Dowry System: भारत आज विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में ऊंचाइयां छू रहा है, परंतु दहेज जैसी कुप्रथाएं अब भी हमारे मानसिक विकास पर प्रश्न उठाती हैं. यह केवल सामाजिक बुराई नहीं, बल्कि उन लड़कों की मानसिक अस्वस्थता का प्रतीक है जो विवाह जैसे पवित्र बंधन को लेनदेन का सौदा बना देते हैं.
दहेज प्रथा भारतीय समाज में पितृसत्तात्मक सोच, आर्थिक असमानता और लैंगिक भेदभाव का परिणाम है. विवाह के बाद महिलाओं को बोझ समझने की प्रवृत्ति आज भी बनी हुई है. दहेज मांगने वाले परिवार महिलाओं को वस्तु के रूप में देखते हैं, जिससे हिंसा और मानसिक शोषण बढ़ता है.
भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 80 और 85 के बावजूद, कई मामले “पारिवारिक विवाद” कहकर दबा दिए जाते हैं. वर्ष 2017 से 2022 के बीच 6,100 से अधिक दहेज हत्याएं दर्ज हुईं. उपभोक्तावाद, आर्थिक दबाव और भव्य विवाह संस्कृति ने इस कुप्रथा को और गहरा बना दिया है, जो समाज की मानसिक अस्वस्थता को दर्शाता है.
दहेज मांगने वाले लड़के न केवल अपने व्यक्तित्व की कमजोरी दिखाते हैं, बल्कि विवाह की नींव को पहले दिन से ही खट्टा कर देते हैं. जो रिश्ता प्रेम, समानता और सम्मान पर टिकना चाहिए, वह लालच और दिखावे के बोझ तले टूटने लगता है. ऐसे पुरुष यह नहीं समझते कि दहेज लेकर वे पत्नी का नहीं, बल्कि अपनी सोच का अपमान कर रहे हैं.
निकी जैसी घटनाएं यह दर्शाती हैं कि दहेज अब केवल लालच नहीं, बल्कि मानसिक रोग का रूप ले चुका है. यह पुरुषों की असुरक्षा और हीनभावना का परिणाम है. जब परिवार और समाज ऐसे व्यवहार को “परंपरा” कहकर स्वीकार करते हैं, तो वे भी इस मानसिक बीमारी को बढ़ावा देते हैं.
अब समय है कि लड़के खुद यह संकल्प लें कि वे दहेज नहीं लेंगे — क्योंकि आत्मसम्मान और सच्चे प्रेम का कोई मोल नहीं होता. दहेज मांगने वाला लड़का केवल पैसे नहीं लेता, वह अपने रिश्ते की गरिमा और पत्नी के सम्मान को भी गिरवी रख देता है.
लड़के वाले लड़को को चेक मानते हैं जिन्हें शादी के बंधन में बांधते समय लड़की पक्ष से मन मुताबिक कैश कराया जाता है. वास्तविक प्रगति तभी होगी जब पुरुष वर्ग स्वयं इस सोच को बदले और विवाह को सम्मान, समानता और साझेदारी का बंधन समझे न कि सौदेबाजी का मंच. जब लड़के यह ठान लेंगे कि दहेज नहीं चाहिए, तब समाज अपने आप बदल जाएगा.
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