26 मई, 2014 को जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तब भगवा खेमे के 5-6 फीसदी लोगों को छोड़ बाकियों ने बड़े तटस्थ और निरपेक्ष भाव से यह सोचते सत्ता मोदी के हाथ में सौंप दी थी कि चलो, एक दफा इन्हें भी देख लेते हैं, हर्ज क्या है. बातें तो इन्होंने दूसरों के मुकाबले ज्यादा बड़ीबड़ी की हैं कि ये कर दूंगा वो कर दूंगा, अब देखते हैं क्याक्या चमत्कार होते हैं. उन का यह भी कहना था कि कांग्रेस और गांधीनेहरू परिवार देश को खोखला कर रहे थे, वे उसे मजबूती देंगे.

लोगों ने नरेंद्र मोदी पर भरोसा किया था तो उस की एक अहम वजह वाकई कांग्रेस का कुशासन था, जिस से लोग आजिज आ गए थे. दूसरी बात, नरेंद्र मोदी का अपनी ही पार्टी के कई दिग्गजों को धकिया कर खुद को अधिकृत तौर पर प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करवा लेना था.

यह वाकई 2014 की राजनीति के लिहाज से अनूठी बात थी. लालकृष्ण आडवाणी, जसवंत सिंह और मुरली मनोहर जोशी सहित भाजपा की दूसरी पंक्ति के नेता सुषमा स्वराज, अरुण जेटली और राजनाथ सिंह हैरानी से मोदी का धुआंधार चुनावी प्रचार देख सकते थे. 2 महीने दिनरात एक कर नरेंद्र मोदी ने पूरे देश में आम सभाएं कीं और खुद को एक चमत्कार के रूप में पेश करने में इतने कामयाब हुए कि ‘हरहर मोदी, घरघर मोदी’ जैसे नारे लगने लगे थे.

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