यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में यक्ष, युधिष्ठिर से पूछता है, ‘आसमान से भी ऊंचा क्या है ?’ युधिष्ठिर कहते हैं, ‘पिता’ और यक्ष खुश हो जाता है. आगामी फादर्स डे पर सोशल मीडिया में भी हम पिता नामक प्राणी को कुछ ऐसे ही अलंकरणों से सुशोभित होते देख, सुन और पढ़ सकते हैं. इस दिन पिता का गुणगान करने वाले कुछ प्रकार के शेर भी पढ़ने को मिलेंगे-

लिखके वालिद की शान कागज पर रख दिया आसमान कागज पर लेकिन इन रस्मी बुलंदियों से पिता और पितृत्व को लेकर कोई भ्रम भले हम पाल लें हकीकत यह है कि पिता और पितृत्व दोनो ही संकट में हैं. यह कोई अपने देश की बात नहीं है पूरी दुनिया में इन पर ये संकट मंडरा रहा है.  अब अगर हम इस भूमंडलीय युग में भी यह कहें कि दुनिया से हमें क्या लेना देना तब तो अलग बात है नहीं तो हकीकत हमारी नींद उड़ा देगी. भारत सहित ज्यादातर एशियाई देशों में तो फिर भी अभी गनीमत है, लेकिन अमरीका और यूरोपीय देश तेजी से अनुपस्थित पिता वाले समाज बनते जा रहे हैं. अनुपस्थित पिता यानी जिनकी पिता के तौरपर भौतिक मौजूदगी संतान को हासिल नहीं है.

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अमरीका और यूरोप में बहुत तेजी से अनाथ बच्चों का समाज बन रहा है. इसकी वजह यही है अदृश्य या अनुपस्थित पिता. हालांकि समाजशास्त्री पिता के अस्तित्व पर इस संकट को कोई बहुत ताजा संकट नहीं मान रहे. उनके मुताबिक पिता नाम की संस्था पर संकट का यह सिलसिला तो औद्योगिक क्रांति के बाद से ही शुरू हो गया था.

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