आवारा पशुओं को ले कर उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में बहुत रोष है. उत्तर प्रदेश के पश्चिमी इलाकों में दूध के लिए लोग भैंस ज्यादा पालते हैं पर पूर्वी उत्तर प्रदेश में गाय पाली जाती है क्योंकि वहां अभी भी बैंलगाड़ी भी चलती है जिस के लिए बैल चाहिए होते हैं. जब से ङ्क्षहदू धर्म के नाम पर बेकार गायों को और बैलों को मारना और काटना बंद हो गया है तब से राज्यभर में सांड, गाय और बछड़े घुट्टे घूम रहे हैं और किसानों के खेतों में घुस रहे हैं. गौपूजा इस तरह भारी पड़ेगी, यह ग्वालों को नहीं मालूम था.

गाय का प्रकोप शहरों में भी कम नहीं है. हर गली सडक़ पर गायों के झुंड दिख जाएंगे जिन के गोवर और पंजाब से चारों और गंद फैली रहती है. कितनी ही दुर्घटनाएं से गायों से गाडिय़ों के टकराने से होती हैं. कोई भी गृहिणी घर के बाहर 2 पेड़ नहीं लगा सकती क्योंकि न जाने कब आवारा गाय आ कर खा जाए.

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गाय को देवी का रूप इसलिए माना गया है कि ग्रहस्थ की यह ऐसी संपत्ति थी जिसे दान में पुरोहित कोर्ई भी धार्मिक रस्म कराने के बाद आराम से ले जाता था. गाय दुधारी ही दी जाती थी और पुरोहित तब तक रखता जब तक दूध देती थी. भक्त कभी यह नहीं पूछते कि गौदान में मिली गाएं आखिर पुरोहितों के घरों में क्यों नहीं है. आम लोगों को कहा जाता है कि गौमाता की सेवा अपनी माता की तरह करो पर भई अपनी माता का दान तो नहीं किया जाता.

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