Health System: स्वास्थ्य किसी भी सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है क्योंकि यह सीधे जनता के जीवन से जुड़ा विषय है. पर दिल्ली हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणियों से यह स्पष्ट होता है कि दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था गंभीर लापरवाही का शिकार है.

माननीय अदालत ने जिस प्रकार सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं, वह केवल प्रशासनिक चूक नहीं बल्कि मानवीय संवेदनाओं की अनदेखी भी दर्शाता है.

गंभीर लापरवाही

दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में आज भी बेड की कमी, दवाओं का अभाव, डाक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की अपर्याप्त संख्या जैसी समस्याएं बनी हुई हैं. गंभीर रोगियों को समय पर इलाज न मिल पाना स्वास्थ्य तंत्र की विफलता को उजागर करता है.

सरकार द्वारा स्वास्थ्य बजट बढ़ाने के दावे तो किए जाते हैं, लेकिन उस का वास्तविक लाभ जमीनी स्तर तक नहीं पहुंच पाता.

कागजों तक सीमित योजनाएं

दिल्ली सरकार को 2025-26 के बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए कुल ₹6,874 करोङ का आवंटन किया गया. स्वास्थ्य बजट में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, स्वास्थ्य वैलनेस केंद्रों और अन्य सेवाओं को मजबूत करने पर जोर दिया गया. मगर लगता है कि ये योजनाएं कागजों तक ही सीमित रह जाती हैं और आम नागरिक उन की कीमत अपनी पीड़ा से चुकाता है.

अदालत का हस्तक्षेप

अदालत का हस्तक्षेप यह संकेत देता है कि प्रशासन अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में असफल रहा है. यदि समय रहते सुधार किए जाते, तो न्यायिक दखल की आवश्यकता ही न पड़ती.

लापरवाही का सब से बड़ा दुष्प्रभाव गरीब और मध्यवर्ग पर पड़ता है, जिन के पास निजी अस्पतालों का विकल्प नहीं होता. इस से सामाजिक असमानता और असुरक्षा की भावना और गहरी हो जाती है.
स्वास्थ्य व्यवस्था केवल इमारतों और मशीनों से नहीं चलती, बल्कि जवाबदेही, संवेदनशीलता और कुशल प्रबंधन से चलती है.

चौंकाने वाली रिपोर्ट

सीएजी रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली के कई सरकारी अस्पतालों में आधा से ज्यादा अस्पतालों में आईसीयू की सुविधा नहीं है. लगभग 60% में ब्लड बैंक नहीं है. कई अस्पतालों में एंबुलेंस या आपातकालीन सुविधाएं अनुपलब्ध हैं. वहीं अस्पतालों में विशेषज्ञ डाक्टरों के पदों में लगभग 38% तक रिक्तता है, जिस से मरीजों को इलाज में देरी होती है और ओपीडी में बहुत भीड़ रहती है.

दिल्ली की भाजपा सरकार को चाहिए कि वह अदालत की टिप्पणी को चेतावनी मानते हुए ठोस कदम उठाए, ताकि सरकारी अस्पताल वास्तव में जनता के लिए भरोसेमंद बन सकें.

जब तक स्वास्थ्य को राजनीतिक घोषणापत्र से निकाल कर मानवीय दायित्व के रूप में नहीं देखा जाएगा, तब तक ऐसी लापरवाहियां सामने आती रहेंगी और आम नागरिक इस की सब से भारी कीमत चुकाता रहेगा.

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