सवाल-

मेरी मां 66 साल की घरेलू महिला हैं. उन्हें सिर में कभी कोई चोट नहीं लगी और उन के साथ कभी कोई दुर्घटना भी नहीं हुई. लेकिन कुछ समय से उन्हें पार्किंसंस बीमारी के लक्षण महसूस हो रहे हैं. जैसे चलते समय कंपकंपाहट महसूस होना और लिखने में दिक्कत होना. क्या इस उम्र में बिना किसी शारीरिक चोट के पार्किंसंस बीमारी होना संभव है? क्या हमें न्यूरोलौजिस्ट से परामर्श लेना चाहिए या फिर ये सिर्फ कमजोरी के लक्षण हैं?

जवाब-

पार्किंसंस को बुजुर्गों की बीमारी ही कहा जाता है और यह बीमारी आमतौर पर 60 साल के बाद होती है. आप की मां को लिखने में दिक्कत और चलने में परेशानी हो रही है तो ये लक्षण पार्किंसंस बीमारी की हैं और यह जरूरी नहीं है कि सिर पर चोट लगने या दुर्घटना होने से ही पार्किंसंस बीमारी होने की संभावना रहती है. इसलिए समय रहते आप अपनी मां को न्यूरोलौजिस्ट को दिखाएं.

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हमारे मस्तिष्क का अनगिनत तंत्रतंत्रिकाओं का विस्तृत नैटवर्क एक कंप्यूटर के समान है, जो हमें निर्देश देता है कि किस प्रकार विभिन्न संवेदों, जैसे गरम, ठंडा, दबाव, दर्द आदि के प्रति प्रतिक्रिया व्यक्त की जाए. इस के साथ ही यह बोनसस्वरूप हमें भावनाओं व विचारों को सोचनेसमझने की शक्ति भी देता है. हम जो चीज खाते हैं, उस का सीधा असर हमारे मस्तिष्क के कार्य पर पड़ता है. यह सिद्ध किया जा चुका है कि सही भोजन खाने से हमारा आई.क्यू. बेहतर होता है, मनोदशा (मूड) अच्छी रहती है, हम भावनात्मक रूप से ज्यादा मजबूत बनते हैं, स्मरणशक्ति तेज होती है व हमारा मस्तिष्क जवान रहता है. यही नहीं, यदि मस्तिष्क को सही पोषक तत्त्व दिए जाएं तो हमारी चिंतन करने की क्षमता बढ़ती है, एकाग्रता बेहतर होती है व हम ज्यादा संतुलित व व्यवस्थित व्यवहार करते हैं.

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