Rima Das: रीमा दास ने कभी फिल्म निर्माता बनने के बारे में नहीं सोचा था. जब वे गुवाहाटी से लगभग 40 किलोमीटर दूर एक छोटे से शहर छायगांव में बड़ी हो रही थीं तब, ‘‘फिल्में सिर्फ देखने के लिए होती थीं, बनाने के लिए नहीं,’’ उन्होंने मुझे बताया.
एक युवा महिला के रूप में रीमा का मन अभिनय करने पर लगा हुआ था. लेकिन जब वे मुंबई गईं तो उन्हें पहाड़ जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा.
हिंदी फिल्म और टैलीविजन इंडस्ट्री में पूर्वोत्तर राज्यों से शायद गिनेचुने अभिनेता थे. इंडस्ट्री के लोगों की यह अपेक्षा थी कि रीमा की शक्लसूरत और आवाज एक तय ढांचे में फिट बैठे. उन्हें अकसर शुद्ध हिंदी न बोल पाने के लिए आंका जाता था, जबकि वह उन की मातृभाषा थी ही नहीं.
मुंबई में लगभग 7 साल बिताने के बाद रीमा निराश हो कर असम वापस लौट आईं और तभी उन्होंने कैमरे के पीछे रह कर काम करना शुरू किया. उन के पास कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं था, बस एक साधारण जनून था कि कहानियां सुनानी हैं. उन्होंने अपनी पहली शौर्ट फिल्म ‘प्रथा’ 2009 में बनाई और उस के बाद 2016 में अपनी पहली फीचर फिल्म ‘मैन विद द बाइनोक्युलर्स’ से डेब्यू किया.
अपने गांव में बच्चों के एक समूह से हुई एक आकस्मिक मुलाकात ने उन्हें ‘विलेज रौकस्टार्स’ (2017) बनाने के लिए प्रेरित किया. यह फिल्म एक युवा लड़की के सफर को दर्शाती है, जो संगीतकार बनने का सपना देखती है. साथ ही वह और उस का परिवार बाढ़ से नष्ट होती फसलों जैसी परेशानियों का सामना भी करते हैं. रीमा ने इस फिल्म को लिखा, निर्देशित, संपादित और सहनिर्मित किया.
‘विलेज रौकस्टार्स’ ने इतिहास रचा. इसे 65वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का पुरस्कार मिला, जिस के चलते यह लगभग 3 दशक बाद राष्ट्रीय सम्मान पाने वाली पहली असमिया फिल्म बनी. इसे औस्कर में सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म श्रेणी में भारत की आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में भी चुना गया.
रीमा ने तब से ‘वन पर्सन क्रू’ के रूप में अपनी अनूठी पहचान बनाई है. उन्होंने असम की जड़ों से जुड़ी गहरी, व्यक्तिगत कहानियां सुनाना जारी रखा. ‘बुलबुल कैन सिंग’ (2018) एक कमिंग औफ एज फिल्म है, जो किशोरों की अपनी यौनिकता को समझने और खोजने की दास्तां बयां करती है, तो वहीं ‘तोरा’ज हस्बैंड’ (2022) वैवाहिक गतिशीलता और बदलती लैंगिक भूमिकाओं की पड़ताल करती है, जो कोविड-19 महामारी की पृष्ठभूमि पर आधारित है.
2024 में रीमा ने निर्देशक ओनिर, कबीर खान और इम्तियाज अली के साथ ‘माय मेलबर्न’ पर पार्टनरशिप की, जो पहचान और अपनापन पर आधारित कहानियों का एक संकलन है. इस की प्रत्येक कहानी वास्तविक घटनाओं से प्रेरित है.
रीमा की नई फिल्म ‘विलेज रौकस्टार्स 2’ उन्हें कई सम्मान दिला चुकी है, जिस में न्यूयौर्क इंडियन फिल्म फैस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार भी शामिल है.
जब हम बात कर रहे थे रीमा छायगांव में अपने घर पर थीं. उन्होंने एक आकर्षक काला मेखला चादोर पहना हुआ था- असम की महिलाओं का पारंपरिक बुना हुआ परिधान है. उन्होंने अपने शुरुआती साल मुंबई में मिली निराशाओं के टूटने और असम कैसे उन की रचनात्मक दृष्टि को आकार देता है, इस पर विचार किया.
‘‘मैं कितना भी कर लूं, कैसे भी कर लूं, अगर मैं सब से बेहतरीन खाना खा रही हूं, सब से बेहतरीन जगहों पर ठहर रही हूं या सफर कर रही हूं तब ही मुझे लगता है कि यही मेरा घर है,’’ उन्होंने कहा, ‘‘मेरे काम और मेरे योगदान की जरूरत है. प्यार के साथ जिम्मेदारी जैसी कोई चीज नहीं है. मुझे यह करते हुए आनंद मिलता है.’’
संस्कृता भारद्वाज: ‘‘क्या आप हमें छायगांव में अपने शुरुआती वर्षों के बारे में बता सकती हैं?’’
रीमा दास: ‘‘आज जैसा आप मेरा गांव देखते हैं, उस समय यह बहुत अलग था. वहां बहुत सारे खेत थे, यहां तक कि मेरे घर के सामने भी और बहुत सारे तालाब भी. एक सुंदर नदी थी. मैं तैरा करती थी, पेड़ों पर चढ़ा करती थी. इस इलाके में एक भी ऐसा पेड़ नहीं था जिस पर मैं चढ़ी न होऊं. मेरा बचपन वाकई बहुत अच्छा था.
‘‘यह सांस्कृतिक रूप से भी बहुत समृद्ध था. बिहू (असम का कृषि त्योहार और उस समय किया जाने वाला लोक नृत्य), शंकर माधव (श्रीमंत शंकरदेव, 16वीं सदी के हिंदू सुधारक और उन के शिष्य माधवदेव); ज्योति प्रसाद (लेखक, कवि और फिल्म निर्माता); राभा (बिष्णु प्रसाद राभा, कलाकार और सांस्कृतिक प्रतीक); भूपेन हजारिका (लेखक, कवि, गायक, और संगीतकार).

‘‘मेरे मातापिता भरत और जया दास शैक्षणिक पृष्ठभूमि से आते हैं. मेरे पिता एक बालिका उच्च विद्यालय के संस्थापक, प्रधानाचार्य थे. मेरी मां भी अध्यापिका बनना चाहती थीं, लेकिन छायगांव में हमारी एक किताबों की दुकान और एक प्रिंटिंग प्रैस हुआ करती थी. मुझे याद है कि मेरे पिता ने मेरी मां से कहा था कि आप को यह नौकरी करने की जरूरत नहीं है, कोई दूसरी औरत यह नौकरी पा सकती है और आप किताबों की दुकान और प्रैस का ध्यान रख सकती हो. छायगांव में वे (मेरी मां) व्यवसाय में शामिल होने वाली पहली महिलाओं में से एक थीं.
‘‘मुझे नृत्य करना बहुत पसंद था. मैं हर चीज में भाग लिया करती थी. कोई भी खेल, नृत्य मेरे मातापिता हमेशा चाहते थे कि मैं कक्षा में पहले स्थान पर आऊं. कभीकभी वे सख्तमिजाज भी होते थे. मैं कह सकती हूं कि मैं एक शांत बागी थी.
‘‘जब मुझे पहली बार मासिकधर्म आया तभी चीजें समाज से और परिवार से भी, थोड़ीबहुत बदलने लगीं. मेरा परिवार थोड़ा अधिक सुरक्षात्मक हो गया क्योंकि मुझे घर पर रहना उतना पसंद नहीं था. मुझे हर चीज में भाग लेना बहुत अच्छा लगता था.
‘‘मैं यहां उच्च माध्यमिक तक रही और फिर काटन कालेज (जो अब गुवाहाटी में काटन विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है) चली गई. वहां से मैं ने अंगरेजी साहित्य में स्नातक किया. वहां से आगे की पढ़ाई के लिए मैं बाहर पुणे चली गई. वहां से मैं ने अपनी मास्टर डिगरी की, जिस में मैं ने समाजशास्त्र, महिला अध्ययन की पढ़ाई की.’’
संस्कृता भारद्वाज: ‘‘आप को हमेशा से फिल्मों में रुचि थी?’’
रीमा दास: ‘‘मुझे फिल्में बहुत अलग तरीके से पसंद थीं. मैं एक अभिनेत्री बनना चाहती थी. जिस तरह का परिवार, जिस तरह की पृष्ठभूमि से मैं आई, मैं ने कभी फिल्म निर्माता बनने का सपना नहीं देखा. हमारे लिए फिल्में दिखने के लिए थीं, बनाने के लिए नहीं. हमारे लिए एक फिल्म बनाना काफी अजनबी, एक दूर का सपना था. लेकिन मैं हमेशा ऐक्टिंग में हिस्सा लेती. स्कूल, कालेज और स्थानीय नाटकों में मैं हमेशा भाग लिया करती थी. स्थानीय प्रतियोगिताओं में ‘सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री’ का पुरस्कार भी मिला.
‘‘(बचपन में), हमारे पास वे सप्ताहांत वाली फिल्में टैलीविजन पर आती थीं. बिजली काफी खराब रहती थी. मुझे याद है, कभी पहला हिस्सा देखती थी, कभी केवल आखिरी हिस्सा देख पाती थी.
‘‘फिर जब मैं काटन कालेज में थी, मैं ने थिएटर में और ज्यादा फिल्में देखना शुरू किया. वहां कतारें लगी होती थीं. कभी टिकट नहीं मिलता था और ब्लैक में भी खरीदना पड़ता था. यह सब हम अपने होस्टल के दोस्तों के साथ किया करते थे. मैं ने कभी नहीं सोचा था कि मैं फिल्म निर्माता या कहानीकार बनूंगी. मुझे उन शब्दों की समझ नहीं थी. कमर्शियल, पैरेलल सिनेमा या आर्ट सिनेमा. हमारे लिए ऐसा था, कोई भी, कैसी भी कर के कुछ देख लिया, मिल गया- कैसी भी फिल्में हों, कोई भी फिल्म आती थी तो हम देखते थे. मौका मिला तो. ऐसा ही माहौल था. मुंबई में मैं ने वर्ल्ड सिनेमा देखना शुरू किया. यूरोप, ईरान की फिल्में और भारतीय फिल्मेें भी.’’
संस्कृता भारद्वाज: ‘‘आप ने कब तय किया कि आप फिल्मों में काम करना चाहती हैं?’’
रीमा दास: ‘‘मैं ने अपना मास्टर पूरा किया, फिर मैं ने नैट की परीक्षा पास की (यह परीक्षा उन लोगों के लिए होती है जो सहायक प्रोफैसर बनना चाहते हैं या भारतीय विश्वविद्यालयों में जूनियर रिसर्च फैलोशिप प्राप्त करना चाहते हैं). तो (जब मैं ने अभिनय करने का निर्णय लिया), मेरे मातापिता यहां तक कि मेरे प्रोफैसर भी कहते थे कि क्या तुम पागल हो? जाओ जा कर विश्वविद्यालय में पढ़ाओ. मैं अभिनय के लिए इतना पागल थी कि मैं वह सब छोड़ के अभिनय के क्षेत्र में घुस गई.
‘‘इसीलिए अपनी पढ़ाई के बाद मैं मुंबई में थी. यह सब बहुत अचानक था, लगभग 2009 के आसपास. मैं ने संघर्ष किया. सांस्कृतिक तौर पर यह मेरे लिए एक झटका था. हमारे लिए पर्याप्त जगह नहीं थी. मैं अपनी भाषा की वजह से सफल नहीं हो पाई. अचानक मुझे लगा कि यह एक अलग तरह की चुनौती है और यह केवल अभिनय से जुड़ी हुई नहीं थी. इस किरदार में फिट होने के लिए आप को एक खास तरह से दिखना पड़ता था. मुझे एक फोबिया हो गया, किसी तरह का डर और मैं उस से निकल नहीं पाई.
‘‘यह काफी भीड़भाड़ वाला क्षेत्र है. वहां बहुत प्रतियोगिता है. हर तरफ से मेरे प्लस पौइंट बहुत कम थे. मैं दोष नहीं देना चाहती कि बिलकुल ही जगह नहीं थी. थोड़ीबहुत जगह थी, लेकिन उस थोडे़बहुत के लिए जितनी हिम्मत, कुशलता चाहिए थी मुझे लगता है, मेरे अंदर नहीं थी.
‘‘मैं हमेशा छोटेछोटे किरदार निभाती रही, कभी रिपोर्टर बन गई, कभी कुछ और. वहां कैसे होता है, जो वहां कैस्टिंग डाइरैक्टर है, आप वहां तक पहुंच ही नहीं पाते हो. कुछ लोग हैं जो डाइरैक्टर तक पहुंच पाते हैं, जहां पर आप हीरोइन बन जाते हो. ऐसा नहीं है कि बाहरी लोग बिलकुल नहीं बन पाए, लेकिन उन्हें दिखने में कुछ अनोखा होना पड़ता है. उन के पास वह खास आकर्षण, करिश्मा और सुंदरता होनी चाहिए. तो आप को उतना अच्छा होना है, आप की भाषा भी अच्छी होनी चाहिए, लुक भी अच्छा होना चाहिए. लुक के हिसाब से आप को फिट होना है. आप की ऐक्टिंग फिर बाद में.
‘‘एक समय होता है जब समाज और परिवार आप पर दबाव बनाते हैं, वे कहते हैं कि यह क्या कर रही है. बांबे में 6 साल, 7 साल, कर क्या रही है. मैं सीआईडी (हिंदी पुलिस प्रौसिड्यूरल टैलीविजन सीरीज) के ऐपिसोड करती थी और वे कहते थे कि यह आती है और फिर मर जाती है.’’

संस्कृता भारद्वाज: ‘‘क्या आप को लगता है कि आप की क्षेत्रीय पहचान ने आप के अवसरों को प्रभावित किया?’’
रीमा दास: ‘‘हां, बेशक. हम हिंदी नहीं बोलते, है न. पुणे में थे तो हिंदी बोल पाते थे, लेकिन सिर्फ बोल पाना ही काफी नहीं है. जैसे जरूरत, जरूरत नहीं, आप को जरूरत बोलना है. तो उस तरह की चीजें शुरू हो जाती हैं.
‘‘जब मैं वहां थी (मुंबई में) और मैं ने अभिनय क्लासेज लीं, तो ये सारी चीजें थीं. कुछ और चीजें थीं, जो सुखद नहीं थीं. चीजें बिगड़ गईं. कहीं न कहीं आप की जो ऐनर्जी है वह कभीकभी अलाइन नहीं होती. आप नैगेटिव ऐनर्जी में चले जाते हैं, आप उन तरह के लोगों से मिलते हैं, आप खो जाते हैं.
‘‘कोई बोल दिया कि ओह, तुम्हारा कद छोटा है, लोगों ने बोल दिया, हां तुम्हारा लुक अलग है, अंदर से आप खुश नहीं होते क्योंकि आप अपनेआप को, अपनी सादगी को खो रहे होते हैं. आप की सरलता हर व्यक्ति का एक नैचुरल फ्लो होता है, वह धीरेधीरे आर्टिफिशियल होना शुरू हो जाता है. आप एक नकली जीवन जी रहे हैं.’’
संस्कृता भारद्वाज: ‘‘आप ने अभिनय से फिल्म निर्माण की ओर रुख कैसे किया?’’
रीमा दास: ‘‘शुरुआत में मुंबई में एक ऐक्टर के तौर पर जो संघर्ष किया, उस की वजह से मेरा किसी निर्देशक को असिस्ट करने का मन नहीं हुआ. मैं ने सुन रखा था कि असिस्टैंट डाइरैक्टर बनने के लिए भी एक लंबी प्रक्रिया होती है, समय देना पड़ता है. कम से कम 5 साल. मेरे पास उस तरह का धैर्य नहीं था.
‘‘किसी तरह मुझे यह एहसास हुआ कि मैं कहानियां बता पाऊंगी. फिल्म बनाने की तकनीकी जानकारी के बिना, मैं ने असम में एक लघु फिल्म बनाई ‘प्रथा’ (2009). इस से मेरा आत्मविश्वास बढ़ा. फिर 2011 में मैं ने किसी तरह एक कैमरा खरीदने का प्रबंध किया. वहां से, सबकुछ बदल गया.
‘‘मैं ने ‘मैन विद द बाइनोक्युलर्स’ बनाई. यह एक छोटा समूह था, लेकिन वहां (फिल्म के लिए) एक डाइरैक्टर औफ फोटोग्राफी था. यह आसान नहीं था. परिवार ने मदद की, दोस्तों ने भी मदद की. मैं कुछ शादी के वीडियो, कुछ कौरपोरेट वीडियो शूट करती थी.
‘‘हम ने ‘मैन विद द बाइनोक्युलर्स’ की शूटिंग सिर्फ 20 दिनों में पूरी की थी. जब एक क्रू रहता है तो आप को पैसों की भी जरूरत होती है और उस में ऐसा दबाव आ जाता है कि इतने ही दिन में करना है क्योंकि आप के पास इतने ही पैसे हैं.
‘‘एक तो मैं ने खुद ही वहां अभिनय किया था. (असमिया अभिनेता) बिष्णु खरगोरा सर, वे मुख्य नायक थे, लेकिन मैं ने भी एक किरदार निभाया. यही एक बड़ी वजह थी कि वह सब मेरे लिए बहुत ज्यादा हो गया था. उस प्रक्रिया में मुझे मजा नहीं आया.
‘‘अचानक एक दिन मैं ने इन बच्चों को देखा (अपने गांव में)- वे अपने थर्मोकोल से बने गिटार और वाद्ययंत्रों के साथ प्रदर्शन कर रहे थे. (जब मैं ने उन्हें देखा) उस वक्त मैं अंदर से खुश नहीं थी. मैं रिलेशनशिप टूटने के बाद के दौर से गुजर रही थी. मेरा अभिनय करने का सपना पूरा नहीं हो सका. मैं अपनी पहली फीचर फिल्म से खुश नहीं थी. मैं थोड़ी भ्रमित अवस्था में थी. उस अवस्था में मैं ने बच्चों को देखा. उन्होंने एक मेडली बनाई थी और वे उसे प्रस्तुत कर रहे थे.
‘‘वे जीवन का जश्न मना रहे थे, भले ही वे गरीबी में थे और जानते थे कि वे असली वाद्ययंत्र नहीं खरीद सकते. लेकिन इतना उत्साह था. उन्होंने मुझे प्रेरित किया. उन्हें देख कर समझ में आया कि कम संसाधनों में भी कुछ बनाया जा सकता है
‘‘‘विलेज रौकस्टार्स’ के दौरान क्योंकि जब मैं सबकुछ खुद कर रही थी तो एक अलग ही तरह की एकांतता और रचनात्मक आजादी महसूस हुई. यही प्रेरणा थी और बच्चे, उन की मासूमियत, प्रकृति की शक्ति. मलिका, मेरी चचेरी बहन, वहां थी. (मलिका दास फिल्म की औडियोग्राफर थीं.) मेरे पास एक छोटा रिकौर्डर था. इस तरह हम ने ‘विलेज रौकस्टार्स’ बनाई, जिस में हमें साढ़े तीन साल लगे. हम बस चलते गए और चलते गए.’’

संस्कृता भारद्वाज: ‘‘क्या यह एक निर्णायक मोड़ था?’’
रीमा दास: ‘‘हां, मुझे बहुत खुशी है कि मैं जिद्दी हूं. मुझे यह एहसास नहीं था कि मैं सिनेमैटोग्राफर के रूप में क्या कर रही हूं क्योंकि मैं प्रशिक्षित नहीं हूं. मैं ने बस अपने अंतर्ज्ञान का पालन किया. मैं ने बहुत सारी फिल्में देखनी शुरू कीं तो वहां से मैं ने सिनेमा और सिनेमैटोग्राफी को समझा. सबकुछ बहुत मासूम जगह से हुआ. उसी मासूमियत में मैं ने वह फुटेज किसी को दिखाया तो उन्होंने कहा कि यह बहुत सुंदर है. तुम सच में फिल्म बनाने पर ध्यान दो क्योंकि तुम काबिल हो.
‘‘यह काफी अचानक था. कम से कम 6 साल तक मैं मुंबई में अभिनेता बनने के लिए संघर्ष कर रही थी. यह एक बड़ा सपना था. लेकिन बात जब यह फिल्म बनाने की आई खासकर ‘विलेज रौकस्टार्स’ के साथ, यह अभिनय वाली चीज, वह किस तरह गायब हुई मुझे इस का एहसास भी नहीं हुआ.
‘‘मैं खो गई थी. जब मैं ने फिल्में बनाना शुरू किया तो मैं ने खुद को फिर से पाया. वह लड़की जो मैं थी, जब मैं कालेज और स्कूल में थी, धीरेधीरे मैं फिर वही लड़की बन गई. ‘विलेज रौकस्टार्स’ के वे 3 साल, जब मैं ने अपनी जड़ों से दोबारा जुड़ना शुरू किया. उन्होंने मुझे बदल दिया. कभीकभी आप की सीमाएं आप की ताकत बन जाती हैं. मैं उस बिंदु पर थी जहां मुझे कुछ करना था. मैं इतनी जवान भी नहीं थी. मुझे ठीक से याद नहीं, लेकिन 30 के दशक में थी.
‘‘‘विलेज रौकस्टार्स’ एक परीकथा जैसी यात्रा थी. बहुत सारे स्वतंत्र फिल्म निर्माता, इंडस्ट्री के लोग प्रेरित हुए. लोग मुझे (संदर्भित करते थे) एक ‘वन वूमन आर्मी’ के रूप में देखते हैं. वे अभी भी मुझ से उसी बारे में सवाल करते रहते हैं. उन्हें वह कहानी पसंद आई. वह वन वूमन कहानी, अभी भी वही चल रही है.
‘‘मैं इसे अन्य चीजों में भी बदलना चाहती हूं. मैं सहयोग करना चाहती हूं. अभी जैसे मैं कुछ लोगों के साथ काम कर रही हूं. अभी मैं एक फिल्म बना रही हूं. मैं ने एक क्रू के साथ कुछ काम किया है.’’
संस्कृता भारद्वाज: ‘‘‘विलेज रौकस्टार्स’ ने उस क्षेत्र के बारे में आप का दृष्टिकोण कैसे बदल दिया, जहां आप बड़े हुए?’’
रीमा दास: ‘‘मैं बचपन से ही यहीं पर रही हूं. फ्लड मैं ने देखा है, फ्लड में स्कूल जाना, सबकुछ. लेकिन उस समय में मुझे यह एहसास नहीं हुआ था कि लोग खेत में काम करते हैं और इतनी मेहनत करने के बाद अपनी फसल खो देते हैं.
‘‘फिर हम पढ़ने चले गए, काटन कालेज. वहां से वहां. तो जब एक समय होता है, जब आप चीजों को ज्यादा औब्जर्व करते हैं, देखते हैं, उस समय में आप बाहर निकल गए. तब आप एक अलग दुनिया में होते हैं. मैं शायद 17 साल की थी, जब मैं बाहर थी (अपने गांव से). उस समय आप प्यार में पड़ते हैं, आप के पास अन्य ध्यान भटकाने वाली चीजें होती हैं तो आप समझते नहीं. लोगों की क्या जरूरतें हैं, पेड़ की जरूरत कितनी है, नदी की जरूरत कितनी है.
‘‘जब मैं ने अपनी फिल्में बनानी शुरू कीं तो मैं ने अपनी जड़ों और जमीन से जुड़ना शुरू किया. मैं ने अपने लोगों से प्यार करना शुरू किया. मैं ने देखा कि खेती करना कितना कठिन है. किसान, उन के पास ज्यादा बैंक बैलेंस नहीं है. जब वे खेती कर रहे होते हैं, वे सबकुछ देते हैं, सबकुछ खर्च करते हैं. ये सब चीजें मेरे लिए काफी जीवन परिवर्तनकारी थीं.
‘‘मेरे दादा किसान थे, मेरा भाई भी खेती में गहराई से लगा हुआ है. हम उन किसानों के दर्द को समझते हैं. उन के लिए जमीन कितनी महत्त्वपूर्ण है, पेड़ होने क्यों इतने जरूरी हैं. उस पृष्ठभूमि, समझ और भावना से आते हुए, यहां मेरी जगह है.
‘‘अब मैं सबकुछ गहराई से देख रही हूं. जब आप कैमरा पकड़ रहे होते हैं, आप रोशनी, प्रकृति, ध्वनि, सब देख रहे होते हैं. आप जुड़े हुए होते हैं. आप को लगता है कि आप कुछ बना रहे हैं. मैं कैमरा ले कर ऐसे ही गांव में घूम रही हूं. पेड़ पर चढ़ कर, पानी में, नाव में, फ्लड में तो लोगों ने तो मुझे थोड़ा पागल भी कहना शुरू कर दिया. उन्हें लगा कि इस का दिमाग खराब है. यह बच्चों का भी दिमाग खराब कर रही है.
‘‘जब हम शूटिंग कर रहे थे, मैं ने अपने बच्चों से कहा जिन्होंने ‘विलेज रौकस्टार्स’ में अभिनय किया था कि देखो मैं बचपन में कैसी थी, फोटोग्राफ हैं, उस के सिवा तो कुछ नहीं पता. तुम लोग अपनेआप को तो देख पाओगे न, यह बचपन रह जाएगा कि ऐसे क्या करते रहते हो, स्कूल जाते हो, पढ़ाई वगैरह. कम से कम आप खुद को देखेंगे. तो इस तरह किसी तरह से मुझे उन्हें मोटिवेट करना था तो उन्होंने मजा लिया. वे 3 साल बहुत खूबसूरत थे.’’
संस्कृता भारद्वाज: ‘‘राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रशंसा का आप पर क्या प्रभाव पड़ा?’’
रीमा दास: ‘‘सफलता के साथ लोगों का प्यार, आप को अपनी ऊर्जा बढ़ती हुई महसूस होती है, आप जिम्मेदार बन जाते हैं.
‘‘ऐसा नहीं है कि संघर्ष खत्म हो गया है. लेकिन मैं खुद को विशेष भी महसूस करती हूं. बहुत सारे फिल्म निर्माता हैं, बहुत सारे लोग हैं जो फिल्मों में कुछ करना चाहते हैं. अगर मैं किसी चीज से गुजर रही हूं तो मैं उसे अनदेखा करने की कोशिश करती हूं. मैं बस फिल्में बनाना पसंद करती हूं. छोटे तरीके से, बड़े तरीके से कोई फर्क नहीं पड़ता.
‘‘‘विलेज रौकस्टार्स’ की सफलता के साथ अचानक बहुत सारे औफर भी आए. लोगों ने संपर्क करना शुरू किया. लेकिन मुझे नहीं पता शायद मेरा बांबे में संघर्ष और व्यक्तिगत जीवन ने मुझे अपनी ऊर्जा की रक्षा करना, धीरेधीरे और स्थिरता से आगे बढ़ना सिखाया.
‘‘ऐसा नहीं है कि मेरे बड़े सपने नहीं हैं, लेकिन उन बड़े सपनों में खुद को खोना नहीं चाहती. बस उस दुनिया में रह कर खुश रहना चाहती हूं और ऐसे लोगों के साथ काम करना चाहती हूं जिन से मेरी ऊर्जा मेल खाती हो.’’
संस्कृता भारद्वाज: ‘‘क्या आप को ‘विलेज रौकस्टार्स ’को व्यापक दर्शकों तक पहुंचाने में संघर्ष करना पड़ा?’’
रीमा दास: ‘‘मैं ने बस मेहनत की. ऐसा नहीं है कि मैं रुक गई और मैं ने सोचा कि ठीक है, यह मेरा काम है, बस फिल्म बनाना. उस के बाद, मैं ने सोचा कि ओटीटी प्लेटफौर्म तक कैसे पहुंचना है, थिएटर में रिलीज का तरीका कैसे पता करना है. मुझे पता था कि मुझे व्यावहारिक और स्पष्ट होना होगा कि यह एक स्वतंत्र फिल्म है.
‘‘मैं हमेशा ऐसा सिनेमा बनाने की कोशिश करती रही हूं जो ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंच सके. यह केवल सफलता, पुरस्कार और फैस्टिवल में जाने की बात नहीं है. यह भी है कि अधिक दर्शकों तक पहुंचना. ‘विलेज रौकस्टार्स’ या ‘बुलबुल कैन सिंग’ में मैं जो संदेश दे रही हूं, वह केवल अभिजात फिल्म निर्माताओं के लिए नहीं है.’’
संस्कृता भारद्वाज: ‘‘आप का अधिकांश काम असम और असमिया संस्कृति में निहित है. क्या आप बता सकती हैं कि इन कहानियों को वैश्विक मंचों तक पहुंचाने का महत्त्व क्या है?’’
रीमा दास: ‘‘इंटरनैट और बहुत सारी अन्य चीजों के कारण. अभी हमें थोड़े से लोग जानने लगे हैं. फिर भी एक स्तर पर अभी भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो हमें नहीं जानते हैं. असम बोलो तो वे असम नहीं जानते. उन को लगता है कि नेपाल में है कि चीन में हैं.
‘‘हमारे प्रोडक्शन हाउस का नाम है ‘फ्लाइंग रिवर्स फिल्म्स.’ हम ने इस का यह नाम इसीलिए लिए रखा था क्योंकि हमारी नदी के पास बहुत सारी कहानियां हैं. उन को पूरी दुनिया तक पहुंचना चाहिए, यही मेरा लक्ष्य था.
‘‘पूर्वोत्तर में इतनी सारी कहानियां हैं, इतने सारे समुदाय हैं. एक लंबा सफर है. कितना कुछ है. हमारी कहानियां हम नहीं बताएंगे तो कौन बताएगा, वह तो करना ही पड़ेगा.’’
संस्कृता भारद्वाज: ‘‘आप महिला फिल्म निर्माताओं के लिए वर्तमान परिदृश्य को कैसे देखती हैं? इस में क्या बदलाव देखना चाहती हैं?’’
रीमा दास: ‘‘मुझे लगता है कि इंडस्ट्री को अभी भी अधिक समावेशी होने की जरूरत है, न केवल महिलाओं के लिए, बल्कि अन्य हाशिए पर रहने वाले समुदायों के लिए भी. महिलाएं शक्ति पा रही हैं. कम से कम वे उस बिंदु तक पहुंच रही हैं जहां अगर वे कुछ चाहती हैं तो कर सकती हैं, ऐसा माहौल है. उस के लिए भी बहुत साहस की जरूरत होती है. हमेशा समस्याएं होंगी, लेकिन जो लोग उन्हें तोड़ सकते हैं, हमेशा तोड़ कर आगे बढ़े हैं.
‘‘और जब आप लोग किसी पद पर पहुंच जाते हैं, तो आप को और महिलाओं के लिए भी अवसर पैदा करने होंगे, उन्हें ऐसा माहौल देना होगा जहां वे खुल कर काम कर सकें. उन्हें उस तरह का आराम और जगह देना, जो सुरक्षित हो. एकदूसरे को प्रोत्साहित करना, एकदूसरे का समर्थन करना, यही हम कर सकते हैं.’’
संस्कृता भारद्वाज: ‘‘आप उभरते फिल्म निर्माताओं को खासकर उन को जो कम प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्रों से हैं क्या सलाह देना चाहेंगी?’’
रीमा दास: ‘‘बस कुछ करो. चाहे वह आप के मोबाइल से हो या कुछ और. अपने क्षेत्र पर भरोसा करो. शुरुआत में आप अपनी जो अनोखी आवाज है और आप क्या करना चाहते हो, उस को ऐक्सप्लोर करो. अगर आप को लगता है कि रिस्क है, बहुत सारी चीजें चैलेंज हैं तो बेहतर होगा कि कम बजट में, जितना हो सके छोटे स्तर पर फिल्म बनाएं. जिस भी तरीके से बन पाए. धीरेधीरे आप को समझ आने लगेगा.
‘‘कभीकभी मैं 30 सैकंड की रील देखती हूं और वह शानदार होती है. लोग बोलते हैं कि इस की वजह से लोगों की अटैंशन कम हो गई है और फिल्में भी नहीं चल रही हैं, लेकिन मुझे लगता है कि हम सभी के पास वह स्वतंत्रता है कि आप कुछ कर सकते हो. मैं ने खुद भी रील देख कर सीखा है. मुझे सच में लगता है कि कुछ लोग वास्तव में अच्छे हैं.
‘‘एक बार जब आप जान जाते हैं और स्पष्टता हो जाती है कि आप कौन हैं और आप क्या चाहते हैं और अगर वह स्पष्ट है तो चाहे आप का रास्ता कमर्शियल हो या आर्ट, यह आसान होगा, जब आप अपना रास्ता जान जाएंगे.’’
Rima Das
