Saas-Bahu Relations: भारतीय समाज में सासबहू का रिश्ता हमेशा जटिल रहा है. यह एक ऐसा बंधन है जहां 2 पीढ़ियां, 2 सोचें और 2 अलग संस्कार आमनेसामने होते हैं. ऐसे में जब सास एक सामान्य गृहिणी नहीं बल्कि एक अमीर, सशक्त और पब्लिक फिगर हों तो यह रिश्ता और भी संवेदनशील हो जाता है.
भारत में शादी सिर्फ 2 लोगों का मिलन नहीं बल्कि 2 परिवारों का भी संगम होता है. लेकिन जब बहू एक ऐसे परिवार में आती है जहां सास एक रिच और पब्लिक फिगर हो जैसेकि कोई राजनेता, फिल्मस्टार, बिजनैस वूमन या सोशल आइकान तो यह संबंध एक साधारण सासबहू के रिश्ते से कहीं ज्यादा जटिल हो जाता है.
इस लेख में हम समझेंगे कि ऐसे रिश्तों में संतुलन कैसे बनाए रखा जा सकता है, कौनकौन सी चुनौतियां सामने आती हैं और उन के समाधान के लिए कौन से व्यावहारिक व भावनात्मक कदम बहू उठा सकती है:
जब पहचान बन जाए बोझ, ‘अब तुम इस परिवार का चेहरा हो’ रीमा एक पढ़ीलिखी, आत्मनिर्भर लड़की थी, जिस ने एक राजनेता परिवार में शादी की थी. उस की सास संध्या देवी, 5 बार की सांसद, सामाजिक कार्यकर्ता और मीडिया में लोकप्रिय चेहरा थीं.
शादी के तीसरे दिन ही रीमा को एक प्रैस कौन्फ्रैंस में सास के साथ जाना पड़ा. उस ने हलकी सी कौटन की साड़ी पहनी और बिना मेकअप चली गई. प्रैस ने तसवीरें लीं और अगले दिन हैडलाइन थी-
‘नई बहू, सास की गरिमा को निभा नहीं पाई?’
घर लौटते ही सास ने मुसकरा कर कहा, ‘‘रीमा, तुम अब इस परिवार का चेहरा हो. हर चीज का मतलब बनता है. तुम्हारा पहनावा, बोलचाल, हावभाव. सब अब राजनीति से जुड़ा है.’’
रीमा ने सिर झुका लिया. उस के मन में पहला सवाल उठा-
‘‘क्या मैं अब रीमा नहीं रही?’’
बहुओं से अचानक उम्मीद की जाती है कि वे अपने अस्तित्व को छोड़ कर एक आदर्श भूमिका में ढल जाएं. लेकिन याद रखें पहचान खो देना रिश्तों को मजबूत नहीं करता. उसे धीरेधीरे ढालना चाहिए, न कि मिटा देना.
तुलना की तलवार, ‘‘जब मैं तुम्हारी उम्र में थी.’’ अंजलि को लिखना पसंद था, लेकिन अब उस का समय सिर्फ सामाजिक कार्यक्रमों, गैस्टों के स्वागत और ‘परफैक्ट बहू’ बनने में बीतता था. उस की सास एक प्रसिद्ध लेखिका अकसर कहतीं- ‘‘तुम्हारी उम्र में मैं ने तीसरी किताब पूरी कर ली थी और तुम एक ब्लौग पोस्ट नहीं लिख पाईं.’’
एक दिन अंजलि ने चुप्पी तोड़ी, ‘‘मम्मीजी, आप मेरी प्रेरणा हैं, लेकिन मैं आप की कौपी नहीं बन सकती. मेरी सोच अलग है, मेरी राह अलग है.’’ उस दिन पहली बार सास चुप हो गईं.
बहू और सास की तुलना रिश्ते को खोखला बना देती है. बहू को भी चाहिए कि वह अपनी असुरक्षा को संवाद में बदले. सम्मान बनाए रखते हुए अपनी पहचान व्यक्त करना एक कला है.
भावनाएं भी माने रखती हैं
पब्लिक इमेज का प्रैशर, ‘‘रैड लिपस्टिक से ब्रैंड इमेज बिगड़ती है,’’ नेहा की शादी एक फिल्म प्रोड्यूसर परिवार में हुई थी. उस की सास एक जानीमानी टीवी अभिनेत्री थीं. एक इवेंट के दौरान नेहा ने अपनी पसंद की रैड लिपस्टिक लगाई और कैमरे के सामने आई.
रात को सास ने मुसकरा कर कहा, ‘‘नेहा, अगली बार न्यूड शेड ट्राई करना. रैड लिपस्टिक हमारी ब्रैंड इमेज से मैच नहीं करती.’’
नेहा का दिल टूट गया. वह बस यही चाहती थी कि कोई एक दिन पूछे, ‘‘तुम्हें क्या अच्छा लगता है?’’
बहू से उम्मीद होती है कि वह पब्लिक इमेज का हिस्सा बने. लेकिन उस की निजी भावनाएं भी माने रखती हैं. अगर बहू हर पल कैमरे के लिए जीएगी तो असली रिश्ता कहां बचेगा?
घर या औफिस? समयसारिणी वाला रिश्ता. शिखा की सास एक टौप बिजनैस वूमन थीं. सुबह 6 बजे योग, 7 बजे नाश्ता, 8 बजे बैठक. हर मिनट का हिसाब.
शिखा ने संडे को देर से उठने की गुजारिश की. सास बोलीं, ‘‘घर में सिस्टम होगा, तभी सम्मान मिलेगा.’’
शिखा मुसकराई, ‘‘तो क्या मु झे छुट्टी के लिए मेल करना होगा?’’
सास कुछ नहीं बोलीं. लेकिन शिखा की बात उन्हें सोचने पर मजबूर कर गई.
हर घर एक संस्था बन जाए. यह जरूरी नहीं. प्यार, लचीलापन और स्पेस एक रिश्ते की बुनियाद हैं. बहू को चाहिए कि वह व्यंग्य से नहीं, बुद्धिमत्ता और संवाद से संतुलन बनाए.
मीडिया में बहू की छवि
निजी बातों का सार्वजनिक मंच एक टौक शो में सास ने कहा, ‘‘आजकल की बहुएं घर को होटल सम झती हैं. उठती हैं 10 बजे, फिर फोन ले कर बैठ जाती हैं.’’
नेहा जो पास में बैठी थी, जानती थी यह ताना उसी के लिए. उस ने सास से कहा, ‘‘मम्मीजी, अगर कुछ कहें तो कैमरे के बजाय मु झे सामने देख कर कहें. शायद तब रिश्ता और गहरा हो.’’
निजी बातें जब सार्वजनिक होती हैं तो रिश्ते में दरार आ जाती है. सम्मान दोतरफा हो, तभी रिश्ता टिकता है. जब संबंध दोस्ती में बदल जाए रूपा की सास एक प्रसिद्ध शैफ थीं. एक दिन रूपा ने खिचड़ी में पुदीना डाल दिया. सास ने हैरानी से पूछा, ‘‘यह क्या?’’
रूपा घबरा गई, पर बोली, ‘‘एक नया ट्राई किया, अच्छा नहीं लगा क्या?’’ सास मुसकराईं, ‘‘यह तो मजेदार है. अगली बार अपने शो में बनाएंगे, ‘रूपा की ट्विस्ट खिचड़ी’.’’
जहां कंट्रोल की जगह साझेदारी आ जाए, वहां रिश्ता सिर्फ निभाया नहीं, जीया जाता है. हर सासबहू को मौका देना चाहिए कि वे एकदूसरे के साथ सहयात्री बनें.
व्यावहारिक टिप्स: बहू कैसे बनाए संतुलन
– सुनना सीखें, लेकिन चुप न रहें, हर बात सुनें, लेकिन अपनी सोच रखें.
– व्यक्तिगत पहचान बनाए रखें, कपड़ों, रुचियों और कार्यों में खुद को खोने न दें.
– मीडिया से संवाद सम झदारी से करें, कोई भी प्रतिक्रिया सोचसम झ कर दें.
– सीमाएं स्पष्ट रखें, कब न कहना है- यह तय हो.
– संवाद में विनम्रता हो, पर कमजोरी नहीं- शब्दों में ताकत हो पर अहंकार नहीं.
– तुलना में नहीं, प्रेरणा में बदलें माहौल- तुलना के जवाब में सकारात्मक उदाहरण दें.
– साझा रुचियों पर रिश्ते बनाएं- कुकिंग, म्यूजिक या सोशल वर्क से कनैक्शन बनाएं.
– पब्लिक इमेज को गाइड मानें, शासन नहीं- वह नियंत्रण न बने.
– दूसरे के नजरिए को भी समझें- सास भी एक रोल निभा रही हैं, वे भी इंसान हैं.
– रिश्तों को समय दें, पर खुद को न भूलें- सब से जरूरी बात.
जब सास हो रिच और पब्लिक फिगर तो रिश्ता सिर्फ सासबहू का नहीं रहता. वह बन जाता है संवेदनशील, सार्वजनिक और सामाजिक समीकरण का हिस्सा.
बहू को जहां खुद को संभालना होता है, वहीं रिश्तों को भी सजाना पड़ता है. पर याद रहे- रिश्तों में संतुलन ‘मौन’ से नहीं, ‘संवाद’ से आता है.
सास अगर आकाश है तो बहू को जमीन बनना है- लेकिन यह जमीन भी मजबूत होनी चाहिए, जिसे कोई रौंद न सके.
