सवाल

मैं 21 वर्षीय युवती हूं. मेरी सगाई हुए 7 महीने हो चुके हैं. मेरे घर वालों ने सगाई में काफी पैसा लगाया था. शायद इसीलिए लड़के वाले बेशर्मी से मुंह खोल कर विवाह में लेनदेन की मांग कर रहे हैं. अपनी हैसियत से तो मेरे घर वाले करेंगे ही पर इस तरह से अनापशनाप मांगें सुन कर मेरा इस शादी से मन उठ गया है. मैं ने मां से साफसाफ कहा है कि वे इस रिश्ते को तोड़ दें पर उन का कहना है कि इस से बदनामी होगी और फिर मेरा भविष्य में कहीं रिश्ता नहीं होगा. मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब

आप को इस बारे में अपने मंगेतर से बात करनी चाहिए. हो सकता है कि लड़का घर वालों की इस मंशा से बेखबर हो. यदि लड़का भी इस सब में शामिल है तो आप को उस से शादी कतई नहीं करनी चाहिए. ऐसे लालची लोग ताउम्र आप को और आप के घर वालों को परेशान करते रहेंगे. सगाई तोड़ने के बाद आप की बदनामी होगी और फिर कहीं और रिश्ता नहीं होगा, यह बात सरासर गलत है. ऐसा कुछ नहीं होगा. हां, नया रिश्ता मिलने में थोड़ा समय लग सकता है. पर अभी आप की उम्र बहुत कम है, इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है.

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दहेज प्रथा भारत में प्रचलित कोई अनोखी प्रथा नहीं है. अलगअलग नाम और रूप से यह प्राचीन रोम, ग्रीस, यूनान, मिस्र जैसे दूसरे देशों में भी प्रचलित रही. यूरोप में प्रचलित दहेज प्रथा की झलक शेक्सपियर के नाटकों में मिलती है. एशियाई देशों में भी कमोबेश अंतर के साथ दहेज लेनादेना कायम रहा है.

दहेज का मूल उद्देश्य नवविवाहित दंपती को गृहस्थी जमाने में मदद करना होता है. कुछ लोग इसे उपहार का नाम भी देते हैं. यह प्रथा आज से नहीं, सदियों से चली आ रही है. उदाहरण के लिए रामायण काल का जिक्र किया जा सकता है. वाल्मीकि रामायण में साफ लिखा है कि विदेहराज ने सीता के विवाह में दहेज में बहुत सा धन और कई लाख गाएं दीं. इस के अतिरिक्त अच्छेअच्छे कंबल, रेशमी कपड़े, हाथीघोड़े, रथ, दासी के रूप में परम सुंदरी 100 कन्याएं काफी सेना, मूंगा आदि भेंट स्वरूपप्रदान किए.

आज भी समाज के पढ़ेलिखे वर्ग के लोग हों या मध्यवर्गीय, विवाह तय करते समय दहेज को चर्चा का आवश्यक हिस्सा बनाया जाता है. विवाह के समय दहेज की चीजों को सामाजिक हैसियत के रूप में प्रदर्शित किया जाता है. मुंहमांगा दहेज न मिलने पर लड़की की जिंदगी नरक बना दी जाती है. बात सिर्फ मारपीट तक ही सीमित नहीं रहती, वरन उसे जलाने या खुदकुशी के लिए मजबूर कर देने की घटनाएं भी आम हैं.

पौपुलेशन फाउंडेशन औफ इंडिया की ऐग्जिक्यूटिव डायरैक्टर, पूनम मुटरेजा कहती हैं, ‘‘भारत में दहेज प्रथा का ही परिणाम है कि औरतों को परिवार पर आर्थिक बोझ समझा जाता है. इस वजह से उन के साथ मारपीट जैसे अपराध किए जाते हैं. लिंग चयन और घरेलू हिंसा महिलाओं के साथ हो रहे भेदभाव का ही प्रदर्शन है.’’

क्या कहते हैं आंकड़े

नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2012 में देश भर में कुल 8,233 दहेज हत्या के मामले दर्ज हुए. पुलिस थाने में पहुंची रिपोर्ट के अनुसार, तकरीबन हर घंटे एक औरत दहेज की बलि चढ़ा दी गई. वर्ष 2007 में यह संख्या 8,093 थी जो 2010 में 8,391 और 2011 में 8,618 हो गई.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक जनवरी, 2001 से दिसंबर, 2012 तक दहेज हत्या के 91,202 मामले दर्ज कराए गए, जिन में से 84,013 पर कार्यवाही हुई. बाकी या तो तफतीश के दौरान छूट गए या उन की तफतीश की ही नहीं गई. 5,081 केसेज ऐसे भी थे, जो झूठे पाए गए थे.

रिट फाउंडेशन की प्रैसिडैंट, डा. चित्रा अवस्थी कहती हैं, ‘‘दहेज के मूल में पितृ सत्तात्मक पुरुषप्रधान समाज है. विवाह के बाद वधू वर के परिवार का हिस्सा बन जाती है और या तो उस के घर चली जाती है या उस के साथ नया घर बसाती है. पहले पत्नी स्वयं धनार्जन नहीं करती थी, इसलिए नए घर और गृहस्थी को बसाने में मदद के रूप में दहेज का रिवाज बना.

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