Salima Tete: सलीमा टेटे की बातचीत में ज्यादा दिलचस्पी नहीं है. वे दुनिया को एक पर्यवेक्षक के तौर पर देखना पसंद करती हैं. लेकिन 23 साल की उम्र में भारतीय महिला हौकी टीम की सब से कम उम्र की कप्तान एक अलग प्रवृत्ति की ओर झाक रही हैं. इन दिनों अपनी बात रखना उन की जिम्मेदारी का हिस्सा है.

कभीकभी इस का मतलब ऐसे तर्क में दखलंदाजी करना हो सकता है जिस के खेल के मैदान से बाहर फैलने का डर हो. उन का मकसद होता है अपनी टीम की खिलाड़ियों को यह एहसास दिलाना कि उन के पास सहारा है. ‘‘अभी मैं उन को बोलती हूं, ‘तू यह कर सकती है’ क्योंकि अभी बोलना बहुत जरूरी है और जो मुझे रिस्पौंसिबिलिटी मिली है, मैं उसे पूरी तरह से अपनी तरफ से (निभाने की) कोशिश करूंगी,’’ उन्होंने मुझे बताया कि जब हम ने जुलाई में एक सुबह वीडियो कौल पर बात की थी.

बात सलीमा ने गहरी की, लेकिन उन के बोलने का अंदाज हलका था जो उन्होंने मुझे एक कोमल, मानो आत्मजागरूक हंसी के साथ बताई. उन्होंने आगे कहा, ‘‘मैं यही चाहती हूं कि मैं और बोलूं खिलाड़ियों को ताकि आत्मविश्वास आए खिलाड़ियों को भी.’’

इस से पहले कि वे बैंगलुरु स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण केंद्र में 1 महीने के सीनियर महिला राष्ट्रीय कोचिंग कैंप के लिए रवाना होतीं, वे रांची में थोड़ी देर रुक कर आराम कर रही थीं.

सलीमा हौकी को भी उतनी ही शिद्दत से खेलती हैं. मैदान के बाहर भले ही ये युवा मिडफील्डर शांत रहना पसंद करती हों, लेकिन अंदर उतरते ही उन की रफ्तार बिजली की तरह चमकती है. उन की रफ्तार इतनी तेज है कि कथित तौर पर भारत के पूर्व हौकी कोच, डच श्योर्ड मारिन ने उन्हें ‘फेरारी’ उपनाम दिया था.

उल्लेखनीय यात्रा

महज एक दशक से कुछ अधिक के कैरियर में सलीमा ने एक उल्लेखनीय यात्रा तय की है. वे 2014 में झारखंड की सबजूनियर टीम में शामिल हुई थीं, जिस में उन का राज्य एक राष्ट्रीय महिला टूरनामैंट में उपविजेता रहा. 2016 में वे अपनी किशोरावस्था से बाहर निकली ही थीं कि वे थाईलैंड में अंडर-18 एशिया कप के लिए जूनियर भारतीय महिला टीम की उपकप्तान बनीं और टीम को कांस्य पदक दिलाया. 2 साल बाद सलीमा ने उसी टीम की कप्तानी करते हुए अर्जेंटीना में 2018 युवा ओलिंपिक में रजत पदक जीता.

जैसेजैसे सलीमा ने सीनियर टीम में कदम रखा, उन के उभार की गति और तेज हो गई. 2020 के टोक्यो ओलिंपिक्स में जो कोविड-19 महामारी के चलते 2021 में आयोजित किया- भारतीय महिला हौकी टीम एक शानदार जीत के करीब तक पहुंची थी. हालांकि टीम चौथे स्थान पर रही और पदक से चूक गई, उन्होंने एक ऐतिहासिक रचना रची.

टीम के खिलाड़ियों जिन में से कई वंचित समुदायों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आती हैं, ने इतनी मजबूती से संघर्ष किया कि सामने खड़ी कई बाधाओं को झाका दिया. वे कहती हैं, ‘‘हमेशा आगे बढ़ रही थीं, यह भारतीय महिला ऐथलीटों की सब से बेहतर टीम थी जो हम ने किसी भी खेल के मैदान पर देखी है,’’ वरिष्ठ खेल पत्रकार शारदा उगरा ने टोक्यो में टीम के प्रदर्शन के बारे में लिखा.

उन्होंने आगे कहा, ‘‘हर बार जब वे मैदान छोड़ती थीं, चाहे जीत में हों या हार में, चाहे हंस रही हों या निराश, वे ऐसे दिखती थीं जैसे उन्होंने अपनी पूरी ताकत लगा दी हो.’’

सलीमा उन खिलाड़ियों में से थीं जिन को ओलिंपिक्स के चलते प्रसिद्धता मिली. 2024 तक जब उन्हें टीम की कप्तानी सौंपी गई, वे ओलिंपिक्स, राष्ट्रमंडल खेल, विश्व कप और एशियाई खेल जैसे टूरनामैंट और 100 से अधिक अंतर्राष्ट्रीय मैच खेल चुकी थीं.

2020 टोक्यो ओलिंपिक्स में अर्जेंटीना और इंडिया और इंडिया के सेमीफाइनल मैच के दौरान सलीमा पैनल्टी कौर्नर डिफेंड करने की तैयारी में.                                                                                Image : Alexander Hassenstein/Getty Images

कई सम्मान भी मिल चुके

उन्हें कई व्यक्तिगत सम्मान भी मिल चुके हैं- 2021 में हौकी इंडिया असुंता लाकड़ा अपकमिंग प्लेयर औफ द ईयर अवार्ड, 2023 में बलबीर सिंह सीनियर प्लेयर औफ द ईयर अवार्ड और हाल ही में भारत का सर्वोच्च खेल सम्मान अर्जुन पुरस्कार.

पिछले कई साक्षात्कारों में सलीमा अपनी प्रशंसा को अकसर यह कह कर टाल देती रही हैं कि कोई भी सम्मान पूरी टीम का हक है. लेकिन असुंता लाकड़ा पुरस्कार मिलना उन के लिए गर्व की बात है, उन्होंने मुझे बताया. छोटी उम्र में सलीमा, असुंता को अपना आदर्श मानती थीं. झारखंड की एक प्रतिष्ठित मिडफील्डर और 2000 में राष्ट्रीय महिला टीम की कप्तान.

‘‘वे हमारे होस्टल आती थीं. लंबीचौड़ी थीं और उन की ऊंचाई भी इतनी अच्छी थी. शरीर भी इतना फिट,’’ सलीमा ने याद किया, ‘‘उन को देख कर मुझे भी वैसा ही बनना था. मैं जो सोचती थी तब, अभी मैं वह कर रही हूं.’’ सब कुछ आसान नहीं रहा है.

सलीमा और उन की टीम गंभीर झाटकों से जूझा रही हैं. वे पिछले साल पैरिस ओलिंपिक्स के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाईं और इस साल उन्हें एफआईएच प्रो लीग अंतर्राष्ट्रीय हौकी महासंघ द्वारा आयोजित एक वार्षिक प्रतियोगिता में लगातार हार का सामना करना पड़ा. टीम की कप्तान होने के नाते सलीमा को अपेक्षा और जवाबदेही, दोनों का भार उठाना होगा. उन्होंने एक आशावादी दृष्टिकोण पेश किया.

‘‘हम टीम हैं, हारजीत तो चलती रहेगी, हम अच्छा खेल कर हार गए तो कोई बात नहीं, हार के साथ हम सीख सकते हैं कि हम क्या अच्छा कर सकते हैं,’’ उन्होंने कहा.

महिला हौकी टीम की ट्रेनिंग, फिटनैस स्तर और तकनीकी कौशल पर लगातार कड़ी नजर रखी जा रही है. लेकिन इस के साथ ही उन्होंने एक ऐसे खेल पर फिर से कब्जा कर लिया है, जिस पर कभी पुरुषों का दबदबा माना जाता था. महिला टीम ने इसे अपनी सफलता का प्रतीक बना दिया है, जिस से भविष्य में और भी बहुत कुछ हासिल करने का वादा है.

कामयाबी का सफर

सलीमा की कामयाबी का सफर उन की सहनशक्ति से परिभाषित होता है. उस लगन से, जिस से उन्होंने अपने आसपास खेले जाने वाले खेल को सीखना शुरू किया. उन सालों से जो उन्होंने अपने हुनर को निखारने में लगाए और उस शांतिपूर्ण विरोध से, जिस से उन्होंने कैरियर की शुरुआत में मिली संस्थागत अस्वीकृति का सामना किया. अब जब वे अपनी कुछ सब से मुश्किल पेशेवर चुनौतियों का सामना कर रही हैं, तो शायद यही सहनशक्ति उन्हें इस से पार दिलाएगी.

सलीमा ने कहा, ‘‘मैं ने यही एक चीज सीखी है कि कुछ भी हो जाए, हमें गिवअप नहीं करना है. अगर आप गिवअप नहीं करोगे तो आप लाइफ में कुछ भी कर सकते हो.’’

भारत में हौकी की शुरुआत औपनिवेशिक शासनकाल के दौरान लगभग 1850 के दशक में हुई. उस के बाद देश ने इस खेल को पूरी तरह से अपना बना लिया और बहुत जल्दी खुद को एक वैश्विक शक्ति के रूप में भी स्थापित कर लिया.

खेलों के उतारचढ़ाव के बावजूद भारत में इस की लोकप्रियता बनी हुई है. हौकी इंडिया के आंकड़ों के अनुसार, जो पुरुष और महिला हौकी से जुड़ी सभी राष्ट्रीय गतिविधियों को देखता है- 2024-2025 सीजन में हौकी इंडिया लीग में महिला वर्ग के 13 मैचों को 1.51 करोड़ दर्शक और पुरुषों के टूरनामैंट के 44 मैचों को 3.29 करोड़ दर्शकों ने देखा.

सलीमा के गृह राज्य झारखंड में हौकी की लोकप्रियता को केवल दर्शकों की संख्या से नहीं नापा जा सकता है. यह प्यार पीढ़ी दर पीढ़ी संचारित होता रहा है. सिमडेगा जिले के बरकीछापर गांव में पलीबढ़ी सलीमा का खेल की तरफ रुझान लगभग तय था.

यह जिला अपने कई खिलाड़ियों के कारण अकसर ‘हौकी का पालना’ कहा जाता है. यहां से निकले कुछ सब से प्रसिद्ध नामों में असुंता लाकड़ा और ओलिंपियन्स माइकल किंडो और सिल्वानुस डुंगडुंग प्रमुख हैं. हौकी सलीमा के जीवन में तब से शामिल है, जब उन्होंने हौकी स्टिक को छुआ भी नहीं था.

उन के पिता सुलक्षण टेटे हौकी खेलते थे. उन के दादा भी और उन की माता के पिता भी. उन के जानने वाले ज्यादातर लोग भी हौकी ही खेलते थे. बचपन में वे सुलक्षण के साथ जाती थीं, जो एक धान (पैडी) किसान थे ताकि वे उन्हें स्थानीय प्रतियोगिताओं में भाग लेते देख सकें. उन के आसपास के माहौल में हौकी हर जगह थी.

छोटी और स्थाई खुशी

बरकीछापर के कई और परिवारों की तरह सलीमा का परिवार भी एक आदिवासी समुदाय से है, जो अपनी आजीविका के लिए खेती पर निर्भर है. घर की आर्थिक स्थिति खराब थी, लेकिन हौकी छोटी और स्थाई खुशी ले कर आई.

‘‘मैं फादर के साथ साइकिल पर पीछे बैठ कर जाती थी, तो अच्छा लगता था उन के साथ टाइम बिताना, मैच देखना उन का,’’ सलीमा ने कहा. यह आकर्षण जल्द ही जिज्ञासा में तबदील हो गया. सलीमा भी खेलना चाहती थीं. उन की 5 बहनें और 1 भाई पहले से ही इस खेल से परिचित थे. सलीमा के पिता ने उन के लिए बांस की एक स्टिक बनाई. वही उन के पहले कोच थे.

सलीमा कहती हैं कि गांव के ज्यादातर लोग हौकी स्टिक नहीं खरीद पाते थे. वजह यह थी कि उन की कीमत आमतौर पर 2 हजार से 3 हजार रुपए के बीच होती है. बांस से बनी स्टिक अभी भी एक बढि़या विकल्प है. सलीमा ने मुझे बताया, ‘‘कोई बच्चा अगर जिद कर रहा है कि हौकी स्टिक चाहिए तो उसे को बांस की हौकी स्टिक बना कर दे देते हैं और वह इतनी अच्छी बनती है कि उसे छोड़ने का मन नहीं करता.’’

युवावस्था में सलीमा 2020 में नैशनल वूमंस टीम की कप्तान रह चुकीं असुंता लाकड़ा को अपना आइडल मानती थीं.                                          Image : Mohd Zakir/ Getty Image

सलीमा अभी भी मौका मिलने पर अपने पिता के मैच देखने जाती हैं. यह उन के अपने बचपन की यादों को दोबारा देखने जैसा है. सलीमा के पिता उन्हें समयसमय पर उन के मैचों के बारे में सलाह भी देते हैं.

सलीमा ने बताया, ‘‘अभी भी मैं जब खेलती हूं और कुछ मिस्टेक होता है तो वह बताते हैं कि इस पोजीशन में तू यह कर सकती है.’’ सलीमा को याद है कि कभी उन के पिता भी हौकी को पेशेवर रूप से खेलना चाहते थे लेकिन उस टाइम की सिचुएशन कुछ अलग थी.

सलीमा की मां सुभानी जो एक गृहिणी हैं, अपने सभी बच्चों को जब भी समय मिलता, हौकी खेलने के लिए प्रोत्साहित करती थीं. वे कभीकभी अपने बच्चों को खेलते हुए देखने भी आती थीं. सलीमा को याद है कि जब वे ऐसा करती थीं तो उन का चेहरा खिल उठता था.

सलीमा ने बताया, ‘‘अब भी मैं घर पर जाती हूं तो उन के फेस पर एक अलग हैप्पीनैस रहती है तो मुझे बहुत अच्छा लगता है कि पहले और अब में बहुत ज्यादा डिफरैंस है हमारी लाइफ में.’’

समय के साथ सलीमा ने स्थानीय टूरनामैंटों में भाग लेना शुरू कर दिया, जैसेकि लोकप्रिय ‘खस्सी’ प्रतियोगिताएं, जिन का नाम ‘बकरी’ के लिए ओडिया शब्द पर रखा गया है. इन प्रतियोगिताओं में विजेताओं को पुरस्कार के रूप में बकरी या मुरगियों जैसे पशुधन मिलते थे.

खेल के प्रति जनून

खेल के प्रति सलीमा का जनून स्कूल तक उन के साथ रहा. मैदान पर कई घंटे बिताने के बाद वे कक्षा में अकसर ऊंघने लगती थीं और अपने शिक्षकों से खूब डांट खाती थीं. वे हंसते हुए कहती हैं, ‘‘वैसे तो पढ़ने में इंटरैस्ट नहीं था मेरा, मैं तो यही चाहती थी कि मैं (हौकी) खेलूंगी. मैं ने ठान लिया कि मैं ने खेलना है.’’

उन के मातापिता ने हमेशा उन का साथ दिया, चाहे परिवार किसी भी समस्या से क्यों न गुजर रहा हो. उन की बड़ी बहन जो मुंबई में काम करती थीं, जरूरत पड़ने पर पैसों से मदद करती थीं. सलीमा ने हौकी के जरीए इस भरोसे को चुकाने का दृढ़ संकल्प कर लिया था.

सलीमा की प्रतिभा पर सब से पहले सिमडेगा हौकी ऐसोसिएशन के वर्तमान अध्यक्ष और हौकी झारखंड के उपाध्यक्ष मनोज कोनबेगी ने ध्यान दिया. साल 2011 में वे एक जिला स्तरीय प्रतियोगिता में खेल रही थीं, जिसे आयोजित करने में मनोज ने मदद की थी. उस प्रतियोगिता में तब 10 साल की सलीमा ने सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी का पुरस्कार जीता.

पिछले साक्षात्कारों में मनोज ने याद किया कि उन्होंने सलीमा के पिता से आग्रह किया था कि वे उसे सिमडेगा शहर में स्थित हौकी आवासीय केंद्र भेजें. यह उभरते हौकी खिलाड़ियों के लिए एक राज्य द्वारा संचालित आवासीय सुविधा थी जो बरकीछापर से लगभग 40 किलोमीटर दूर थी. अंतत: 2013 में सुलक्षण सहमत हो गए. लेकिन आवासीय केंद्र में सलीमा को अप्रत्याशित रूप से कुछ चुनौतियों का सामना करना पड़ा. Salima Tete (3)

शुरुआत में तो उन्हें अकादमी में आधिकारिक तौर पर प्रवेश ही नहीं मिला, हालांकि वह वहां प्रशिक्षण ले पा रही थीं. इस का मतलब था कि सलीमा आवास या भोजन जैसी सुविधा का लाभ नहीं उठा सकती थीं जो वहां अभ्यास करने वालों को मिलती थी. उन्होंने याद करते हुए बताया कि वे डे स्कौलर के रूप में अभ्यास करती थीं और घर से दालचावल लाया करती थीं.

सलीमा ने बताया, ‘‘मुझे भी नहीं पता था कि (मुझे) क्यों नहीं रखा जा रहा था लेकिन मैं यही सोचती थी कि मैं अपना (खाना) ले कर जाऊंगी और अपनी प्रैक्टिस करूंगी.’’

एक अच्छी बात यह थी कि उन्हें अकेलापन महसूस नहीं हुआ. रजनी सोरेंग और संगीता कुमारी जैसी खिलाड़ियों ने, जो आगे चल कर राष्ट्रीय टीम का हिस्सा बनीं, उन का हौसला बनाए रखा. सलीमा ने याद किया कि वे उन से कहती थीं कि और जोर लगाइए और अच्छा खेलिए तो कैसे नहीं रखेंगे आप को.

उन्हें घर की याद आती थी. उन के पिता हर सप्ताह के आखिर में उन से मिलने आते थे. जब वे चले जाते तो वे फूटफूट कर खूब रोती थीं.

‘‘मुझे लगता है कि अगर आप इतने ज्यादा मुश्किल हालात को संभाल सकते हो, तो जीवन में कुछ भी हासिल कर सकते हो,’’ उन्होंने बताया. सलीमा को अंतत: प्रवेश मिल गया. वे अपने गांव से केंद्र में अकेली थीं. उन्हें कोच प्रतिमा बरवा मंस एक गुरु मिलीं. वे एक पूर्व हौकी खिलाड़ी थीं जिन्हें पैर में चोट लगने के बाद खेल से संन्यास लेना पड़ा.

खिलाड़ियों के साथ मजबूत रिश्ता

सलीमा ने याद किया कि प्रतिमा एक सख्त कोच थीं. वे जो मानक उम्मीद करती थीं, उन में बहुत स्टिक थीं और अकसर दंड देती थीं. लेकिन खिलाड़ियों के साथ उन का मजबूत रिश्ता भी था. 40वें दशक के मध्य में चल रहीं प्रतिमा का इस साल जून में मस्तिष्क रक्तस्राव (ब्रेन हैमरेज) के कारण निधन हो गया.

सलीमा कहती हैं, ‘‘अफसोस होता है कि इतनी अच्छी कोच थीं और उन की मृत्यु हो गई. लेकिन कुछ नहीं कर सकते. जिस को जाना है उसे रोक नहीं सकते.’’

कोच की विरासत उन महिलाओं में जीवित है, जिन पर उन्होंने प्रभाव डाला. इंडियन ऐक्सप्रैस की एक खबर में बताया गया कि प्रतिमा ने झारखंड में कई आदिवासी लड़कियों को प्रशिक्षित किया और सलीमा टेटे, संगीता कुमारी और ब्यूटी डुंगडुंग जैसी ओलिंपियनों को आकार देने में मदद की.

ट्रेनिंग सैंटर में युवा खिलाड़ी दिन की शुरुआत भोर होते ही कर देती थीं. सुबह 4.30 बजे मैदान पर पहुंच जाती थीं. वे 7.30 बजे तक स्कूल के लिए दौड़ती थीं और शाम को फिर से अभ्यास करती थीं. सलीमा हंसते हुए कहती हैं कि ग्राउंड से जब स्कूल आते थे तो बहुत नींद आती थी.

खेलने के साथ पढ़ना भी जरूरी

मगर प्रतिमा स्पष्ट थीं कि हौकी पढ़ाई में ढील देने का बहाना नहीं हो सकती थी.

सलीमा ने कहा, ‘‘उस समय हम लोग इतना ज्यादा सीरियस नहीं होते थे पढ़ाई के लिए. बाद में समझा आया कि खेलने के साथ पढ़ना भी बहुत जरूरी है.’’

हौकी की कठिन प्रैक्टिस और शैक्षणिक दबाव के बीच होस्टल की युवा लड़कियों ने एक गहरी दोस्ती बनाई. सलीमा ने याद किया, ‘‘हम बहुत ऐंजौय करते थे, हमारी होस्टल की बौंडिंग बहुत अच्छी थी.

सभी एकसाथ कार्यक्रमों में भाग लेती थीं, एकदूसरे को सहारा देती थीं और अपने खेल का विश्लेषण करती थीं.’’ जल्द ही सलीमा की छोटी बहन महिमा भी सैंटर में शामिल हो गईं. केंद्र में दाखिला लेने के कुछ ही महीनों के भीतर सलीमा का चयन स्कूल गेम्स फैडरेशन औफ इंडिया की राष्ट्रीय प्रतियोगिता के लिए झारखंड टीम में हो गया.

एक दशक के भीतर सलीमा ओलिंपिक्स के लिए हौकी इंडिया की क्वालीफाइंग टीम में शामिल होने वाली झारखंड की दूसरी महिला बन गईं. तब से झारखंड से 4 और खिलाड़ी राष्ट्रीय महिला टीम में शामिल हुई हैं, जिन में से एक सलीमा की बहन महिमा भी हैं. ये सभी खिलाड़ी सिमडेगा के आदिवासी समुदायों से आती हैं.

खेल लेखक विनायक मोहनरंगन ने इंडियन ऐक्सप्रैस में लिखा, ‘‘झारखंड में महिला हौकी सफलता की एक कहानी है, जो ऐथलीटों, उन के परिवारों और मेहनती कोचों की प्रतिभा के माध्यम से हासिल की गई है. हौकी को राज्य के कई दूरदराज के गांवों के लिए आजीविका का स्रोत माना जाता है और इन कहानियों से उभरने वाले कुछ सामान्य पहलू महिलाओं के खेल अपनाने को ले कर बनी कई धारणाओं को तोड़ते हैं.’’

जब सलीमा घरेलू से अंतर्राष्ट्रीय सर्किट में आईं, उन्हें अपने खेल में कमियों का सामना करना पड़ा. सलीमा ने कहा, ‘‘घरेलू मैचों के मुकाबले अंतर्राष्ट्रीय खेलना मुश्किल था. कारण कि घरेलू मैच इतना ज्यादा स्ट्रक्चर से नहीं खिलाया जाता है लेकिन अंतर्राष्ट्रीय में स्ट्रक्चर के साथ खेलते हैं.’’

सलीमा को अपने परिवार की मुश्किलों से जूझाने के साहस से हिम्मत मिलती है, खासकर इस बात से कि उन्होंने कितनी मेहनत की ताकि सलीमा हौकी की ट्रेनिंग ले सके. ‘‘अगर कोई चीज मातापिता के पास नहीं होती थी तो वे किसी और से ला कर मुझे देते थे. होती है डिफिकल्ट सिचुएशन लाइफ में, लेकिन हम उस सिचुएशन को कैसे हैंडल कर सकते हैं, यह चीज लाइफ में बहुत जरूरी है,’’ सलीमा ने बताया.

इस दृढ़ता के पीछे उन के गांव में चल रही चुनौतियों की भी बड़ी भूमिका है, जहां बुनियादी ढांचा एक सतत परेशानी बना हुआ है. सलीमा ने मुझे बताया, ‘‘पहले गांव में लाइट नहीं रहती थी क्योंकि बारिश होती थी तो हवा चलती थी और लाइट के तार छूट जाते थे.

गांव बहुत अंदर की साइड है तो पहले कच्ची सड़क थी. बहुत ज्यादा कीचड़ हो जाता था. गांव जाने में दिक्कत होती थी. अब भी फोन नैटवर्क अविश्वसनीय है. जब घर वापस आती हूं तो अकसर अपने मोबाइल पर बात नहीं कर पाती हूं.’’

अपनी तरह की पहली घटना

2020 के टोक्यो ओलिंपिक्स के दौरान जब दुनिया भारतीय महिला हौकी टीम के असाधारण प्रदर्शन को देख रही थी, तब बरकीछापर में कोई मैच नहीं देख पाया.
कारण किसी एक के भी घर में टैलीविजन नहीं था. सलीमा के परिवार द्वारा सार्वजनिक रूप से अपनी निराशा व्यक्त करने के बाद झारखंड के अधिकारियों ने हस्तक्षेप किया और सेमीफाइनल से ठीक पहले उन के घर में एक स्मार्ट टीवी लगवाया गया.

यह गांव के लिए अपनी तरह की पहली घटना थी. जब भारत सेमीफाइनल मैच अर्जेंटीना से हार गया, जिस से ओलिंपिक पदक के लिए उस की दावेदारी समाप्त हो गई तो पूरा गांव बिखर सा गया.

सलीमा ने याद किया, ‘‘गांव वाले रोए भी थे. वह समय बहुत दुखद समय था क्योंकि हम जीततेजीतते हार गए थे.’’ सलीमा की सब से कठिन चुनौती पिछले साल आई जब टीम 2024 पैरिस ओलिंपिक क्वालीफिकेशन के लिए जगह न बना पाने में अपनी विफलता से जूझा रही थी. हरेंद्र सिंह को दूसरे कार्यकाल के लिए मुख्य कोच के रूप में नियुक्त किया गया. यह बदलाव का समय था.

तभी सलीमा को कप्तान नियुक्त किया गया. इस बदलाव के बारे में उन्होंने कहा कि सच बताऊं तो मुझे डर लग रहा था. हालांकि सलीमा ने पहले जूनियर महिला हौकी टीम का नेतृत्व किया था, लेकिन सीनियर टीम की कप्तानी बिलकुल नया अनुभव था. वे अपनी कम उम्र के प्रति सचेत थीं.

उन्होंने कहा, ‘‘मैं अंदर से बोल रही थी कि मुझे नहीं चाहिए. यह होता है अंदर से कि मुझे अभी खेलना है, कप्तानी तो बाद में भी मिल जाएगी. लेकिन अभी जो मुझे मिला है तो मैं ऐक्सैप्ट करती हूं और अभी जो आगे आएगा उस को भी मैं ऐक्सैप्ट कर के मैं अच्छा कप्तानी का रोल निभाऊंगी.’’

बदलाव की लहर

जैसे ही सलीमा ने अपने नए कर्तव्यों को संभाला बदलाव की लहर भी चल पड़ी. नेतृत्व ने महसूस किया कि कई खिलाड़ी चोटों से जूझा रहे हैं, और उन्होंने उन के फिटनैस स्तर को बेहतर बनाने पर ध्यान केंद्रित किया. सलीमा कहती हैं, ‘‘हौकी में भागना बहुत जरूरी है.

अगर आप के पास फिटनैस है तो आराम से 10 मिनट खेल सकते हो. हम अभी 3-3 मिनट में चेंज करते हैं, लेकिन अगर आप के पास फिटनैस है तो 6 मिनट आराम से खेल सकते हैं. अभी हमें होमवर्क मिला है कि घर में भी वर्कआउट करना है.

अब महिलाओं को हर सत्र के दौरान न्यूनतम 8 किलोमीटर दौड़ना होता है. यदि वे अभ्यास के दौरान आवश्यक दूरी पूरी नहीं करती हैं तो उन से बाद में उसे पूरा करने की उम्मीद की जाती है.’’ कोच हरेंद्र सिंह पिछले साल टीम को कन्नूर, केरल में भारतीय नौसेना अकादमी ले गए, जहां खिलाड़ियों को सेना स्टाइल के फिटनैस सत्रों का अभ्यास कराया गया.

धीमी गति की दौड़ से ले कर नाव खींचने जैसे अभ्यास तक. हरेंद्र ने द इंडियन ऐक्सप्रैस को बताया, ‘‘विचार यह था कि न्यूनतम सुविधाओं में भी उन्हें अच्छा प्रदर्शन करने का दृढ़ संकल्प दिखाना होगा.’’

2022 कौमनवेल्थ गेम्स में न्यूजीलैंड के खिलाफ पहला गोल करने के बाद टीम के साथ सैलिब्रेट करती सलीमा.

एक बड़ा झटका

इन रणनीतिक बदलावों के बावजूद टीम को इस साल जून में एक बड़ा झाटका लगा, जब 9 प्रतिस्पर्धी टीमों में सब से निचले स्थान पर रहने के बाद उसे एफआईएच प्रो लीग से बाहर कर दिया गया.

सलीमा ने कहा, ‘‘सच बताऊं हारने के बाद एकदूसरे की शक्ल भी देखने का मन नहीं करता. कोई भी खिलाड़ी हारना नहीं चाहता. टीम ने बहुत ऐफर्ट किया पर स्कोर नहीं हो पाया.’’

टीम अपनी हार की समीक्षा कर रही थी. ‘‘पूछना बहुत जरूरी है कि हम क्यों हारे,’’ सलीमा ने कहा. भारत में किसी खेल में हार का खमियाजा खिलाड़ियों को भारी कीमत चुका कर देना पड़ता है.

यह खासकर हाशिए पर मौजूद खिलाड़ियों के खिलाफ नफरत भरा विरोध भी भड़का सकता है. जब भारत 2020 ओलिंपिक में अर्जेंटीना से सेमीफाइनल हार गया तो यह उन पूर्वाग्रहों की एक कड़वी याद दिलाता है जिन से खिलाड़ियों को जूझाना पड़ता है.

उत्पीड़ना का सामना

उस साल वंदना कटारिया ने ओलिंपिक में हैट्रिक लगाने वाली पहली भारतीय महिला बन कर इतिहास रचा. लेकिन सेमीफाइनल मैच के बाद उन के गृहनगर में उन के परिवार को जातिवादी उत्पीड़न का सामना करना पड़ा.

खबरों के मुताबिक, तथाकथित उच्च जाति के 2 लोगों ने उन के घर के बाहर पटाखे फोड़े, उन्हें गालियां दीं और कहा कि टीम इसलिए हारी क्योंकि उस में ‘बहुत ज्यादा दलित खिलाड़ी’ थे.

तत्कालीन टीम की कप्तान रानी रामपाल ने पत्रकारों से कहा, ‘‘यह कितनी बुरी बात है, हम इस में अपनी जान और आत्मा लगा देते हैं, अपने देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए इतना संघर्ष और त्याग करते हैं और फिर हम देखते हैं कि क्या हो रहा है.

वंदना के परिवार के साथ जो हुआ मैं लोगों से बस इतना कहना चाहती हूं कि कृपया यह धार्मिक विभाजन और जातिवाद बंद करें.’’ रानी ने बताया कि टीम के खिलाड़ी विभिन्न क्षेत्रों और धर्मों से आते थे. लेकिन यहां हम भारत के लिए काम करते हैं. खेलने के अलग दृष्टिकोण, अलग शैली और ताकत की बहुलता टीम के सब से बड़े फायदों में से एक है.

लेकिन इस का यह भी मतलब है कि कप्तान को कई आवाजों को समझाना और एकजुट करना होता है. सलीमा ने कहा, ‘‘सब की बात सुनना एक चैलेंज है पर हो जाता है. सब की अलगअलग सोच है और सब का खेलने का तरीका भी अलग है.

सारे अलगअलग राज्यों से भी हैं और अलगअलग लोग हैं. सब की संस्कृति है. मगर जब हम ग्राउंड में आते हैं तो एकसाथ हो जाते हैं.’’ सलीमा ने बताया कि खिलाड़ियों ने एकदूसरे की शैलियों की गहरी समझा विकसित कर ली है.

उन्होंने मुझे बताया, ‘‘सब को पता है कि सलीमा के पास स्पीड है तो जब मेरे पास बौल होता है उन को पता है मेरे पास नहीं आने के लिए, मैं पास करूंगी.’’ हौकी की एक शैली सलीमा ने आगे कहा कि संगीता कुमारी जो झारखंड से ही हैं, अपनी प्रभावी डाजिंग के लिए जानी जाती हैं.

यह हौकी की एक शैली है

जिस का उपयोग डिफैंडरों को मात देने और गेंद पर कब्जा बनाए रखने के लिए किया जाता है. साथ ही, सलीमा ने कहा कि हरियाणा की खिलाड़ी उदिता दूहन किसी भी तरह की हिट को टैकल कर सकती हैं.

अभी से सलीमा का ध्यान आगे के रास्ते पर है. टीम महिला एशिया कप की तैयारी कर रही है, जो सितंबर की शुरुआत में चीन में होने वाला है. इस से आगे का कुछ भी बहुत दूर लगता है. हालांकि उन के परिवार ने उन पर कोई उम्मीदें नहीं थोपी हैं.

वे अंतत: शादी करना और परिवार शुरू करना चाहेंगी. उन्होंने मुझे बताया, ‘‘हमारे गांव में शादी का प्रेशर नहीं होता.’’

सलीमा का गांव और पैतृक घर उन के लिए सुकून की जगह बने हुए हैं. यहीं उन्हें शांति मिलती है जो उन्हें जमीन से जोड़े रखती है. धान के खेतों की सरसराहट के बीच उन के छोटे भतीजेभतीजियों की खेलते समय खिलखिलाहट में और अपनी बहन और पिता के साथ एक नए खुले जिम में समय बिताने में सुकून मिलता है. गांव में जौब करने वाले बहुत कम हैं पर यहां सब के खेत हैं. धान के खेत हैं, सब्जी है. जब मैं घर जाती हूं तो जंगलखेत देख कर अच्छा लगता है.

इन जड़ों के बिना सलीमा की यात्रा की कल्पना करना मुश्किल है. आखिर उन के खेल को ऊपर उठाने में उन के पूरे गांव का सहयोग था.  Salima Tete

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