मेरा रिश्ता और भी गहरा कर दिया. उस की विशालता से तो मैं परिचित था लेकिन उस की इस मासूमियत ने मेरे दिल को छू लिया.
