Marriage goals : हर युवा लड़की के सामने बड़े होते ही बहुत बड़े सवाल खड़े हो जाते हैं. पढ़ाई कर ली, सजसंवर लिए, दोस्तों की महफिलों में चले गए, एक अच्छी जौब मिल गई पर अब आगे क्या? जहां लड़के निश्चित रूप से अकेले या विवाह कर के रह सकते हैं, बिना किसी डर के, बिना किसी सामाजिक, पारिवारिक चूंचूं के, लड़कियों को 25-26 तक होतेहोते जिंदगी का सब से बड़ा फैसला विवाह के बारे में करना होता है.
पहले यह काम पेरैंट्स कर देते थे. आसानी से कुछ पैसे के बलबूते पर, तो कुछ जानपहचान के बल पर एक घर मिल जाता था और पहले से ही हर तरह के माहौल में रहने को तैयार लड़की खुशीखुशी हर जोखिम ले लेती थी.
आज यह फैसला लड़की को करना पड़ता है. उसे कोई मिला, जिस के साथ दोस्ती हुई, घूमेफिरे, कुछ दिन और कभीकभार कुछ रातें भी बिताईं पर क्या वह हस्बैंड मैटीरियल है, यह फैसला बड़ा कठिन है. उस का ट्रायल नहीं होता. दूसरों के अनुभव काम नहीं आते. जो मिला वह कितने काम का 2, 5 या 20 साल बाद रहेगा कोई गारंटी नहीं है.
पहले यह भाग्य पर छोड़ा जाता था, पिछले जन्मों के कर्मों के फलों पर. पेरैंट्स विवाह कर के छुट्टी पा लेते थे. लड़की नए घर में, नए साथी के साथ खुश है तो ठीक, नहीं खुश है तो उस का भाग्य, वह जाने, हमें क्या. अब पेरैंट्स पहले ही पूछने लगते हैं कि यह लड़के का बायोडाटा है, देखो अच्छा लगता है तो बात चलाएं. यानी सारा बोझ लड़की पर. उस लड़की पर जिसे वैवाहिक जीवन का कोई अनुभव नहीं है, जिस ने पेरैंट्स के अलावा कोई जोड़ा नजदीकी से देखा भी नहीं, उसे अब चुनने को कहा जा रहा है.
कुछ उदार पेरैंट्स लड़की को ढूंढ़ कर लाने को कहते हैं. मैट्रीमोनियल साइट्स पर प्रोफाइल बनवा देते हैं, बिचौलियों को पैसे भी दे देते हैं. शादी के खर्च की गारंटी भी है पर फैसला लड़की का है. उस लड़की का जिस ने 25 साल प्रोटैक्टेड जिंदगी जी है, जिस का अनुभव अब तो किताबें, उपन्यास भी नहीं रह गए हैं. जिंदगी की फिलौसफी क्या होती है, पता नहीं. साथ रहने का, नए जने के साथ, कैसे क्या करना होता है, पता नहीं. जिन्होंने रूममेट्स के साथ कुछ दिन बिताए हों उन की बात भी अधूरी है क्योंकि वे टैंपरेरी अरेंजमैंट होता है.
लिव इन का रिलेशनशिप अगर विवाह में नहीं बदलता तो हमेशा के लिए लड़कों के प्रति कड़वाहट छोड़ जाता है.
यह सोच कर चलें कि जीवन हरेक के लिए संघर्ष है. आप के पेरैंट्स प्यार से रहते थे या झगड़ते रहते थे पर वे हरेक जोड़े के रिप्रैजेंटेटिव नहीं हैं. सहेलियों की सफलअसफल शादियां भी संघर्ष से जूझ पाने या न जूझ पाने की कैपैसिटी पर निर्भर करती हैं.
यदि अपने पर विश्वास है, खुद में सही फैसले लेने की क्षमता है और गलत फैसलों को समझने को तैयार हैं तो कोई संबंध ऐसा नहीं है जो सुखद न हो. हरदम एक दूरदृष्टि रखी जाए, छोटीछोटी बातों को भी समझ जाए, जिद से कुछ नहीं मिलता, समझ जाए तो हर सर्दीगरमी को झेला जा सकता है. विवाह एक ऐडवैंचर है जिस में पांव फिसलने का डर रहता है पर अंत में टारगेट पर पहुंचने पर बेहद खुशी मिलती है. डरें नहीं, फैसले लें.
