Casteism : ऊंची जातियों के लोग अकसर यह दावा करते रहते हैं कि आजकल जातियां कहां रह गई हैं और खूब इंटरकास्ट मैरिज हो रही हैं. वे यह छिपा जाते हैं कि ये इंटरकास्ट मैरिजें या तो सवर्णों में यानी ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, कायस्थों में आपस में हो रही हैं या कुछ पिछड़ी जातियों जैसे कुर्मी, यादव में आपस में हो रही हैं. न सवर्ण, न पिछड़े ओबीसी तक के अछूत जिन्हें आज एससीएसटी कहा जा रहा है, एकदूसरे से शादी करने को तैयार हैं.

टाइम्स औफ इंडिया के 15 दिसंबर, 2024 के मैट्रीमोनियल विज्ञापनों में ‘कास्ट नो बार’ कौलम से भी वैवाहिक विज्ञापन छपे हैं और इन में पहले विज्ञापनदाता ने अपनी जैन जाति बना दी, दूसरे ने मित्तल, तीसरे ने श्रीवास्तव, चौथे ने जाट, 5वें ने कोली, छठे अमेरिका में रह रहे ने राजपूत पुंडीर, 8वेें ने जाट, 10वें ने सोनी, 11वें ने माथुर, 12वें ने पंजाबी खत्री, 15वें ने कुमाऊंनी ब्राह्मण, 17वें ने जैन, 19वें ने ब्राह्मण, 20वें ने बंगाली, 21वें ने सिख, 22वें ने सिंधी बना दी.

केवल 2-3 ऐसे थे जिन्होंने जाति नहीं बनाई क्योंकि वे विदेशों में रह रहे थे जहां रह कर भारतीय मूल के लोग थोड़ाबहुत फर्क भूलने लगे हैं.

विवाहों में जाति की जरूरत क्यों हो? विवाह का सुख जाति से नहीं व्यवहार से तय होता है पर जाति का मकड़जाल इस कदर जकड़ा हुआ है कि जिन की पहली शादी अपनी जाति में शायद कुंडली आदि देख कर हुई, वे भी सैकंड मैरिज के विज्ञापनों में अपनी जाति का उल्लेख करना नहीं भूलते.

मैट्रीमोनियल साइट्स और अखबारों के मैट्रीमोनियल विज्ञापनों में बाकायदा जातियों के हिसाब से खाने बने हुए हैं. ऊंची जातियों वाले कई बार यह जोड़ देते हैं ‘नो कास्ट बार’ पर इस का अर्थ होता है कि वे ब्राह्मण, श्रत्रिय, वैश्य या कायस्थ में किसी से भी शादी के लिए तैयार हैं.

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