Best Hindi Story: ‘‘कहां जा रही हो चंचलिका?’’ जयश्री ने अपार्टमैंट से बाहर जा रही चंचलिका को टोका. वह अभीअभी कहीं बाहर से आकर अपार्टमेंट के अंदर प्रवेश कर रही थी. ‘‘जा रही हूं प्रवीण के साथ बाहर.’’ चंचलिका ने फीकी मुसकराहट के साथ कहा. ‘‘ओहो प्रवीण के साथ बाहर…? ’’ जयश्री ने उसे छेड़ा. ‘‘आज मेरा मन था घर में आराम करने का पर प्रवीण है कि मानता नहीं,’’ चंचलिका ने थोड़ा झंझलाते हुए कहा. इस बीच कैब ड्राइवर की कौल आ गई, ‘‘कैब वाला इंतजार कर रहा है. फिर मिलती हूं. सी यू,’’ बोलते हुए चंचलिका आगे बढ़ गई और फिर फोन रिसीव कर ड्राइवर से कहा, ‘‘एक मिनट में आई.’’ कैब ठीक गेट के बाहर खड़ी थी. कैब में बैठ कर चंचलिका ने ड्राइवर को ओटीपी बताया. ड्राइवर ने अपने मोबाइल में ओटीपी फीड किया और कैब को आगे बढ़ा दी. आज चंचलिका का बिलकुल मूड नहीं था बाहर जाने का.
उस ने प्रवीण से कहा भी कि आज मुझे माफ करो. मगर प्रवीण ने उस की एक न सुनी. लाचार हो कर उसे बाहर जाने के लिए तैयार होना पड़ा. कैब सड़क पर दौड़ी जा रही थी क्योंकि आज ट्रैफिक काफी कम था. चंचलिका अपने खयालों में खोई हुई थी… पिछले 7 महीनों से चंचलिका प्रवीण के साथ डेटिंग कर रही थी. इन 7 महीनों में एक भी रविवार को वह फ्री नहीं रह पाई है.
ऐसा नहीं था कि प्रवीण के साथ समय बिताना उसे अच्छा नहीं लगता था बल्कि उस के साथ समय बिताना बहुत ही अच्छा लगता था. प्रवीण उस का साथ अधिक से अधिक चाहता था और वह इसे बहुत ही अच्छा मानती थी. पर कभीकभी मुश्किल हो जाती थी उस के लिए. जैसे आज का दिन. औफिस में पिछले 3 दिनों से वह इतनी व्यस्त रही कि पूछो मत. औफिस से आतेआते 10 बज जाते थे. सुबह जल्दी निकालना पड़ता था. ऐसेऐसे कार्यक्रम हुए पिछले 3 दिनों में कि लंच करने तक का समय मुश्किल से निकल पता था. ऐसे में वह इस रविवार को आराम करना चाहती थी.
कल भी औफिस से आतेआते 10 बज गए थे. 11 बजे तक वह सो पाई थी. सोचा था आज दिनभर घर में रहेगी और आराम करेगी पर सुबह 6 बजे ही प्रवीण की कौल आ गई थीं. जानू, सोना, हीरा, मोती उस का कुछ भी संबोधन अच्छा नहीं लग रहा था. जी चाह रहा था कि फोन काट कर फिर से सो जाए. नैटवर्क की कृपा से फोन एक बार कट भी गया. उस ने कौल बैक करने के स्थान पर सोना उचित समझ पर अगले ही पल प्रवीण का फिर से फोन आ गया. ‘‘बाबा आज मैं बहुत थक गई हूं. अभी सो रही हूं. बाद में फोन करती हूं,’’ चंचलिका ने उबासी लेते हुए कहा. ‘‘जितना सोओगी उतना ही थकान हावी रहेगी. जल्दी से उठ जाओ.
आज चलेंगे पिंक पर्ल. वाटर गेम्स का मजा लेंगे,’’ प्रवीण ने कहा. ‘‘नहीं, आज नहीं. फिर कभी,’’ उस ने प्रोग्राम को टालने की कोशिश की. ‘‘ऐसा मत कहो, मैं ने 2 टिकट ले भी लिए हैं,’’ प्रवीण ने मनुहार की. चंचलिका कुछ देर चुप रही. उसे लगा वह जोर से चिल्ला कर डांट दे प्रवीण को कि सिर्फ अपनी बात समझ में आती है तुम्हें, दूसरों का कोई खयाल नहीं रहता पर प्रत्यक्षत: बोली, ‘‘कितने बजे आना है?’’ ‘‘दैट्स लाइक अ गुड गर्ल,’’ प्रवीण खुश हो गया. बोला, ‘‘11 बजे तक मेरे फ्लैट में आ जाओ. यहां से इकट्ठा चल पड़ेंगे. आज दोपहर का लंच और शाम के स्नैक्स वहीं ले कर आएंगे. दिनभर वाटर पार्क में मस्ती करेंगे.
यदि आने में दिक्कत हो तो मैं आ जाता हूं कार ले कर.’’ ‘‘थोड़ी देर से चलें तो कैसा रहेगा?’’ चंचलिका ने कहा. ‘‘ठीक है, 12 तक आ जाओ,’’ प्रवीण ने कहा और फोन काट दिया. थोड़ी देर और सोने की इच्छा हो रही थी चंचलिका की पर इतनी देर बात करने के बाद नींद उड़ चुकी थी. साथ ही यह भी चिंता थी कि 12 बजे तक प्रवीण के फ्लैट पर पहुंचना भी है. अंत में उस ने बिस्तर छोड़ दिया. सिर भारी लग रहा था. सब से पहले उस ने चाय बना कर पी. कुछ कपड़े इकट्ठा हो गए थे धोने के लिए, उन्हें धोया. फिर ब्रेकफास्ट तैयार कर ब्रेकफास्ट किया.
नहाधो कर बेमन से वह बाहर निकली. ‘‘लोकेशन यही दिखा रहा है,’’ ड्राइवर की आवाज सुन कर उस की तंद्रा भंग हुई. ‘‘हां, यहीं रोक दो, बार कोड देना,’’ उस ने बार कोड स्कैन कर कैब का भुगतान किया और प्रवीण को कौल करनी चाही. तभी देखा कि मोबाइल पर ऐप मैसेज आया हुआ था, ‘प्रवीण हैज इन्वाइटेड यू,’ यह प्रवीण की खासीयत थी. वह पहले ही ऐप के जरीए उसे फ्लैट में प्रवेश करने का पास भेज दिया करता था. गेट पर गार्ड को दिखाकर वह अंदर चली गई. प्रवीण के फ्लैट की डोरबैल जैसे ही दबाई, प्रवीण बाहर निकाल आया, ‘‘हैलो, यू आर लेट बाय फाइव मिनट,’’ वह चहका.
चंचलिका कहना तो चाहती थी कि मैं तो आना ही नहीं चाहती थी पर सिर्फ इतना ही बोली, ‘‘5 मिनट चलता है.’’ ‘‘नैपोलियन ने अपने कमांडर को 1 मिनट लेट आने पर क्या बोला था पता है? चेंज योर वाच और आई विल चेंज माई कमांडर,’’ प्रवीण ने कहा. ‘‘तुम थे वहां सुनने के लिए?’’ चंचलिका ने पूछा. ‘‘अरे, मैं ही कमांडर था. उस के बाद मैं कभी भी देर से नहीं पहुंचता,’’ प्रवीण ने कहा और जोरदार ठहाका लगाया. चंचलिका उस का साथ नहीं दे पाई. उसे चुप देख कर प्रवीण चिंतित हो गया, ‘‘क्या हुआ? परेशान लग रही हो?’’ ‘‘अरे बाबा बुरी तरह थकी हुई हूं, आराम चाहिए मुझे,’’ चंचलिका ने कहा. बाहर घूमनेफिरने से ही थकावट दूर होती है. चाय पीओगी?’’ प्रवीण ने कहा. ‘‘नहीं अभी ब्रेकफास्ट ले कर आई हूं.
चाय की इच्छा नहीं है,’’ चंचलिका ने कहा. ‘‘तो फिर चलते हैं,’’ प्रवीण ने दीवार पर टंगी गाड़ी की चाबी हाथ में लेते हुए कहा. दोनों बाहर निकले. गाड़ी की चाबी के साथ ही वह फ्लैट की भी एक चाबी रखता था. फ्लैट का दरवाजा लौक कर दोनों साथ में लिफ्ट में दाखिल हो गए. लिफ्ट से बेसमैंट में जा कर गाड़ी में बैठे और चल पड़े वाटर पार्क की ओर. दिनभर खूब मस्ती की दोनों ने. वहीं लंच लिया. शाम को स्नैक्स भी वहीं लिए. 7 बजे प्रवीण ने चंचलिका को उस के फ्लैट पर पहुंचाया और फिर वापस लौट गया.
कपड़े बदलते वक्त चंचलिका सोच रही थी कि इस में कोई दो मत नहीं कि प्रवीण मेरा बहुत खयाल रखता है पर कभीकभी अपने लिए भी समय चाहता है इनसान. अगर प्रवीण का यही रवैया रहा तो कहीं उस के प्रति दिल में अरुचि न पैदा हो जाए. कैसे समझऊं यह बात मैं प्रवीण को? सोचतेसोचते चंचलिका सोफे पर ही सो गई. नींद खुली तो रात के 11 बज रहे थे. खाना बनाने की जरा भी इच्छा नहीं हुई उस की.
बिस्तर पर जा कर वह फिर से सो गई. आखिर अगले दिन औफिस भी तो जाना था. दिन बीतते रहे और शनिवार आ गया. चंचलिका की एक सखी थी विनीता. उ स ने अपनी लिखी एक कहानी संग्रह भेजा था. वह उन कहानियों को पढ़ना चाहती थी. मौका निकाल कर 1-2 कहानियां पढ़ तो ली थीं पर अधिकांश कहानियां नहीं पढ़ पाई थी. कभीकभी विनीता पूछ भी लेती थी. उसे कहते हुए बुरा भी लगता था कि वह अभी तक उस की कहानियां नहीं पढ़ पाई है.
अगले रविवार को चंचलिका ने इस काम के लिए मन ही मन तय कर रखा था. पर शनिवार को ही प्रवीण का फोन आ गया, ‘‘कल हम चलेंगे सैयारा देखने मौल औफ जयपुर में. पहले कहीं खाना खाएंगे फिर 4 का शो देख कर वापस आएंगे.’’ ‘‘मुझे माफ करो, यह रविवार मैं ने किसी और काम के लिए रखा है. तुम देख आओ सैयारा,’’ चंचलिका ने कहा. ‘‘क्या बात कर रही हो? अकेले मूवी देखने में वह आनंद नहीं आता. ऐसा कौन सा काम है जिस के लिए तुम्हें सारा दिन चाहिए?’’ प्रवीण ने कहा. ‘‘प्रवीण समझ करो बात को. मुझे कई महीनों से अपने लिए समय नहीं मिला है. मुझे अपने लिए भी समय चाहिए होता है और कल मैं कोई फोन भी नहीं उठाऊंगी. प्लीज मुझे डिस्टर्ब मत करना,’’ चंचलिका ने रूखेपन से कहा.
इस के बाद प्रवीण ने सिर्फ ‘ओके’ कहा और फोन काट दिया. कुछ देर के लिए बुरा भी लगा चंचलिका को. पर वह जानती थी अगर उस की बात मान लेगी तो फिर पूरा रविवार उसे उस के साथ रहना पड़ेगा और फिर पछताना पड़ेगा उसे. रविवार को चंचलिका देर से सो कर उठी. आराम से अपने काम निबटाए और फिर विनीता का कहानी संग्रह पढ़ने लगी. उन कहानियों में एक कहानी ‘नया रास्ता’ शीर्षक से थी जो काफी हद तक उस की अभी की स्थिति को दर्शाती थीं. उस कहानी का नायक नायिका से इतना चिपका रहता था कि नायिका का जीना दूभर हो गया था. फिर नायिका ने एक नया रास्ता अपनाया. वह नायक से इतना ज्यादा चिपकने लगी कि नायक को कहना पड़ा कि इतनी नजदीकी भी ठीक नहीं. मुझे अपने लिए कुछ समय चाहिए.
नायिका ने उसे तब समझया कि वह उसे बस यही बताना चाहती थी कि हर व्यक्ति को चाहे वह पति हो, पत्नी हो, प्रेमी हो या प्रेमिका अपने लिए समय चाहिए होता है. क्या यही उपाय वह अपना सकती है प्रवीण के साथ? चंचलिका ने सोचा और फिर निर्णय ले लिया कि वह यही उपाय अपनाएगी प्रवीण को समझने के लिए. कुछ दिन तो प्रवीण शांत रहा पर फिर उसी ढर्रे पर चलने लगा. अब चंचलिका ने भी उसे दिनरात कौल करना शुरू कर दिया. कई बार उसे बिना काम के अपने फ्लैट पर बुला लेती. प्रवीण पहले तो खुशीखुशी उस की कौल उठाता रहा और खुशीखुशी उस के फ्लैट पर आता भी रहा पर बाद में उसे परेशानी होने लगी. एक दिन चंचलिका ने फोन कर उसे अपने फ्लैट पर बुलाया.
औफिस में थक कर उस समय वह घर आया ही था. चंचलिका के फोन पर वह उस के पास आ तो गया पर रास्ते में ट्रैफिक ने उस की हालत पतली कर दी. चंचलिका ने उसे बताया, ‘‘एक स्टोर से नमकीन लाई हूं. सोचा तुम्हारे साथ इस का स्वाद चखूं. प्रवीण बहुत परेशान महसूस कर रहा था. उस के दिमाग में कुछकुछ बात आ रही थी कि चंचलिका यह सब उसे यह समझने के लिए कर रही है कि आपस में कितना भी प्रेम हो अपने लिए सभी को वक्त चाहिए होता है. ‘‘चंचलिका, तुम यह सब यही समझने के लिए कर रही हो न कि हर व्यक्ति को अपने लिए वक्त चाहिए चाहे वह किसी के कितना भी नजदीक क्यों न हो?’’ प्रवीण ने कहा.
चंचलिका चुप रही. बस उसे देखती रही. प्रवीण ने आगे बात बताई, ‘‘मैं समझ गया हूं. पहले तुम ने स्पष्ट रूप से समझया था. मैं ने तुम्हारी बातों की परवाह नहीं की थी. अब तुम व्यवहार से इस बात को समझ रही हो. मैं समझ गया. आगे से मैं इस बात का खयाल रखूंगा कि तुम पर अपने प्रोग्राम न ला दूं, हम जो भी करें दोनों की सहमति से करें.’’ चंचलिका ने प्यार से प्रवीण की नाक पकड़ कर हिला दी. बोली, ‘‘चलो इसी बात पर नमकीन के साथसाथ चाय भी बना लाती हूं. और हां खाना भी मेरे हाथ का बना हुआ खा कर ही जाना.’’
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