लगभग हर समाज में इंसान बुढ़ापे के अपने सहारे सोचकर रखता है. लेकिन ज्यादातर लोगों की दिली इच्छा यही होती है कि जिंदगी में किसी के भरोसे न रहना पड़े. इसके लिए जरूरी है कि हम मौत के एक दिन पहले तक न केवल दिमागी और जिस्मानी रूप से सक्रिय रहें बल्कि कामकाज भी करते रहें ताकि हमारी नियमित आय का जरिया बना रहे और हमें अपने गुजर बसर करने के लिए किसी के सामने हाथ फैलाने की जरूरत न पड़े.
अगर आपको लगता है कि यह कोरी कल्पना है तो भूल जाइए. बहुत कम ही सही लेेकिन कई ऐसे लोगों के बारे में आपने सुना होगा या देखा होगा जो स्वभाविक मौत के एक सप्ताह पहले तक और कई तो बस, एक दो दिन पहले तक सक्रिय रूप से कामकाजी रहे होते हैं. सवाल है क्या यह जिस्मानी क्षमता के बदौलत संभव है या इसके लिए हमें दिमागी रूप से मजबूत और कठोर संकल्पों वाला होना पड़ता है. विषेषज्ञ कहते हैं दूसरा विकल्प ही कारगर है. दरअसल शरीर की निश्चित क्षमताएं नहीं होतीं, उसे आप चाहे तो जितना क्षमतावान बना सकते हैं. इसके लिए आपको दिमागी रूप से मजबूत होने की जरूरत होती है और बेहद अनुशासन प्रिय होने की भी.
