Best Hindi Story: आज संजना और समीर की सगाई थी. शादी 8 महीने बाद दिसंबर में तय हुई थी. सगाई से शादी तक का वक्त दोनों के लिए बहुत अच्छा गुजरा था. कभी दोनों अपने चचेरे, ममेरे भाईबहनों के साथ पिकनिक मनाने तो कभी एकदूजे के पारिवारिक फंक्शन में जाते.
इन 8 महीनों में दोनों को ही एकदूसरे के व्यवहार से कोई शिकायत नहीं हुई. देखते ही देखते दोनों की धूमधाम से शादी हो गई. हनीमून मना कर लौटे तो दोनों ने अपनीअपनी दिनचर्या में ढलना शुरू कर दिया.
कंपनी की तरफ से समीर को फ्लैट मिला था. संजना ने उसे समीर के साथ बहुत प्यार से सजाया था. दोनों अकसर घर में कोई न कोई सामान लाते रहते थे. संजना कभी मैचिंग कुशन लाती तो समीर कमरे के हिसाब से कोई टेबल या ट्रौली देखता.
घर पूरा सज गया तो एक दिन दोनों ने अपनेअपने परिवार को डिनर पर बुलाया. सभी ने घर की खूब तारीफ की. दोनों के परिवार ज्यादा दूरी पर भी नहीं थे. समीर के मातापिता थे और संजना के पिता नहीं थे. उस के घर पर उस की मम्मी और छोटा भाई कार्तिक रहते थे.घर के सदस्य सम?ादार थे इसलिए जल्दीजल्दी इन दोनों के घर आ कर न ही कोई दखलंदाजी करते और न ही बेकार के सलाहमशवरे देते.
शादी का 1 साल बीततेबीतते संजना गर्भवती हो गई. समीर की बहन नेहा ने उन्हें
डाक्टर रमनीक से मिलने की सलाह दी. वे नेहा की भी गायनेकोलौजिस्ट रही थीं. उन्होंने सब से पहले दोनों के कुछ बेहद जरूरी टैस्ट कराने की सलाह दी.
‘‘इतने टैस्ट किसलिए डाक्टर?’’
‘‘ये एचआईवी, हैपेटाइटिस बी, हैपेटाइटिस सी, थायराइड और थैलीसीमिया के टैस्ट हैं, प्रारंभिक जांच से कोई कौंप्लिकेशन होने पर सही गाइडैंस और दवाइयों से मांबच्चे दोनों को स्वस्थ रखा जा सकता है और संजना का 3 बार अल्ट्रासाउंड भी होगा और 9 महीने के दौरान मां को 2 इंजैक्शन भी लगेंगे.’’
‘‘3 बार अल्ट्रासाउंड क्यों? मैं ने तो सुना है कि बारबार इस तरह की जांच नहीं होनी चाहिए, बच्चे को खतरा हो सकता है,’’ संजना डरी सी बोली.
‘‘किस से सुना है?’’ रमनीकजी ने मुसकराते हुए पूछा.
‘‘पड़ोस में सुना था,’’ संजना हिचकिचाते हुए बोली.
‘‘बच्चे को खतरा होगा नहीं बल्कि बच्चे को खतरे से बचाया जा सकेगा. पहले अल्ट्रासाउंड में बच्चे की ग्रोथ, भ्रूण की स्थिति, बच्चा कहीं गर्भाशय के बाहर तो नहीं बन रहा, बच्चे जुड़वां तो नहीं हैं और डिलिवरी की तिथि तय करने के लिए होता है और दूसरा अल्ट्रासाउंड चौथे से 5वें महीने के बीच होता है यह देखने के लिए कि बच्चे की ग्रोथ सही तरीके से हो रही है न.
‘‘तीसरा अल्ट्रासाउंड 8वें से 9वें माह के दौरान होता है. अब तक बच्चे के सभी अंग बन चुके होते हैं, उस की शारीरिक संरचना में कोई जटिलता तो नहीं है यह देखने के लिए होता है. अब तो कोई शक नहीं है न?’’ रमनीकजी ने हंसते हुए कहा.
‘‘पर डाक्टर मुझे इंजैक्शन से बहुत डर लगता है, बहुत दर्द होगा, समीर बताओ न इन को मैं इंजैक्शन से कितना डरती हूं.’’
यह सुन कर समीर और रमनीकजी दोनों हंस पड़े.
‘‘अब बच्चे को मां ही जन्म देती है न इसलिए तुम्हें ही लगवाने होंगे वरना तुम्हारी जगह समीर को लगा देते,’’ रमनीकजी ने यह कह कर सभी को हंसा दिया.
‘‘ये 2 इंजैक्शन टीडी यानी डिप्थीरिया टौक्साइड्स और टीटी यानी टिटनस टौकसाइड के होते हैं. इस में पहला इंजैक्शन प्रैगनैंसी के 20 हफ्ते बाद और दूसरा इस के 1 महीने बाद लगाता है. इस से शिशु की डिप्थीरिया, टिटनस और काली खांसी से सुरक्षा होती है. मांएं तो बच्चों के क्याक्या कर जाती हैं तुम 2 इंजैक्शन नहीं लगवा सकतीं?’’ रमनीकजी मजाकिया लहजे में बोली.
‘‘अरे, अब तो 10 इंजैक्शन भी लगवा ले,’’ समीर भी खुल के हंसता हुआ बोला तो संजना ने झूठमूठ के गुस्से के साथ उसे देखा.
पतिपत्नी दोनों की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था. आने वाले मेहमान के लिए दोनों ने ढेर सारे सपने देख डाले. छोटेछोटे कपड़ों को देख कर संजना तो जैसे खुद बच्ची बन जाती. बहुत खुश रही वह शुरू के महीनों में. हालांकि चक्कर आना, जी मिचलाना ऐसी समस्याएं होती रहती थीं उसे पर समीर उस का काफी ध्यान रखता था.
मगर कभीकभी संजना को ऐसा महसूस होता कि उसे इतनी कमजोरी आ गई है कि बैड से उठना मुश्किल हो रहा है और जी घबरा रहा है. ऐसे में समीर नेहा को घर बुला लेता था. उन की और संजना की अच्छी जमती थी. उन के बच्चे बड़े हो चुके थे और उन्होंने घर में छोटा सा कुकिंग स्टूडियो बना रखा था. स्टूडैंट्स को उन को बनाया खाना बेहद पसंद था और वे खूब रुचि ले कर सीखते थे.
‘‘संजू, यह होता रहता है, तुम ऐसा किया करो कि खाना 3 बार की जगह 6-7 बार खाया करो. थोड़ाथोड़ा कर के खाओ. अपने बैड के पास रस्क जैसी चीजें रखा करो और बैड से ?ाटके से नहीं उठना. उठते ही नाश्ते से 20-25 मिनट पहले बिस्कुट और टोस्ट ले लिया करो. समय के साथ चक्कर और जी मिचलाना खत्म हो जाएगा.’’
नेहा कुछ चटपटा बना कर खिलाती तो संजना को बहुत अच्छा लगता. नेहा संजना को
समझाती रहती थी कि नीबू भी चाट सकती हो, कुछ खुशबूदार चीजें अपने पास रखा करो जैसे साबुन का रैपर या संतरा खाओ तो उस के छिलके सूंघने से उसे अच्छा लगेगा.
संजना तो बहुत हंसती थी पर नेहा की इन सलाहों से उसे बहुत आराम मिला. इन सब के साथ ही नेहा उसे यह सम?ाना नहीं भूली कि ज्यादा घीतेल में तली हुई चीजें नहीं खानी. गर्भ में शिशु मां से ही अपना खाना ग्रहण करता है तो इस का मतलब यह नहीं कि वह 2 जनों का खाना खाना शुरू कर दे बल्कि मां का आहार संतुलित और पोषक तत्त्वों से भरपूर होना चाहिए जो मां और शिशु दोनों के लिए ही फायदेमंद होगा.
5 महीने बाद जब संजना का पेट आकार लेने लगा तो वह खुद ही काफी देर अपनेआप को आईने में देखती रहती. पेट सहलाना उसे अच्छा लगता.पेट में शिशु की हलचल उसे और समीर को बहुत रोमांचित करती थी. धीरेधीरे संजना के व्यवहार में कुछ परिवर्तन सा आने लगा. खाने से दिल ऊबने लगा. कुछ विशेष खाने की चाहत होती तो जब तक वह मिल नहीं जाता किसी अन्य चीज को मुंह न लगाती.
बातबेबात गुस्सा कर जाती समीर पर. स्ट्रैच मार्क्स को देख कर चिढ़ जाती हालांकि समीर ने डाक्टर की सलाह पर उसे क्रीम ला कर दी थी पर संजना को ऐसा लगता जैसे शरीर की बनावट बहुत बुरी हो गई है. स्तन ढल से गए हैं, ध्यान देने के बावजूद पेट पर धारियां पड़ती ही जा रही हैं.
डाक्टर की सलाह पर व्यायाम करती तो दिल में डर भी पनपता रहता कि
इस से प्राकृतिक प्रसव में आसानी होगी पर उस ने तो फिल्मों में सदा ही मां को प्रसव वेदना में तड़पते हुए ही देखा है. उफ, क्या मैं इतना दर्द झेल पाऊंगी? मम्मी सांत्वना तो देती रहती हैं पर प्रसवपीड़ा तो मुझे ही झेलनी होगी.
इन्हीं सोचों के साथ रात को उस की नींद खुल जाती थी. साथ सोए समीर को देखती तो जगाने की जगह उलटेसीधे विचारों में गोते खाती रहती. कैसे आराम से सो रहा है और यहां मेरी हालत खराब हो रही है.
न उठा जा रहा है, न लेटा जा रहा है. डाक्टर ने जिस करवट ज्यादा लेटने को कहा है उस करवट तो मुझे नींद आती भी नहीं और पेट पर इतनी खुजली, कितना लोशन लगाऊं?
जैसेजैसे गर्भ बड़ा हो रहा था ब्लैडर पर दबाव पड़ रहा था. इस कारण से उसे बारबार मूत्र त्याग की इच्छा होती थी. ऐसी अवस्था में बारबार उठना उस के लिए कष्टदायक था. वह चिड़चिड़ी सी हो कर रोने लगती.
एक दिन संजना की सहेली सुहानी आई हुई थी तो उस ने बताया कि उसे इस हालत में खुश रहना चाहिए. पौजिटिव विचार ही उस के और उस के होने वाले बच्चे के लिए अच्छे साबित होंगे. मनपसंद संगीत सुने, अच्छी किताबें पढ़े. सवेरे मौर्निंग वाक पर जाए.
‘‘कुछ महिलाओं का गर्भावस्था का सफर तो यह सुनते हुए ही बीत जाता है कि बच्चे तो हम ने भी पैदा किए हैं पर इतना आराम, यह पति का पीछेपीछे भागना, ये नखरे उठाना, ये डाक्टरों के चोंचले कि यह व्यायाम करो, खुश रहो, यह सब तो हम ने नहीं किया. आजकल की लड़कियां तो ज्यादा ही नाजुक हैं कुछ. पहली ही दफा में ऐसी बेहाल हो रही हैं हम ने 4-4 बच्चे बिना किसी तकलीफ के पैदा कर डाले थे. अब बता, तू खुशकिस्मत है तुझे ये सब नहीं बल्कि तेरी भलाई के लिए अच्छी नसीहतें सुननी पड़ रही हैं इसलिए अच्छा सोच, सब अच्छा ही होगा.’’
‘‘हां यार, समीर की मम्मी बहुत अच्छी हैं. बीते दिनों आई थीं तो मेरा इतना खयाल रखा कि क्या बताऊं. कह रही थीं कि लड़का हो या लड़की यह माने नहीं रखता बस बच्चा स्वस्थ हो यह सब से बड़ी बात है.’’
संजना का 9वां महीना शुरू हो चुका था. एक रात अचानक उसे पेट में तेज दर्द उठा. वह कराहने लगी. उस की आवाज सुन कर समीर जल्दी उठ बैठा.
संजना की हालत देख कर समीर बहुत घबरा गया. उस ने जल्दी से आशाजी को उठाया. आशाजी ने तुरंत उसे हौस्पिटल चलने के लिए कहा. जब तक समीर ने गाड़ी दरवाजे के बाहर लगाई तब तक आशाजी ने संजना का पैक किया हुआ बैग भी ले लिया और संजना को सहारा दे कर बाहर भी ले लाई.
समीर ने जल्दी से संजना को पीछे की सीट पर बैठाया. संजना का सिर आशाजी की गोद में था. वे बराबर उसे हौसला दे रही थीं.
‘‘संजू, बस अभी हौस्पिटल पहुंच रहे हैं, सब ठीक हो जाएगा. मैं हूं न, बिलकुल नहीं डर, अभी बहनजी भी आ जाएंगी.’’
‘‘पर मम्मी, अभी तो डाक्टर ने जो डेट बताई थी उस में 10 दिन बाकी हैं, यह संजू की तबीयत अभी से क्यों बिगड़ रही है?’’ समीर वास्तव में बहुत घबरा गया था.
‘‘कई बार ऐसा हो जाता है, नियत तिथि से आगेपीछे दर्द उठ सकता है, अब तुम डरो मत, गाड़ी सावधानी से चलाओ.’’
हौस्पिटल पहुंचते ही संजना इमरजैंसी में पहुंचा दी गई. डाक्टर ने
तुरंत कुछ चैकअप किए.
‘‘समीर, डाक्टर रमनीक को बुला लिया गया है, वे बस आती ही होंगी.’’
‘‘संजना ठीक तो है न?’’
‘‘दरअसल बच्चा पेट में घूम गया है पर डरिए मत बच्चे के दिल की धड़कन सामान्य है.’’
तब तक कमलाजी भी कार्तिक और अपनी छोटी बहन सुनीता के साथ हौस्पिटल पहुंच गईं.
सारी बात सुनने के बाद सुनीता बोली, ‘‘अरे, ये सब डाक्टर बिल बड़ा करने के चक्कर में रहते हैं. ऐसे दर्द तो उठते ही रहते हैं. हम ने भी बच्चे पैदा किए हैं. ऐसे ही इन अंगरेजी डाक्टरों की सुनते तो सारा पैसा लुटा चुके होते. घर ले जा संजू को, पेट में गैस हो गई होगी, कुछ ही देर में ठीक हो जाएगी. कोई जरूरत नहीं है यहां रुकने की.’’
‘‘आप जैसे विचारों वालों की वजह से ही आज भी ना जाने कितने घरों में शिशु जन्मपूर्व ही मृत्यु को प्राप्त हो रहें हैं. खैर, समीर संजना को अभी औपरेट करना होगा वरना केस कौंप्लिकेट हो सकता है, तुम पेपर्स साइन कर दो,’’ यह डाक्टर रमनीक थीं. उन्होंने एक उड़ती सी निगाह सुनीता पर डाली और तुरंत औपरेशन थिएटर में चली गईं.
औपरेशन में लगने वाला समय समीर पर सदियां बन कर गुजर रहा
था. तभी ओ.टी. का दरवाजा खुला और डाक्टर रमनीक अपनी बाहों में नन्हा फरिश्ता थामे बाहर आईं. सभी उन के पास चले आए.
‘‘बहुत बधाई हो समीर, बहुत प्यारी सी बेटी के पापा बन गए हो,’’ कहने के साथ ही उन्होंने बच्ची को समीर को थमाया.
अपनी नन्ही मासूम बेटी का चेहरा देख कर समीर की आंखें खुशी से छलक गईं.
‘‘मेरी नन्ही सी जान, हमारी जूही.’’
‘‘जीजू,कितनी प्यारी है, बिलकुल डौल जैसी और नाम तो बड़ा प्यारा रखा है, जूही,’’ कार्तिक खुशी से चहका.
आशाजी और कमलाजी भी बेहद खुश थीं.
घर लौटते समय सुनीता कमलाजी से बोलीं, ‘‘पहलेपहले तो बेटा होना चाहिए था.’’
कमलाजी ने चिढ़ कर सुनीता को देखा और कहा, ‘‘सुनीता, तुम कैसी बातें कर रही हो, आजकल कोई लड़कालड़की में भेदभाव करता है क्या? एक मां की गर्भयात्रा और प्रसव वेदना एक लड़की के लिए भी बिलकुल वैसी ही होती है जैसे एक लड़के के जन्म लेने पर और हौस्पिटल में यह तुम क्या बोलने लग गई थी… अरे, सिजेरियन मां और बच्चे की जान बचाने के लिए कुछ विशेष परिस्थितियों में लिया गया निर्णय होता है और साथ ही यह दंपती की व्यक्तिगत इच्छा होती है. इस में किसी को दखलंदाजी नहीं करनी चाहिए सम?ा और सब से बड़ी बात हम खुद अपने मातापिता की 2 संतानें हैं और मैं पहली बड़ी लड़की हूं और इस तरह तुम्हारी लड़के की सोच के हिसाब से तो फिर हमारे मातापिता को मेरे जन्म के दुख के बाद तुम्हारे होने से भी बड़ी निराशा हुई होगी.’’
सुनीता बुरी तरह से मुंह बना कर चेहरा घुमा कर कार की खिड़की से बाहर देखने लगीं.
3 दिन बाद संजना घर आ गई. घर में संजना के साथ बच्ची की देखभाल के लिए 15 दिन बारीबारी से संजना और समीर की मांएं रुकेंगी, यह सोचा गया.
हफ्तेभर बाद संजना के टांके कट गए. उसे भार न उठाने, सावधानी से उठनेबैठने और कम से कम डेढ़ महीने तक सहवास न करने की सलाह दी गई.
एक दिन आशाजी जूही का स्पंज कर रही थीं तो संजना ने पूछा, ‘‘मम्मी, जूही की मालिश कब से शुरू होगी?’’
‘‘जब यह नाल अपनेआप टूट कर गिर जाएगी और सूख जाएगी न तब. तब तक तो इन का स्पंज ही होगा और बच्चे की मालिश के साथ मां के शरीर की मांसपेशियों को मजबूती देने के लिए मां की मालिश भी बहुत जरूरी होती है. मेरा तो सामान्य प्रसव था इसलिए 3 सप्ताह बाद शुरू हुई थी पर तुम्हरा तो सिजेरियन हुआ है न इसलिए कम से कम डेढ़ माह बाद करवाना ताकि टांकों वाली जगह पर कोई परेशानी न हो, अच्छा लो संभालो जूही को,’’ आशाजी ने बहुत प्यार से जूही को उस की गोद में रखा.
तभी कमलाजी और कार्तिक आ गए.
कुछ ही देर में संजना को ऐसा लगा कि जैसे उस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा. सब जूही के साथ ही व्यस्त हैं. पहले कैसे सब उस के आसपास ही मंडराते रहते थे और अब जैसे मैं किसी को दिख ही नहीं रही.
शाम को समीर घर आया तो आशाजी की गोद से ले कर जूही को पुचकारने लगा.
‘‘समीरजी, हम भी आप के सामने ही बैठे हैं, हमारा हालचाल भी पूछ लीजिए,’’ संजना ने जैसे ताना मारा.
‘‘अरे, रानी साहिबा के हालचाल तो ठीक ही हैं, सभी लोग सारा दिन उन का खूब खयाल करते होंगे, हमारी राजकुमारी बोर हो जाती होगी अकेली, थोड़ा सा खेल लें इस के साथ, क्यों जूहीजी, बोलो, बोलो…’’ समीर जूही के साथ ही खेलने लगा. संजना वहां से उठ कर चली गई.
लगभग 2 माह बाद समीर और संजना को एक पार्टी में जाना था. संजना ने सारी अलमारी ऊपरनीचे कर दी.
‘‘देखो न समीर, अपनी कोई भी ड्रैस मुझे फिट नहीं आ रही, कोई ड्रैस ऊपर से तंग हो गई है तो कोई कमर से नीचे नहीं उतर रही और मेरे बाल, पता है कितने झड़ने लगे हैं… पता नहीं क्या हो रहा है मेरे साथ?’’ संजना उदास स्वर में बोली.
‘‘संजू, अभी जूही को फीड करवाती हो न तुम इसलिए भी थोड़ा वजन ज्यादा है. कुछ वक्त बाद सही डाइट और ऐक्सरसाइज से तुम पहले जैसी हो जाओगी,’’ समीर ने बहुत प्यार से सम?ाया.
‘‘डाइट, ऐक्सरसाइज वक्त मिलेगा मुझे इस के लिए? नींद तक तो पूरी हो नहीं पाती मेरी ठीक से, सारा दिन जूही के साथ उल?ा रहती हूं. रात में भी जग जाए तो फीड करवाओ, डायपर बदलो, तुम ने भी भला कितने दिन मेरा साथ दिया?’’ संजना बुरी तरह से बिलख पड़ी.
‘‘संजू, ऐसा नहीं है मैं जितना हो सकता है रात को भी जूही की संभालता हूं. अच्छा आज रात तुम अच्छे से सोओ, मैं जूही के साथ आज दूसरे कमरे में सोता हूं.’’
‘‘उस से क्या होगा, जग जाएगी तो मेरे ही पास लाओगे?’’
समीर हैरानी से संजना को देखे जा रहा था.
‘‘नहीं जाना मुझे किसी पार्टी में, न पहनने को कपड़े और न ही अब मूड रहा,’’ रोती हुई संजना कमरे से तेज कदमों से बाहर निकली तो कोने की टेबल से टकरा गई. उस पर सजा फ्लौवर पौट नीचे गिर कर चकनाचूर हो गया.
‘‘उफ, यह क्या हुआ, यह मैं ने कितने प्यार से मनाली से लिया था. समीर, देखो न…’’ संजना ने रोना शुरू कर दिया.
समीर संजना को समझा नहीं पा रहा था. वह जमीन पर ही बैठ कर रोए जा
रही थी. समीर ने उसे बांहों में भर लिया. न जाने कितनी ही देर वह उस की बांहों में वैसे ही बैठी रही.
इस के बाद 3-4 दिन तो संजना बेहद अनमनी सी रही. तब समीर उसे डाक्टर रमनीक के पास ले गया.
रमनीकजी ने संजना से थोड़ी देर बात की और फिर नर्स के साथ उसे और जूही को बाहर भेज दिया.
बाहर एक कोने में रंगबिरंगे खिलौने रखे हुए थे. संजना जूही को उन्हें दिखाने लगी.
‘‘देखो समीर, संजना डिलिवरी के बाद डिप्रैशन के दौर से गुजर रही है. इस की कई वजहें हो सकती हैं- नींद की कमी, थकावट, असुरक्षा की भावना, बच्चे के सभी कार्य खुद करने में खुद को असफल पाना.’’
रमनीकजी ने तब कुछ दवाएं लिख दीं और समीर को संजना को अवसाद की स्थिति से निकालने के कुछ उपाय बताए.
आने वाले दिनों में समीर ने आशाजी और कमलाजी से इस बारे में बात की और
उन्हें संजना की हालत से अवगत कराया.
कमलाजी ने कुछ दिन संजना के पास रुकने का फैसला किया.
‘‘अरे संजू, देख जूही अभी सो रही है, तू भी ?ापकी ले ले और रात के खाने की चिंता मत कर, मैं बना लूंगी.’’
‘‘मम्मी, अभी जग जाएगी और मैं सोई रही तो आप को तंग करेगी.’’
‘‘बच्चे तो रोते ही हैं, तू क्या कम रोती थी. रोएगी तो मेरे पास बहल कर चुप भी हो जाएगी. घबरा मत तेरी बेटी को तकलीफ नहीं होने दूंगी.’’
कमलाजी की बात सुन कर संजना झेपती हुई हंस दी, ‘‘क्या मम्मी, आप भी…’’
ऐसे ही कुछ दिन बीते तो कमलाजी मार्केट जा रही थीं.
‘‘संजू, ला तेरे जो कपड़े नाप में ठीक कराने हैं, मुझे दे दे. मैं दर्जी को देती आऊंगी.’’
2 दिन बाद संजना ने अपना पसंदीदा सूट पहना तो खूब खुश हुई.
समीर उसे अपने साथ सुबह की सैर पर भी ले जाता था. धीरेधीरे संजना का व्यवहार पहले की अपेक्षा बेहतर होने लगा. लगभग 5 महीने बाद सुहानी उस से मिलने आई.
‘‘सहेलियां क्या ऐसी होती हैं, जूही से मिलने अब आई है, इतने महीने बाद?’’
‘‘काम के सिलसिले में शहर से बाहर थी यार और यह जूही तो बहुत ही प्यारी है. इसे देखने से तो दिल ही नहीं भर रहा है, ये इस के छोटे से दांत, देख तो कैसे मेरी उंगली मुंह में लेना चाह रही है.’’
‘‘हर चीज मुंह में लेना चाहती है, इस का टीथर देती हूं.’’
कुछ ही देर में जूही सो गई. संजना कौफी बना लाई तो दोनों सहेलियां सोफे पर बैठ कर आराम से बातें करने लगीं.
‘‘और सुना, अब कैसा लग रहा है मां बन कर?’’
‘‘समीर और बाकी सभी के साथ ने मेरा सफर आरामदायक बना दिया सुहानी. प्रैगनैंसी में और डिलिवरी के बाद तो मेरा आत्मविश्वास जैसे खो सा गया था. ऐसा महसूस होता था जैसे मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं है. शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से मैं टूट सी रही थी पर सभी के मार्गदर्शन और अपनेपन ने मु?ा में जैसे नई ताकत भर दी. एक नारी के जीवन में मां बनना कुदरत का सब से खूबसूरत परिवर्तन है जो नारी को एक नए रिश्ते में ढाल कर उसे एक नई दुनिया से परिचित कराता है जहां वह उलझाती भी है और सुलझाती भी है. बस शर्त है तो अपनों के साथ की, है न?’’
सुहानी मंत्रमुग्ध सी उसे देखे और सुने जा रही थी.
‘‘कौन कहेगा कि अभी तक मेरे साथ कालेज में पढ़ने वाली यह अल्हड़ सी लड़की आज ज्ञान का पिटारा खोल कर दादीमां बन जाएगी. धन्य हैं आप दादीमां,’’ सुहानी ने उस के आगे हाथ जोड़ने का उपक्रम किया तो उस की इस हरकत को देख कर संजना और सुहानी दोनों जोर से हंस पड़ी.
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