Family Story: ‘‘उफ, कितनी गरमी है. पता नहीं कब मेरा नंबर आएगा,’’ भावना सामान्य से अधिक गरमी महसूस कर रही थी. आज उसे हौस्पिटल में भीड़ भी अधिक नजर आ रही थी. वह रूमाल से पंखा झलने की कोशिश करने लगी ताकि चेहरे पर ताजा हवा फैले और वह राहत की सांस ले. लेकिन यह हवा उसे कहां आराम दिलाने वाली थी. वह अंदर से बेचैनी महसूस कर रही थी.
‘‘पानी पियोगी? कौन सा महीना है? तुम्हारे साथ कोई और नहीं दिख रहा?’’ अचानक कई सवाल उस के पास आए तो भावना ने गरदन घुमा कर देखा. एक करीब 55-60 वर्ष की महिला पास की सीट पर बैठी उस की तरफ पानी की बोतल बढ़ाए थी. भावना ने उसे आश्चर्य से देखा.
‘‘मैं ने पूछा पानी पियोगी?’’
उस महिला द्वारा पुन: पूछने पर भावना ने उस के हाथों से बोतल ले कर पानी की कुछ घूंट गले के नीचे उतारे और राहत की सांस लेते हुए पानी की बोतल वापस उस महिला की तरफ बढ़ा दी और कहा, ‘‘थैंक्स आंटी.’’
‘‘किस के साथ आई हो? पहला बच्चा है न?’’
‘फिर से सवाल,’ भावना मन ही मन झंझला उठी लेकिन जाहिर नहीं होने दिया. बस एक छोटा सा जवाब दिया, ‘‘हां.’’
‘‘मैं तुम्हारी उम्र से समझ गई थी कि यह तुम्हारा पहला बच्चा है. अभी तो कुछ महीने बाकी होंगे डिलिवरी में? हैं न?’’ बुजुर्ग महिला भावना के पेट के उभार को देखते हुए बोली.
‘‘क्या आंटी, थोड़ा पानी क्या पिला दिया आप तो मेरा प्रेजैंट, फ्यूचर सब जानने के लिए परेशान हो गईं,’’ भावना ने जवाब दिया पर अपना यह व्यवहार उसे स्वयं अच्छा नहीं लगा. अत: बोली, ‘‘सौरी आंटी, मुझे यों जवाब नहीं देना चाहिए था. लेकिन आप मुझे इरिटेट मत कीजिए प्लीज.’’
‘‘कोई बात नहीं बेटा, मैं तो हूं ही बड़बोली. सब से बात करने लगती हूं बिना किसी जानपहचान के.’’
‘‘कृष्णा आइए,’’ अपना नाम सुन कर वह महिला डाक्टर के कैबिन में चली गई. अपना चैकअप कराने के बाद कृष्णा कैबिन से बाहर आई.
अगला नंबर भावना का था. भावना कैबिन में गई. डाक्टर उसे कुछ भी कहने
से पहले उस के पेरैंट्स को बुलाना चाहती थी. भावना ने अपनी स्थिति बताई लेकिन डाक्टर कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी. अत: उसे अपने साथ कोई अभिभावक लाने के लिए कहा. कैबिन से निकल कर भावना बाहर कुरसी पर बैठ गई.
कृष्णा परची पर लिखी दवा ले कर नर्स के पास गई और खाने का रूटीन पूछने लगी. फिर निर्देशों को समझने के बाद बाहर जाने के लिए आगे बढ़ी कि अचानक उस के कदम रुक गई, ‘‘अरे राम्या, क्या हुआ? यह चोट कैसे लग गई?’’
‘‘कुछ नहीं दीदी… एक औटो वाले से टकरातेटकराते बची हूं. बचने के क्रम में साइड में गिर पड़ी तो बस हलकी सी खरोचें आ गईं. यहां फर्स्ट एड के लिए आई हूं.’’
‘‘चल जल्दी, पहले दवाई ले ले,’’ कहते हुए कृष्णा राम्या को कंपाउंडर के पास ले गई.
इधर भावना भी अस्पताल से निकलने के लिए कैबिन के पास से उठ कर मुख्य दरवाजे की तरफ बढ़ी. उस के कदमों की गति मंद और बो?िल थी. उस के मन में भाव उमड़ रहे थे कि अब वह क्या करे. वह कुंआरी ही गर्भवती हो गई थी. वह मन ही मन खुद को कोसने लगी कि कितनी बेवकूफ हूं मैं. उस के मन में शारीरिक भूख थी और मैं पगली उसे प्यार समझ बैठी. लोग सही कहते हैं, यह उम्र बहुत नाजुक होती है. थोड़ा भी लापरवाह बनो तो न जाने किधर बहक जाएं. मैं बुद्धू राह भटक गई और उस की रसीली बातों में आ गई.
शंका का गुबार समेटे भावना आगे बढ़ती जा रही थी कि तभी किसी की आवाज
आई, ‘‘भावना…’’
भावना ने पलट कर देखा तो राम्या आ
रही थी.
‘‘भावना तुम यहां? बात क्या है?’’ राम्या भावना के पेट का उभार देख कर बोली.
राम्या को अचानक सामने देख कर भावना झेंप गई. उसे अपने किए पर ग्लानि भी महसूस हो रही थी. वह कुछ भी बोलने में असहज महसूस कर रही थी. परिस्थितियों को भांपते हुए राम्या भावना और कृष्णा को पास के रैस्टोरैंट में चलने के लिए बोली. पहले तो वे दोनों तैयार नहीं होईं मगर बाद में राम्या के स्नेहिल हठ के आगे हार मान लेती हैं और फिर तीनों रैस्टोरैंट के फैमिली कैबिन में गा बैठीं.
राम्या ने खाने का और्डर दिया. कृष्णा और भावना एकदूसरे से पूर्वपरिचित नहीं थे मगर राम्या इन दोनों से ही परिचित थी. राम्या एक तलाकशुदा महिला थी, उम्र लगभग 40 वर्ष. वह मां नहीं बन सकती थी इस कारण उस का वैवाहिक जीवन खराब मोड़ पर आ गया था. पति दूसरी महिला की तरफ मुड़ चुके थे. ससुराल वाले भी अपने बेटे का पक्ष लेते. वह रोजरोज के झगड़े से ऊब चुकी थी. प्रताड़ना सहतेसहते उस का धैर्य भी खत्म हो गया था. थकहार कर उस ने अपने पति से तलाक ले लिया और फिर अपने जीवन को अकेले ही बेहतर ढंग से जीने की सोची. अब वह प्राइवेट जौब कर रही थी और किराए के मकान में अकेली रहती थी.
कृष्णा की उम्र का छठा दशक बीत रहा था. पति को गुजरे करीब 10 वर्ष हो गए चुके थे. पति के गुजरने के बाद वह अकेली हो गई थी. एक बेटा था जो विदेश में ही बस गया था. ऐसे में उस ने दुख और अकेलेपन का रोना रोने के बजाय जीवन को आनंदमय रखना उचित समझ. भावना नवयुवती थी जिस के मातापिता नहीं थे और वह अपने भैयाभाभी के साथ रहती थी.
‘‘मैं बेकार का सवाल पूछ कर तुम्हें आहत नहीं करना चाहती लेकिन बहुत समय बाद मिले हैं तो तुम्हारा हालचाल जानने की इच्छा हो रही है. मुझे अपनी बड़ी बहन समझ,’’ राम्या ने भावना के हाथ पर अपनी स्नेहिल हाथ रखते हुए कहा.
‘‘बिटिया… तुम्हें हौस्पिटल में परेशान सा देखा था. तुम्हें अपनी बात हमारे बीच साझ करनी चाहिए. यदि कोई समस्या हो तो बोलो. शायद बात करने से कोई समाधान निकल आए,’’ कृष्णा ने भी भावना को प्यार से समझया.
वेटर और्डर किए गए खाने को टेबल पर रख कर चला गया. भावना राम्या की तरफ एक सरसरी निगाह डाली और फिर तुरंत नजरें नीचे कर लीं. फिर एक गहरी सांस लेते हुए बोली, ‘‘मेरा 7वां महीना चल रहा है. मेरा प्रेमी मुझे धोखा दे कर भाग गया. भैयाभाभी ने मुझ से रिश्ता तोड़ लिया क्योंकि मेरा गर्भपात नहीं हो सकता था. मेरी जान को खतरा है. शुरू में मैं ने ध्यान नहीं दिया. प्रेमी ने शादी करने का आश्वासन दिया था, मगर अब मुझे छोड़ दिया. किसी तरह एक वूमन होस्टल में रहने का आश्रय मिला. डाक्टर का कहना है कि बच्चे की स्थिति थोड़ी ठीक नहीं लग रही है. हो सकता है कि समय से पहले सिजेरियन करना पड़े. ऐसे में वह बिना किसी अभिभावक को साथ रखे हाथ नहीं लगाना चाहते, रिस्क है. मैं अब इस बच्चे के साथ जीना चाहती हूं,’’ कहते हुए भावना सुबकने लगी तो थोड़ी देर के लिए सन्नाटा पसर गया.
‘‘चुप हो जाओ. अब तुम खुद को अकेली मत समझ. मैं तुम्हारा साथ दूंगी. तुम्हारी नादानी के कारण जो परिस्थितियां उभरी हैं उन के लिए तुम्हारा बौयफ्रैंड भी जिम्मेदार है. अब वर्तमान और भविष्य को संवारो,’’ राम्या ने भावना को धैर्य बंधाया.
‘‘यह ठीक कह रही है बेटी. तुम्हारे लिए हम अभिभावक बनेंगे,’’ कृष्णा ने?भी भावना को तसल्ली दी.
राम्या ने भावना की स्थिति को देखते हुए अपने साथ रहने को कहा लेकिन भावना ने मना कर दिया.
‘‘किसी भी चीज की जरूरत हो तो बेहिचक कहना,’’ दोनों ने भावना को आश्वस्त किया कि अब वह अकेली नहीं है.
भावना का 8वां महीना शुरू हो गया. डाक्टर ने गर्भ की स्थिति देखते हुए
तुरंत सिजेरियन करने की सलाह दी. ऐसे में कृष्णा ने फौर्म पर गार्जियन के रूप में हस्ताक्षर किए, वहीं राम्या अन्य व्यवस्थाओं को पूरा करने में व्यस्त रही. भावना ने बच्चे को जन्म दिया लेकिन वह बहुत कमजोर था. ऐसे में अभी पूरी तरह उसे डाक्टर की निगरानी में रखना था.
देखतेदेखते 10-12 दिन गुजर गए. डाक्टर ने मां और बच्चे को अस्पताल से छुट्टी दे दी. राम्या उसे अपने घर ले आई. 2-3 दिन तो सब ठीक रहा लेकिन धीरेधीरे पासपड़ोस में कानाफूसी होने लगी. महल्ले वाले राम्या को पहले ही हेय दृष्टि से देखते थे लेकिन अब भावना को साथ रखने के बाद लोग नाराजगी भी जाहिर करने लगे. भावना कुंआरी मां थी और राम्या तलाकशुदा अकेली औरत.
‘‘मैं कहती थी न… यह एकदम गिरी हुई औरत है. देखो इस की संगति… लड़की बिन ब्याही मां है. इज्जत नाम की चीज तो है ही नहीं इन के पास.’’
‘‘देखते जाओ… अब तो धीरेधीरे पूरा महल्ला दूषित होगा.’’
‘‘ऐसे कैसे दूषित होगा? हम क्या हाथ पर हाथ धर कर बैठने के
लिए हैं? बात करेंगे इन
के मकानमालिक से. जल्दी हटाना होगा इस गंदगी को.’’
अब आएदिन राम्या को महल्ले वालों के तानों और गुस्से से गुजरना पड़ रहा था. शुरू में तो वह बेबाकी से जवाब देती मगर अब उस के मकानमालिक ने भी जल्द से जल्द मकान खाली करने का आदेश दे दिया.
एक शाम कृष्णा राम्या के घर बैठी थी.
उस की बातें सुन कर बोलीं, ‘‘हमारा समाज
अकेली महिला को जीने कहां देता है. यदि वह संघर्ष करते हुए सिर उठा कर जीने की कोशिश करती है तो उस के सिर को झकाने या कुचलने का हर संभव प्रयास किया जाता है.’’
‘‘सही बात बोल रही हैं दीदी. देखिए न, मेरा पति तो मजे से अपनी लाइफ जी रहा है लेकिन मुझे क्या कुछ नहीं झेलना पड़ रहा है. इस भावना को देखो गलती तो उसे लड़के ने भी की लेकिन सारी तकलीफ यह झेल रही है,’’ कहते हुए राम्या का चेहरा मायूस हो गया.
‘‘यह समाज पुरुषों की तो हजार गलतियां माफ कर देता है लेकिन स्त्री की एक गलती उस के साथ जीवनपर्यंत चलती रहती है. लोग कहते हैं कि स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है लेकिन एक स्त्री हो कर तुम भावना की मदद कर रही हो तो समाज विरोध कर रहा है.’’
कुछ देर तक दोनों चुप रहीं. तभी भावना बच्चे को सुला कर कमरे से बाहर आई और एक तरफ बैठने के बाद बोली, ‘‘आप दोनों को मेरी वजह से परेशानी हो रही है. मेरे किए की सजा आप लोग क्यों भुगतेंगी? मैं यहां से चली जाती हूं?’’
यह सुन कर कृष्ण बोली, ‘‘खबरदार जो फिर ऐसा कहा. परेशानी से तो हमारा नाता ही रहा है. मेरे पति के गुजरने के बाद मेरा बेटा मुझे यहां अकेले छोड़ गया. खोजखबर लेने भी नहीं आता. इंतजार कर रहा है कि कब बुढि़या मरे तो प्रौपर्टी बेच कर विदेश में ही अपना बंगला खरीद लूं.’’
‘‘मैं ने भी खुशियों की बगिया कहां देखी है? इस उम्र में अकेले लोगों की सवाल करती नजरों और दिल भेदते तानों के साथ जी रही हूं,’’ राम्या ने भी अपनी बात कही.
तीनों बैठी सोचविचार कर रही थीं कि क्या किया जाए. तभी कृष्णा बोली, ‘‘राम्या,
इस मकान को खाली कर दो और तुम दोनों चलो मेरे घर. अब हम तीनों वहां एकसाथ रहेंगे.’’
‘‘लेकिन दीदी…’’ राम्या असमंजस के भाव में इतना ही बोल पाई.
‘‘ज्यादा सोचविचार मत करो. हम तीनों अलगअलग अकेले क्यों जीएं? क्यों न हम एकसाथ एक परिवार के रूप में रहें. आज से हम एक परिवार के अंग हो गए. चलो मेरे घर.’’
राम्या और भावना के पास फिलहाल कृष्णा की बात मानने के सिवा दूसरा कोई उपाय नहीं था. दोनों कृष्णा के घर शिफ्ट हो गईं. अब कृष्णा का घर भराभरा सा लगने लगा. उस के एकांत जीवन में राम्या, भावना के साथ एक नन्हे बच्चे की किलकारियां कुछ अलग ही एहसास बिखेरने लगी थीं.
कामवाली आई तो उस ने समझ कि मेहमान आए हैं.
कृष्णा ने कहा, ‘‘कुंती, आज से तुम्हारा काम बढ़ गया है. अब ये दोनों यही रहेंगी और हां… घर की साफसफाई में विशेष ध्यान देना. छोटा बच्चा है, कोई दिक्कत न हो.’’
धीरेधीरे तीनों वहां सैट हो गईं. कुंती भी उन
दोनों के साथ काफी घुलमिल गई. भावना के बच्चे से उसे भी लगाव हो गया.
एक दिन बच्चे को गोद में रख कर उस की मालिश करते हुए कुंती कृष्णा से बोली, ‘‘दीदी, अगर बुरा न मानो तो एक बात बोलूं?’’
‘‘क्या? बोल.’’
‘‘भावना दीदी इस बच्चे को बिना पिता के सारी जिंदगी संभाल पाएंगी?’’
‘‘तू ऐसा क्यों पूछ रही है?’’
‘‘बस… मेरे मन में यह बात आई. मैं कहती हूं कि बिना पुरुष के क्या स्त्री के जीवन के कोई माने हैं? अकेले तो वह बेसहारा लावारिस जैसी ही हुई न?’’
‘‘यही तो हम महिलाओं को सिखाया जाता है कि पुरुष की छत्रछाया के बिना उस का जीवन कुछ भी नहीं. लेकिन तू ही बता, जब स्थिति विकट हो जाए तो अकेले जीना गलत है क्या? स्त्री का जीवन सिर्फ जिम्मेदारी उठाने और कष्ट झेलने के लिए होता है क्या? तू अपनी देख न, घरों में काम कर के अपना और परिवार का खर्च चल रही है. तेरा मर्द कुछ करता नहीं उलटे तेरी ही कमाई चुरा कर शराब पीता है और तुझ से मारपीट करता है. अब बोल, तू उस का सहारा है कि वह तेरा?’’ कृष्णा बोली.
कुंती ने चुपचाप सिर झका लिया.
‘‘अरे… स्त्रीपुरुष दोनों एकदूसरे के लिए जरूरी होते हैं लेकिन कुछ पुरुष स्त्रियों के मानसम्मान आदि रौंद कर अपनी मर्दानगी दिखाने में ही विश्वास रखते हैं. वैसे लोगों को यह बताना जरूरी है कि स्त्री यदि चाहे तो अकेले भी जीवन जी सकती है. सीता ने भी तो अकेले ही लवकुश को पाला और संघर्ष किया था न?’’
‘‘दीदी आप ने सही कहा. हम स्त्रियां भी अपनी जिंदगी जीएं यही होना चाहिए. स्त्री जिस मकान को घर बनाती है उस में उसे कितना महत्त्व मिलता है? मायके में पराए घर जाने वाली होती है और ससुराल में दूसरे घर से आई पराए व्यक्ति के रूप में देखा जाता है. ऊपर से कुछ तो अपनी सुविधानुसार पत्नी बदलने का औप्शन भी रखते हैं,’’ राम्या ने कृष्णा की बात से सहमति जताते हुए कहा और फिर अपने दुख को भी याद करने लगी.
‘‘कुंती, जरा चाय बना कर लाना. राम्या, अब छोड़ो ये सब बातें, कुछ नमकीन ले आओ चाय के साथ लेने के लिए,’’ राम्या को उस की दुखद याद से बाहर लाने के लिए कृष्णा बोली.
तीनों परिवार जीवन जी रही थीं. हंसीठिठोली करने के साथ एकदूसरे के सुखदुख में भी सहभागी थीं. कुंती का भी अब धीरेधीरे सब के बीच मन रमने लगा. उसे लगता उसे कुछ सखियां मिल गईं. भावना का बच्चा तो सब के मनोरंजन का प्रमुख साधन था. उस के सामने रहते मजाल है जो कोई अपने दुख को याद करे?
जीवन इतना आसान भी तो नहीं होता. अब शायद फिर से उन के जीवन के
ऊबड़खाबड़ रास्ते की शुरुआत होने वाली थी जिस पर उन्हें चलना था. अचानक एक दिन कृष्णा का बेटा अनूप घर आया. बेटे को अचानक आया देख कर कृष्णा की ममतामयी आंखें छलछला उठीं. दिल में नवांकुर फूटने लगे. उल्लास कुछ ऐसा था मानो बेटे ने अभीअभी उस के गर्भ से जन्म लिया हो.
‘‘अनूप… तुझे मां का प्यार खींच ही लाया न? आ बेटा, चल अंदर,’’ कृष्णा भीगती आंखों और लड़खड़ाती जबान से इतना ही बोल पाई.
अनूप घर के अंदर जा कर सीधे सोफे पर बैठ गया. कृष्णा तेजी से रसोई की तरफ बढ़ी और डब्बों में मठरी ढूंढ़ने लगी. उसे मालूम था कि अनूप को मठरियां बहुत पसंद हैं.
‘‘यह कुंती भी न, बोली थी कि थोड़ी मठरियां बना दे लेकिन आजकल पर टालती रही. शायद बेटे का आभास ने ही मेरी जबान से कहलवाया हो मठरी बनाने के लिए,’’ कृष्णा बड़बड़ा रही थी.
एक प्लेट में कुछ नमकीन और मिठाई रख कर कृष्णा बेटे के लिए ले आई, ‘‘ले बेटा, कुछ खा कर पानी पी ले फिर खाना लगाती हूं.’’
बेटे के लिए कृष्णा के पास खुशी दिखाने के लिए शायद शब्द न थे. वह सोच रही थी कि अब उस का बनवास खत्म हो गया है. शायद बेटा यहीं रहने की बात करे या उसे अपने साथ विदेश ले जाए. तब तक भावना भी कमरे से बाहर हौल में आ गई.
उसे देखते ही अनूप बोला, ‘‘यही है न जो इस घर पर कब्जा जमाए बैठी है तुम्हारी सारी प्रौपर्टी हथियाने के लिए?’’
अनूप की बात सुन कर कृष्णा को झटका लगा. वह समझ नहीं पा रही थी कि बेटे को समझए या डांटे.
तभी अनूप फिर से बोल पड़ा, ‘‘देखो मां, बहुत हो गया ड्रामा. अब पिताजी जो भी प्रौपर्टी छोड़ गए हैं वह सब मुझे दे दो.’’
‘‘सब तेरा ही है बेटा. लेकिन मेरा क्या? मैं तुम्हारी नहीं? कभी यह भी बोल देता कि मां तुम पर मेरा पूरा अधिकार है और मैं तुम्हें अपने पास रखूंगा,’’ इस बार कृष्णा की आंखें दुख से छलछला उठीं.
‘‘तुम्हें पता है न, मैं ने विदेशी लड़की से शादी की है और मुझे वहां की नागरिकता भी मिल गई है तो मैं यहां आने से रहा. तुम्हें वहां नहीं ले जा सकता, सेजल नाराज हो जाएगी. ऊपर से वहां के माहौल में तुम सैट नहीं कर पाओगी.’’
‘‘बेटा, एक मां को औलाद का प्यार ही सब जगह सैट कर देता है,’’ कृष्णा ने अपने आंसू पोछते हुए कहा, ‘‘खैर, यह अचानक तुझे प्रौपर्टी कैसे याद आ गई?’’
‘‘तुम्हें क्या लगता है मुझे कुछ नहीं पता? तुम्हारी हर खबर मेरे पास पहुंचती है. मैं भले ही विदेश रहता हूं लेकिन मेरे कुछ शुभचिंतक हैं यहां,’’ अनूप खुद को होशियार दिखाते हुए बोला.
भावना कुछ बोलना चाह रही थी. उस की आंखों से महसूस हो रहा था कि अनूप की बातें उसे बुरी लग रही हैं मानो वह सोच रही हो कि मांबेटे के फसाद की जड़ वही है. लेकिन कृष्णा ने इशारे से उसे कुछ न बोलने की हिदायत दे दी.
‘‘वाह बेटा, तू सच में बहुत होशियार है. मुझ पर नजर रख रहा था. शायद तेरे मन में यही होगा कि कब यह बुढि़या टपके कि सारी प्रौपर्टी समेट लूं. शायद तेरी यह दुर्भावना तेरे पिता पहले ही समझ चुके थे इसीलिए सबकुछ मेरे नाम कर गए. अरे मूर्ख, मातापिता सबकुछ अपनी औलाद के लिए ही करते हैं. बदले में उम्मीद करते हैं कि वह बुढ़ापे का सहारा बनेगी. लेकिन तुम…’’
कृष्णा दुख और क्रोध के सागर में डूब गई. अनूप 2 दिन बाद आने की कह कर चला गया, साथ में बोल गया कि प्रौपर्टी के पेपर बनवा कर लाऊंगा. तुम्हें सारी प्रौपर्टी मेरे नाम करनी होगी.
आज का दिन काफी उथलपुथल भरा बन गया था. अनूप के जाने के बाद भावना कृष्णा के नजदीक आ कर बोली, ‘‘आंटी, मेरे कारण आप को भी कष्ट होने लगा. मैं…’’
‘‘चुप पगली, मेरा बेटा तो पहले से ही ऐसा है. मैं बुढि़या नाहक उस से उम्मीद लगा बैठी. तुम लोग अब मेरे साथ रहोगी मेरा परिवार बन कर, हमेशा,’’ कह कर कृष्णा सोफे पर बैठ गई.
शाम का समय था. राम्या भी औफिस से आ चुकी थी. कुंती भी आ कर रसोई में
बरतन करने लग गई थी. भावना से राम्या को सारी बातें मालूम हो गईं, ‘‘दीदी… अनूप आया था? आप अपनी प्रौपर्टी में से कुछ उसे दे दीजिए. आखिर वह बेटा है आप का,’’ राम्या ने कृष्णा
को समझया.
‘‘सारी दे दूं लेकिन वह भी मुझे समझे. मेरे प्रति अपनी जिम्मेदारियां समझे. नहीं, मैं उसे सबक जरूर सिखाऊंगी. हम ने उसे पढ़ालिखा कर कमाने लायक बनाया. उसे पढ़ाने में तो गांव के खेत बिक गए. लेदे कर 2 मकान हैं. एक मकान में मेरे पति के नाम से स्कूल चलता है और एक यह घर. उस स्कूल वाले मकान को मैं गरीब बच्चों के लिए दान कर दूंगी ताकि जरूरमंद बच्चे अच्छे से पढ़ सकें. कम से कम पति का नाम मेरे जाने के बाद भी तो बचा रहेगा.’’
‘‘और यह घर?’’ राम्या हलकी आवाज
में बोली.
‘‘यह घर हम तीनों का आश्रय है. हम तीनों तनहा बेसहारा इस छत के नीचे परिवार बन गए. वकील को बुलाओ और एक कारपैंटर को भी,’’ कृष्णा कुछ सोचते हुए राम्या से बोली.
राम्या, एक वकील को बुलाया. कृष्णा ने उसे अपनी सारी बात बताई. जरूरी पेपर तैयार कर के अगले दिन आने का कह कर वकील
चला गया. कारपैंटर को भी कृष्णा ने जरूरी निर्देश दे दिए.
वकील पेपर तैयार कर के लाया जिन पर कृष्णा ने अपने हस्ताक्षर कर दिए.
पेपर के अनुसार स्कूल वाला मकान कृष्णा की मृत्यु के बाद गरीब बच्चों की पढ़ाई के लिए दान कर दिया जाए तथा अपने रहने वाले घर में भावना और राम्या को नौमिनी बना दिया. यही नहीं, अपनी बाकी जिंदगी तथा मृत्यु के बाद से जुड़े सभी कर्तव्यों के लिए इन्हीं दोनों का नाम दिया. वकील पेपर की एक कौपी कृष्णा को दे कर चला गया.
‘‘आंटी आप ने तो हमें वे सारे अधिकार दे दिए जो परिवार के किसी सदस्य के ही पास होती हैं,’’ भावना कहते हुए कृष्णा के पैरों के पास बैठ गई. राम्या भी वहीं पास में बैठ गई.
‘‘अब तुम दोनों मेरा परिवार हो. बेटे को क्यों दूं? वह विदेश में रह कर अच्छाखासा कमाता है. अब वह खुद बनाए प्रौपर्टी. विदेश
क्या गया हमारे संस्कारों को छोड़ दिया. मैं ने लिख दिया है कि मरने के बाद मेरा क्रियाकर्म तुम लोग करना.’’
कृष्णा बोल रही थी कि तभी कारपैंटर आ गया. थैले से सामान निकाल कर दिखाया जो सच में बहुत सुंदर था. कृष्णा ने उसे मुख्यद्वार के बाहर लगाने का निर्देश दिया.
‘‘लेकिन इस की क्या जरूरत थी दीदी?’’
‘‘जरूरत थी राम्या. अनूप ने कहा न उस
के पास हमारी हर खबर पहुंचती है. मैं भी समझती हूं कि वह खबर पहुंचाने वाले महल्ले के कौन से लोग हैं. इसे लगाने के बाद अनूप जान जाएगा कि यह घर किस का है,’’ कृष्णा न कह कर कारपैंटर को वह डिजाइन सही से लगाने का निर्देश दे दिया.
उस खूबसूरत सी डिजाइन में बड़े अक्षरों में लिखा था ‘त्रिकांता हाउस.’
आज से इन तीनों महिलाओं ने पूरा जीवन एकसाथ जीने के लिए एकदूसरे का हाथ थाम लिया.
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