Caste preference in Indian marriages : देश के न्यूजपेपर्स में छपने वाले मैट्रीमोनियल एड असल में यह पोल खोलते हैं कि  पढ़ेलिखे लोग तो अब ढकोसलों, जातियों, अंधविश्वासों से ऊपर उठ गए हैं और उन की सोच वैज्ञानिक व तार्किक हो गई है. जी नहीं, यह गलतफहमी है. एक इंग्लिश न्यूजपेपर में वैसे तो ज्यादातर विज्ञापन अग्रवाल, भूमिहार, राजपूत, हिंदू, एसएसटी के कौलमों में बंटे हैं पर कुछ अपने को उदारवादी कहते हुए ‘कास्ट नो बार’ के कौलम में भी विज्ञापन देते हैं.

‘कास्ट नो बार’ में भी एक विज्ञापन में नौनमांगलिक साफ लिखा है यानी कुंडली पर तो भरोसा है ही भई. दूसरे मैं एक कायस्य जीवनसाथी ढूंढ़ रहा है, तीसरे में अगर कास्ट नहीं बताई गई तो रंग बता दिया गया. चौथे में अपने को अरोड़ा परिवार का कह दिया गया और 5वें में ब्राह्मण, छठे में राजपूत, 7वें में फिर ब्राह्मण. जब एक की जाति बताई ही जा रही है तो ‘कास्ट नो बार’ कहने का क्या फायदा?

कुछ मैट्रीमोनियल एड डाक्टर्स, इंजीनियर्स, बिजनैस कौलमों में हैं. देखने में लगता है कि उन्हेें अपने जैसे काम करने वाले साथी की जरूरत है. असलियत वहां भी वही है- जाति सब से ज्यादा महत्त्व की है. एक में राजपूत डाक्टर है, दूसरे में पंजाबी अरोड़ा, तीसरे में अग्रवाल.

इंजीनियर्स का भी यही हाल है.

मुसलिम, सिख मैट्रीमोनियल विज्ञापनों में भी ऐसी ही विभाजन की रेखाएं खिंची हुई हैं. मुसलिम विज्ञापनों में सुन्नी, शेख, सिद्दीकी, पठान, सैयद नजर आएंगे. तलाकशुदा भी खुद को सुन्नी बताना पहली जरूरत समझते हैं.

सिखों में अरोड़ा, खत्री, गुरुसिख, पंजाबी, जाट दिखेंगे.

एससीएसटी में एससी या एसटी के साथसाथ अधर्मी, रविदासिया, धोबी के विभाजनकारी शब्द मौजूद हैं.

सैकंड मैरिज वालों से उम्मीद होती है कि  उन्हें अब जाति, कुंडली, धर्म की परवाह नहीं होगी. नहीं जी, वे सब भी उसी तरह के नैरो माइंड वाले हैं. अग्रवाल, अग्रवालों में दूसरी शादी करना चाहते हैं, कान्यकुब्ज ब्राह्मण अपने समकक्ष ब्राह्मणों में.

एक बंगाली ने विज्ञापन दिया कि बंगाली साथी चाहिए पर केवल अपर कास्ट वाला. दूसरा ब्राह्मण बंगाली साथी ढूंढ़ रहा है.

विदेश जा कर क्या जाति धुल जाती है? शायद नहीं. अगर प्रेम विवाह नहीं हो सका या टूट गया तो भी ढूंढ़ा जाएगा तो जाति के बिल्ले के साथ ही. टैक्सास, अमेरिका में रहने वाला पंजाबी पार्टनर ढूंढ़ रहा है और दुबई वाला पंजाबी, आयरलैंड में बसा भारतीय परिवार डबलिन में रहते हुए ब्राह्मण घर से संबंध बनाना चाहता है और अमेरिका का तलाकशुदा संतान वाला अग्रवाल का बिल्ला लगा कर ही विज्ञापन देते हैं.

वैवाहिक विज्ञापन पोल खोलते हैं कि देश में से जाति, भाषा, क्षेत्र, धर्म कहीं नहीं गए हैं. पढ़ेलिखे, अपने को रैशनल और साइंस पढ़ेलिखे लोग पूरा जीवन जिस के साथ बिताना चाहते हैं, उस के घर की नहीं, शिक्षा की नहीं, जाति, धर्म, गोत्र की पहचान अवश्य रखना चाहते हैं. यह क्या एक शिक्षित देश का नक्शा है?

पढ़लिख कर भी भारतीय समाज बेहद नैरोमाइंडेड और कास्टिस्ट है. वह इंटररिलिजियस शादी तो क्या करेगा, इंटर कास्ट भी नहीं करता. लगभग हर विज्ञापन रंग, कुंडली, इलाके का जिक्र है, मानो पूरा देश आज भी 18वीं सदी में ही है.

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