लेखिका: सबा गुरमत

किस्मत ने एक मोड़ लिया और दीपिका म्हात्रे सुर्खियों में आ गईं. उन की कामयाबी का रास्ता बनाने में दूसरी महिलाओं ने तो उन का साथ दिया ही, इस के अलावा उन के खुद के निर्भीक स्वभाव ने भी उन के लिए राह बनाई.
यह आदत थी, बिना किसी डर के उन नाइंसाफियों का हंस कर सामना करना, जो रोजमर्रा की जिंदगी में उन्हें झेलनी पड़ती थीं.

साल 2017 के मार्च महीने के शुरुआती दिनों में दीपिका घरेलू कामगार के तौर पर एकसाथ कई जगहों पर काम कर रही थीं. एक दिन उन को महिला दिवस पर आयोजित किए जा रहे एक कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया.
यह कार्यक्रम संगीता व्यास ने आयोजित किया था, जो उसी हाउसिंग सोसाइटी की निवासी थीं, जहां दीपिका और उन की बड़ी बहन रागिनी काम करती थीं. इस कार्यक्रम के माध्यम से लोग अपने हुनर का प्रदर्शन कर रहे थे. रागिनी ने एक जोरदार गाना गाया, उन की एक और दोस्त ने नृत्य किया, लेकिन दीपिका का इरादा कुछ और ही था.
दीपिका ने याद किया कि उन्होंने संगीता से कहा था, ‘मैं कुछ कौमेडी करूंगी.’ लेकिन जब वे मुंबई के पश्चिमी उपनगर गोरेगांव स्थित, अब बंद हो चुके सभागार ‘पितारा द आर्ट बौक्स’ के मंच पर पहुंचीं, तब उन्हें खुद भी नहीं पता था कि वे क्या करने वाली हैं. फिर वे दर्शकों की तरफ मुड़ीं, अपनी जिंदगी के अनुभवों को साझा किया और उन लोगों पर चुटकी ली जिन्होंने उन के जैसे कामगारों की जिंदगी को थोड़ा बेवजह मुश्किल बनाया था.

कार्यक्रम के दौरान दीपिका ने बताया, ‘‘जब भी मैं नियोक्ताओं के घर खाना बनाती थी तो मैडम मु?ा से कहती थीं कि दीपिका, रोटी में ज्यादा घी मत डालना, सैंडविच में ज्यादा चीज मत डालना, मैं डाइट पर हूं, मेरा वजन बढ़ा तो गलती तुम्हारी होगी. तब मैं कहती कि अगर मेरा थोड़ा सा घी आप का वजन बढ़ा देगा तो आप जो रात को पिज्जाबर्गर खाते हैं उन का क्या? उन्हें तो पहले कम करना पड़ेगा.’’

जिंदगी में बदलाव

किस्मत से कार्यक्रम के दिन वहां रिचल लोपेज नाम की एक पत्रकार भी मौजूद थीं. जब कार्यक्रम समाप्त हुआ, तो उन्होंने दीपिका से बातचीत की और जल्द ही उन्हें जानीमानी स्टैंड-अप कौमेडियन अदिति मित्तल से मिलवाया. यहीं से दीपिका की जिंदगी में बदलाव आने शुरू हुए.

अदिति ने दीपिका को अपने साए में लिया. उन्होंने दीपिका के जोक्स की धार को तराशने में मदद की, मंच पर प्रस्तुत करने का सलीका सिखाया और कौमेडी सर्किट में लोगों से जुड़ने में मदद की.

दीपिका ने बताया, ‘‘उन्होंने मुझे बहुत कुछ सिखाया. स्टेज पर कैसे खड़ा होना है, माइक कैसे पकड़ना है, कब मुड़ना है और जब दर्शक हंसें तो क्या करना है. पहले तो मैं बस मंच पर जाती थी, खड़ी होती थी, कुछ भी बोल देती थी और मस्ती करती थी.’’

दीपिका अपने पति दिलीप के साथ

मार्च, 2018 में अदिति के यूट्यूब शो ‘बैड गर्ल्स’ में दीपिका की एक परफौर्मैंस की रिकौर्डिंग दिखाई गई. यह शो उन महिलाओं को पेश करता था जो पारंपरिक रास्तों से हट कर काम कर रही थीं. दीपिका की यह परफौर्मैंस मुंबई के पौश उपनगर बांद्रा में स्थित कौमेडी वेन्यू ‘हैबिटैट’ में हुई थी.

चटक लाल और सुनहरे कुरते में सजी दीपिका ने जैसे ही माइक संभाला वे बिलकुल सहज नजर आ रही थीं. वे बोलीं, ‘‘नमस्ते, मैं दीपिका म्हात्रे हूं, मैं मेड का काम करती हूं. मैं ने देखा है कि स्टैंड-अप कौमेडियन हमेशा अपनी मेड की स्टोरी बोलते हैं, मगर आज मैं बोलूंगी.’’

सैट के दौरान दीपिका ने मुसकराते हुए सुखसुविधाओं में जीने वालों की सोच पर तंज कसा. दीपिका ने सब से सख्त आलोचना उन लोगों के लिए रखी जो अपने घरेलू कामगारों के साथ अन्याय करते हैं. जहां रोजमर्रा की आदतों में जाति और वर्ग का भेदभाव अकसर छिपा होता है और काम के अनौपचारिक ढांचे की वजह से शोषण की गुंजाइश बनी रहती है. उन्होंने कहा, ‘‘मैं जिस बिल्डिंग में काम करने जाती हूं, वहां मैं बहुत स्पैशल हूं क्योंकि वहां मेरे लिए लिफ्ट अलग है और बरतन भी अलग हैं.’’ कुछ पल ठहर कर वे फिर बोलीं, ‘‘आप छिपाओ अपने बरतन, रोटी तो आप मेरे ही हाथ की तोड़ते हो न.’’इतना सुनते ही सभागार दर्शकों की तालियों और सीटियों से गूंज उठा.

 फुलटाइम कौमेडियन के रूप में स्थापित

तब से अब तक 50 वर्षीय दीपिका ने खुद को फुलटाइम कौमेडियन के रूप में स्थापित किया है और वे न केवल भारत में बल्कि विदेश में भी अपनी पहचान बना रही हैं. उन्होंने कई पुरस्कार जीते हैं, जिन में से एक उन्हें मशहूर बौलीवुड अभिनेत्री करीना कपूर खान के हाथों मिला, जिसे वे गर्व से याद करती हैं. उन्हें कई टैलीविजन शो में भी आमंत्रित किया गया है, जिन में जीटीवी प्रस्तुत ‘डांस इंडिया डांस: सुपरमौम्स’, स्टार प्लस प्रस्तुत ‘सब से स्मार्ट कौन?’ और मराठी गेम शो ‘सक्के शेजारी’ शामिल हैं. लाइव शो के साथसाथ वे कई ब्रैंड्स के विज्ञापनों में भी नजर आ चुकी हैं. ब्रिटेन के अखबार द गार्जियन में छपे एक सराहनीय प्रोफाइल में लिखा गया, ‘‘म्हात्रे के सैट्स को भारत की गहरी सामाजिक असमानता और अमीरों की गरीबों को बराबर न समझ पाने की कमजोरी पर तीखा प्रहार माना जा सकता है.’’

भारत के समकालीन कौमेडी सीन में, जहां अधिकांश कलाकार जाति और वर्ग के विशेषाधिकार वाले हैं, वहां अकसर हाशिए के लोगों को मजाक का पात्र बनाया जाता है. लेकिन दीपिका उन कुछ चुनिंदा हास्य कलाकारों में से हैं जो इस ढांचे को पलट रही हैं. उन का हास्य अभिजात वर्ग को खुश करने के बजाय उन से टकराने और उन को जगाने के लिए है.

अमीरों को आईना दिखाना चाहती

‘‘मैं अमीरों को आईना दिखाना चाहती हूं,’’ उन्होंने मुझसे कहा. हमारी बातचीत 2018 में उसी हैबिटैट वेन्यू में हो रही थी, जहां उन्होंने अपने कैरियर की शुरुआत में प्रदर्शन किया था.
‘‘मैं चाहती हूं कि वे यह समझ जाएं कि हम भी इंसान हैं,’’ दीपिका ने कहा.

दीपिका का जन्म मुंबई के प्रभादेवी इलाके की एक चाल में हुआ था, जो सिद्धिविनायक मंदिर से कुछ ही कदमों की दूरी पर है. इस एकजुट बस्ती में बड़े होते हुए दीपिका को बचपन से ही हंसीमजाक और खेलकूद से प्यार हो गया था.

‘‘चाल में हर तरह के फंक्शन होते थे. गणपति, नवरात्रि, दीवाली, शादीब्याह हम सब एकदूसरे के घर जाते थे और बहुत मजा करते थे. उसी वक्त से मुझे मजाक करना अच्छा लगने लगा था,’’ दीपिका ने बताया.

हालांकि दीपिका को अदिति मित्तल की कौमेडी पसंद है और वे अभिनेता कौमेडियन जानी लीवर और उन की बेटी जैमी लीवर के काम को भी फौलो करती हैं, लेकिन उन की शुरुआती प्रेरणा के स्रोत केवल उन की अपनी जिंदगी और आसपास का माहौल था.

दीपिका के पिता एक सरकारी अस्पताल में क्लर्क थे और मां वड़ापाव की छोटी सी ठेली चलाती थीं. दोनों मिल कर 5 बच्चों का पालनपोषण करते थे. ‘‘मेरी असली प्रेरणा मेरे मातापिता हैं क्योंकि वे बेहद मेहनती थे,’’ दीपिका ने कहा, ‘‘वे दिनरात काम करते थे.’’ दीपिका ने 10वीं कक्षा तक की अपनी पढ़ाई म्युनिसिपल स्कूल से की. वे स्कूल में चुपचाप रहने वाली छात्रा थीं, जो ज्यादा हलचल में नहीं पड़ती थीं.

‘‘मैं ने कभी किसी स्कूल प्रोग्राम में हिस्सा नहीं लिया,’’ उन्होंने याद करते हुए कहा.

‘‘मुझे तो बस दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ मजाक करने की आदत थी,’’ उन्होंने नीबू पानी पीते हुए कहा.

उन दिनों दीपिका एक और नाम से जानी जाती थीं, कमल. शादी के बाद उन्होंने अपना नाम बदल दिया. उस समय वे 20 साल की थीं. दीपिका याद करते हुए बताती हैं, ‘‘मेरे पति भी उसी चाल से थे, उन के परिवार ने मेरे बारे में मेरे घर वालों से बात की थी.’’

दीपिका के पति दिलीप, जो अब 55 साल के हैं, पहले एक सिक्युरिटी गार्ड के तौर पर काम करते थे.

शादी के तुरंत बाद यह नवविवाहित जोड़ा कांदिवली चला गया, जो दीपिका के मायके से करीब 26 किलोमीटर दूर था. वहां वे दिलीप के बड़े परिवार के साथ रहने लगे, जिस में उन के 5 भाई भी शामिल थे. वहां से वे और उत्तर की ओर बढ़े, पहले विरार और आखिरकार नल्लासोपरा बस गए.

टाइनी मिरेकल्स फाउंडेशन के साथ स्टैंड-अप शो के लिए हुए कोलौबोरेशन के दौरान एक औडियंस मेंबर दीपिका के साथ सैल्फी लेते हुए

संघर्ष के वे दिन

शादी के कुछ साल बाद दिलीप को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं होने लगीं, जिन में अस्थमा भी शामिल था, जो लगातार बिगड़ता गया. उस समय दीपिका और दिलीप 3 बेटियों की परवरिश कर रहे थे, जिन का उन्होंने इंग्लिश मीडियम स्कूल में दाखिला कराया था. दिलीप की सैलरी का अकसर आधा हिस्सा उन के इलाज पर खर्च हो जाता था.

‘‘मैं ने उन से कहा कि आप घर पर रहें, बच्चों और घर का खयाल रखें और मैं बाहर जा कर काम ढूंढ़ लूंगी,’’ दीपिका याद करते हुए बताती हैं.

‘‘जो भी काम मिला, मैं ने किया,’’ दीपिका ने कहा. उस समय वे लगभग 25 साल की थीं. उन के दिन का शैड्यूल बेहद थकाऊ होता था.

वे सुबह 3 बजे उठतीं, आटा गूंथतीं और स्कूल की शिक्षिकाओं को देने के लिए रोटियां बनाती थीं. फिर वे अपने बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करतीं और घर के बाकी कामों को संभालतीं. सुबह 9 बजे वे अचार, पापड़ और फरसान (नमकीन स्नैक्स) आसपास की बस्तियों में बेचने निकल जातीं.

‘‘मैं ने इतनी मेहनत की है, बाप रे, पूछो ही मत,’’ दीपिका ने कहा. उन की रोज की कमाई मुश्किल से 150 रुपए होती थी, जो जरूरत की चीजों में ही खत्म हो जाती थी. बाद में दीपिका को एक एजेंसी के जरीए केयरटेकिंग का काम मिला.

‘‘मैं ने 104 साल के अंकल की देखभाल की है. एक दिन के बच्चे की भी और आंटियों की भी,’’ उन्होंने बताया. लेकिन यह काम फिर भी उन के घर का खर्च चलाने के लिए काफी नहीं था.

2010 के शुरुआत में दीपिका ने लोकल अखबार में घरेलू कामगार एजेंसी का एक विज्ञापन देखा और उस नौकरी के लिए आवेदन किया. इंटरव्यू के लिए वे मुंबई के पश्चिमी उपनगर मलाड की एक हाउसिंग सोसाइटी में गईं. मैं ने उन से कहा, ‘‘जो भी काम है, मैं कर लूंगी. मेरी हालत बहुत खराब है,’’ उन्होंने याद करते हुए बताया.

उस दंपती ने उन्हें खाना बनाने के काम पर रख लिया. जल्द ही दीपिका 5 घरों में काम करने लगीं और लोकल ट्रेन में नकली गहने बेच कर अपना गुजारा चलाने लगीं.

करीब 10 साल तक रोज दीपिका का दिन सुबह 4 बजे शुरू होता था. तब वे लोकल ट्रेन में गहने बेचने निकल जाती थीं. फिर दोपहर तक घरघर जा कर खाना बनातीं और सफाई का काम करतीं. इस काम को निबटाने के बाद वे सीधे थोक बाजार जातीं, जहां से वे गहनों का नया स्टौक ला कर अगली सुबह की तैयारी करतीं.

लोकल ट्रेन में दीपिका के ग्राहक अकसर 10 रुपए जैसी छोटी रकम पर भी खूब मोलभाव करते थे. ग्राहकों द्वारा किए जाने वाले बेधड़क मोलभाव पर दीपिका की पैनी नजर 2018 के हैबिटैट में किए गए स्टैंड-अप सैट में भी दिखाई देती है.

‘‘मौल में जाते हैं आप लोग, उधर स्टिकर पे जो भाव रहता है वही भाव देते हैं. उधर ऐसा मांडवल नहीं करते,’’ उन्होंने कहा, ‘‘तो मैं ने भी स्टिकर लगाना चालू कर दिया है. यहां इंसान के लिए दया कम और स्टीकर के लिए इज्जत ज्यादा है,’’ दीपिका ने तीखे व्यंग्य के साथ जोड़ा.

पूरे दिन कई घरों में मेहनत करने के बाद भी दीपिका को कुल मिला कर लगभग 15 हजार रुपए ही मिलते थे, हर घर से करीब 3 हजार रुपए. नकली गहनों की बिक्री से होने वाली अतिरिक्त आमदनी मिला कर उन की कुल कमाई मुश्किल से 20 हजार से 25 हजार रुपए तक पहुंचती थी.

लेकिन अब उन्होंने मुसकुराते हुए कहा, ‘‘जितना मैं पहले एक महीने में नहीं कमा पाती थी, उतना कभीकभी अब एक ही दिन में कमा लेती हूं.’’

दीपिका अपनी ज्वैलरी शौप में. फुल टाइम कौमेडी कैरियर चुनने के बाद दीपिका ने इमिटेशन ज्वैलरी स्टोर भी शुरू किया.

कड़वी सचाइयां सामने लाती हैं

हालांकि दीपिका की कौमेडी कड़वी सचाइयां सामने लाती हैं. वे इसे हमेशा हलके अंदाज में पेश करती हैं. खुद पर तंज करते हुए और अपनी हंसी से माहौल को खुशनुमा बनाते हुए.

एक बार बैंगलुरु में एक शो के दौरान, दीपिका ने बताया, ‘‘एक दर्शक को पतिपत्नी के रिश्तों में लैंगिक असमानता पर किए गए उन के मजाक से आपत्ति हो गई,’’ मैं ने उन से कहा, ‘‘सर, मैं ने यह कभी नहीं कहा कि सारे पति बुरे होते हैं. लेकिन 10त्न पति ऐसे जरूर होते हैं जो शराब पीते हैं, अपनी पत्नियों को मारते हैं, झगड़ा करते हैं और मेरे जोक्स उन लोगों के बारे में होते हैं,’’ शायद दीपिका उस आदमी का मन बदलने में सफल रहीं. प्रदर्शन के बाद वे उन्हें कौमेडी सैट पर बधाई देने आए.

दीपिका कहती हैं कि जिंदगी का कोई भी पहलू मजाक से परे नहीं है. चाहे वे रोमांटिक रिश्ते हों या राजनीति, ‘‘लेकिन मुझे अमीरों पर मजाक करना था,’’ उन्होंने साफ कहा.

हमारी बातचीत के दौरान उन का फोन लगातार आने वाले नोटिफिकेशन से बज रहा था. दीपिका बताती हैं कि इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफौर्म्स ने उन की पहुंच को काफी बढ़ाया है, ‘‘अब मैं दूसरे शहरों में भी शो करती हूं जैसे बैंगलुरु, हैदराबाद और भी कई जगहों पर. लोग मुझे इंस्टाग्राम पर डाइरैक्ट मैसेज कर के अपने इवेंट्स में परफौर्म करने के लिए बुलाते हैं या स्टैंड-अप करने का आग्रह करते हैं,’’ इतना ही नहीं, उन्हें विदेशों से भी आमंत्रण आने लगे हैं.

जब तक दीपिका ने खुद मंच पर कौमेडी नहीं की थी, तब तक उन्होंने इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया था. उन्होंने कुछ टैलीविजन शो जरूर देखे थे, लेकिन उन में से कोई भी उन के मन पर असर नहीं छोड़ पाया. अदिति मित्तल के साथ हुई बातों ने उन्हें यह एहसास दिलाया कि एक घरेलू कामगार के रूप में उन के पास ऐसे अनुभव हैं जो इस इंडस्ट्री में किसी और के पास नहीं हैं और यही उन की सब से बड़ी ताकत है.

हास्य को एक नया आकार देती है

घरेलू काम के 2 दशकों की आपबीती दीपिका के हास्य को एक नया आकार देती है. उन के अपने अनुभवों के साथ ही उन की उन सहेलियों के अनुभव भी शामिल हैं, जो इस काम में हैं. अदिति की सलाह पर दीपिका ने अपने उन विचारों और तजरबों को लिखना शुरू किया, जिन्हें वे स्टैंड-अप में विकसित करना चाहती थीं. उस के बाद से अब तक वे कई डायरियां भर चुकी हैं, उन्होंने बताया.

दीपिका बताती हैं, ‘‘अमीर लोग जब खुद के लिए चाय बनाते हैं, तो उस में खूब सारा दूध डालते हैं, लेकिन जब हमारे लिए बनाते हैं तो उस में थोड़ा सा दूध डाल कर कहते हैं कि यह तुम पी लो. उन की कुछ सहेलियों को तो चाय भी नहीं मिलती या फिर उन्हें वे गिलास दिए जाते हैं जो खासतौर पर कामवालों के लिए रखे गए होते हैं. यहां तक कि जब कुछ घरों में काम करने वालों को खाना भी दिया जाता है, तो वह अकसर बासी होता है.

‘‘अगर आप को खाना देना ही है,’’ दीपिका कहती हैं, ‘‘तो 2 दिन पहले क्यों नहीं देते? मुझे यह बहुत गलत लगता है.’’

दीपिका ने याद किया कि कई बार जब वे किसी ऐसी लिफ्ट में चढ़ गईं जो सिर्फ रिहायशियों के लिए थी, तो लोग गुस्से में चिल्लाने लगे थे, ‘‘हम आप के घरों के अंदर आते हैं, आप के लिए खाना बनाते हैं, आप हमारे हाथों से मसाज तक करवाते हैं. हम आप की सारी सफाई करते हैं,’’ दीपिका ने ऐसे लोगों को संबोधित करते हुए कहा, ‘‘तो फिर आप हमें अपनी लिफ्ट में खड़ा क्यों नहीं देख सकते?’’

ऐसी बातें दीपिका को चुभती हैं. ‘‘इसी तरह के भेदभाव के खिलाफ मैं अपनी आवाज उठाना चाहती हूं,’’ उन्होंने कहा.

जब भी दीपिका के दिमाग में कोई नया आइडिया आता है, तो वे पहले उसे डायरी में दर्ज करती हैं. उस के बाद वे लगभग 1 महीने तक उस पर मेहनत करती हैं. उस की टाइमिंग, संदर्भ और प्रस्तुति को निखारती हैं, तब फिर जा कर मंच पर प्रस्तुत करती हैं. अदिति मित्तल आज भी उन की स्क्रिप्ट और परफौर्मैंस को संवारने में मदद करती हैं. एक समय तो ऐसा था कि दोनों का एजेंट भी एक ही होता था.

शुरुआत में दीपिका को इस बात की चिंता थी कि उन की जिंदगी और पृष्ठभूमि बाकी भारतीय कौमिक्स से काफी अलग है. उन्हें डर था कि क्या वे इस दुनिया में खुद को फिट कर पाएंगी. लेकिन जल्द ही उन्होंने महसूस किया कि ज्यादातर कौमेडियन ने उन्हें खुले दिल से अपनाया, ‘‘कभी किसी ने मेरा मजाक नहीं उड़ाया,’’ दीपिका ने कहा, ‘‘कई बार तो उन्होंने मुझे टैक्निक्स सिखाने में भी मदद की.’’

दीपिका कहती हैं कि जब कुछ कौमेडियन घरेलू कामगारों को आसान मजाक का जरीया बनाते हैं, तो उन्हें बुरा लगता है. ‘‘एक घरेलू कामगार अपना घर छोड़ कर आप के घर आती है, अपना काम पूरी ईमानदारी से करती है,’’ दीपिका ने कहा, ‘‘तो आप उस का मजाक मत उड़ाइए, उसे छोटा मत दिखाइए.’’

2021 में टूथपेस्ट ब्रैंड कोलगेट ने दीपिका की जिंदगी पर आधारित एक लंबा विज्ञापन बनाया. इस विज्ञापन में उन के जीवन की झलक दिखाई गई. उन के घर से ले कर लोकल ट्रेन में सफर और फिर स्टेज पर उन की परफौर्मैंस तक. विज्ञापन का अंत  “Keep India Smiling”   नामक कोलगेट की छात्रवृत्ति योजना के प्रचार से होता है. यह छात्रवृत्ति वंचित बच्चों के लिए है. फिलहाल दीपिका कुछ हिंदी और मराठी टीवी चैनलों से बातचीत कर रही हैं ताकि वे शो होस्ट करने की संभावनाएं तलाश सकें.

बाएं से दाईं तरफ संगीता व्यास , निधि गोयल, अदिति मित्तल और पत्रकार फे डिसूजा के साथ दीपिका.

पहचान और शोहरत

इस तरह की पहचान और शोहरत ने उन लोगों का नजरिया बदल दिया है. अब वे उन्हें सम्मान से देखने लगे हैं. लेकिन दूसरी ओर दीपिका बताती हैं, ‘‘उन के कुछ रिश्तेदारों में कुंठा पैदा हुई है. कभीकभी मेरे रिश्तेदार ताना मारते थे- कहते थे कि अखबार में यह क्या छपा है, तुम्हें कामवाली बाई कह रहे हैं,’’ दीपिका ने याद करते हुए कहा, मैं उन से कहती कि कम से कम मेरा नाम तो छपा है, आप का तो कहीं नहीं आया.’’

दीपिका खुद ‘बाई’ शब्द को अपमानजनक मानती हैं. ‘बाई’ के बजाए वे ‘ताई’ का इस्तेमाल करने की वकालत करती हैं. मराठी भाषा में यह सम्मान से, बड़ी बहन के लिए कहा जाता है.

दीपिका बताती हैं कि उन के सब से बड़े समर्थक उन के पति और बेटियां ही रही हैं. उन की मं?ाली बेटी ऐश्वर्या, जो एक इवेंट मैनेजर हैं, अब दीपिका की बुकिंग्स भी संभालती हैं. दीपिका की बेटियों से कभीकभी यह भी पूछा जाता है कि क्या वे अपनी मां को परफौर्म करने के लिए राजी कर सकती हैं. वे कहती हैं, ‘‘हमारी मां पैसे लेती हैं, फ्री में नहीं आतीं, आप को उन के मैनेजर से बात करनी पड़ेगी,’’ दीपिका ने हंसते हुए बताया, ‘‘उन्हें भी इस बात पर गर्व होता है.’’

हैबिटैट, जहां दीपिका ने अपने कैरियर की शुरुआत की और जहां हम बात कर रहे थे, भारत में कौमेडियन होने की नाजुक स्थिति का प्रतीक है. इस साल मार्च में महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली राजनीतिक पार्टी शिव सेना के सदस्यों ने इस स्थल को तोड़फोड़ का शिकार बनाया था. वजह थी एक स्टैंड-अप कौमेडियन कुणाल कामरा का जोक, जो उन्होंने शिंदे पर किया था और जो हैबिटैट में रिकौर्ड किए गए एक सैट का हिस्सा था.

जब मैं ने दीपिका से पूछा कि क्या उन्हें भारत में कौमेडी के मौजूदा हालात को ले कर चिंता होती है? तो उन्होंने बेहिचक जवाब दिया, ‘‘मुझे डर नहीं लगता, अगर लोगों को लड़ना है तो आने दो.’’

हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि वे खुद राजनीतिक व्यंग्य नहीं करती हैं. दीपिका का फोकस अब भी अमीरों की विचित्रताओं और मेहनतकश वर्ग के साथ उन के व्यवहार ही हैं. ‘‘हम भी इंसान हैं,’’ दीपिका ने कहा, ‘‘हमारे साथ भी इंसानों की तरह व्यवहार किया जाना चाहिए, न कि जानवर समझ कर जो 24 घंटे काम करने के लिए बने हैं.’’

रूढि़यों और सोच को चुनौती

दीपिका बताती हैं कि घरेलू कामगारों की तनख्वाह अकसर बेहद कम होती है और नौकरी देने वाले थोड़ी सी तनख्वाह बढ़ाने में भी कंजूसी करते हैं, जबकि यही लोग औनलाइन शौपिंग पर हजारों रुपए खर्च कर देते हैं. वे बताती हैं कि दिन में कईकई घंटों तक काम करने के बावजूद घरेलू कामगारों को आमतौर पर महीने में केवल 2 दिन की ही छुट्टी मिलती है, जोकि अधिकांश वेतनभोगी पेशेवरों को मिलने वाली साप्ताहिक छुट्टियों की तुलना में कम हैं.

दीपिका की सफलता ने उन की कुछ दोस्तों को भी हिम्मत दी है. अब वे भी अपनी आवाज उठाने लगी हैं. ‘‘वे अपनी मैडम को मेरे वीडियो दिखाती हैं,’’ दीपिका हंसते हुए कहती हैं, ‘‘वे इस जागरूकता को घरेलू कामगारों के अधिकारों के एक संगठन में बदलना चाहती हैं. यह विचार वे सही साझेदार मिलने पर और अधिक सक्रिय रूप से आगे बढ़ाएंगी.

इस बीच दीपिका अपनी कौमेडी के जरीए घरेलू कामगारों को ले कर बनी रूढि़यों और सोच को चुनौती देने की कोशिश कर रही हैं.

कुछ शो के दौरान वे बताती हैं कि जब वे दर्शकों के गंभीर चेहरे देखती हैं, तो घबरा जाती हैं कि शायद उन के जोक्स का असर नहीं हुआ है. लेकिन वही लोग बाद में आ कर मुझे गले लगाते हैं और कहते हैं, ‘‘आप अपनी कौमेडी से बहुत अच्छा काम कर रही हैं, हमारी आंखें खोल दीं आप ने. हमें समझ नहीं आ रहा था कि हंसें या रोएं.’’

सोशल मीडिया पर भी लोग उन के पोस्ट पर कमैंट करते हैं, सराहना करते हैं या यह वादा करते हैं कि वे अपने यहां काम करने वालों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करेंगे. ‘‘तभी लगता है कि जो भी काम मैं ने हाथ में लिया है, उस में मैं कुछ हद तक सफल तो रही हूं,’’ दीपिका ने कहा और फिर मुसकराते हुए जोड़ा, ‘‘मैं दुनिया बदल दूंगी.’’

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