Hindi Short Story: महेश कुमारजी को अपनी पत्नी के देहांत के बाद अपने बेटे बासु के साथ शहर आना पड़ा, क्योंकि पत्नी के जाने के बाद वे एकदम अकेले हो गए थे.

अब बेटा ही था, जिस के साथ वो रह सकते थे, और उन की इस उम्र में सही से देखभाल हो सकती थी. उन के बेटे ने शहर आ कर महेशजी को उन का कमरा और बालकनी दिखाई और कहा, “पापा, आप कुछ समय यहां बालकनी में सुकून के साथ बैठ सकते हैं, अखबार पढ़ सकते हैं, आप का मन लगा रहेगा. और देखो पापा, मन तो आप को लगाना ही पड़ेगा.”

महेशजी भी अपना मन लगाने की पूरी कोशिश करते, लेकिन बुढ़ापे का एकाकीपन उन्हें खाए जाता था. आसपास कोई बोलने वाला भी नहीं था. बेटा और बहू अपने काम में लगे रहते, कभीकभार पोते के साथ मन बहला लिया करते,
लेकिन वह भी अकसर स्कूल की पढ़ाई में लगा रहता था.

महेशजी की बालकनी के सामने वाले फ्लैट में भी शायद कोई नहीं रहता था, क्योंकि अकसर वो बंद ही रहती.

कुछ समय बाद उन के सामने वाली बालकनी में कोई रहने आ गया. उस में एक सभ्य व संभ्रांत महिला दिखाई दी, जो लगभग उन्हीं की उम्र की थी.

उन संभ्रांत महिला ने अपनी कामवाली को कुछ समझाया, कुछ पौधे लगवाए, कपड़ों के सुखाने के लिए रस्सी बधंवाई और एक आरामकुरसी और एक छोटा सी मेज लगवा दी. इस तरह वो वीरान सी दिखने वाली बालकनी अब सजीव हो उठी. किसी के होने का एहसास देने लगी.

महेशजी और उन संभ्रांत महिला का आपस में गरदन के इशारे से अभिवादन हुआ, क्योंकि दोनों बालकनी में दूरी ज्यादा थी, इसलिए इशारे से ही बातें हो सकती थीं, और यों भी तेज बोल कर बातें यहां शहरों में कहां हो पाती हैं. यहां तो हर इनसान अपनेआप में मगन है, आसपास की किसी को कोई खबर ही नहीं है.

अब तो महेशजी को अपनी बालकनी अच्छी लगने लगी. वे अब आराम से बैठ कर अखबार पढ़ते.

सामने वाली बालकनी में छाई हुई वीरानी अब वसंत का रूप ले चुकी थी, तुलसी का पौधा उन की आस्था को दर्शाता तो मनी प्लांट की बेल व छोटे फूलों के पौधे जिंदगी की सजीवता को दिखाते.

वैसे भी स्त्रियों को वरदान मिला है कि वे चाहे जहां घर बसा सकती हैं, उसे स्वर्ग का द्वार बना सकती हैं, वसंत ला सकती हैं, वीरानियां को बदल कर बगिया खिला सकती हैं. स्त्रियां घर के आसपास एक सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण करती हैं.

बस इस तरह उन दोनों का रोज आंखों से व गरदन के इशारे से आपस में अभिवादन होने लगा. संवाद कभी न होता. महेशजी अब फिर से जिंदगी को जीने लगे थे.

वे उन महिला को कभी वहां सब्जी साफ करते देखते, कभी पौधों में पानी देते हुए देखते, कभी अचार सुखाते, तो कभी स्वेटर बुनते, दोनों का आपस में कभी संवाद नहीं होता. बस एक एहसास होता है कि उन के आसपास भी कोई है…

उन महिला की एक प्यारी सी पोती भी थी, जिस से वो कभीकभी इशारों में ही महेशजी को नमस्ते करवाती, जिस से उन्हें और अपनापन महसूस होता.

बस इस तरह दोनों में एक प्यारा सा “अनकहा रिश्ता” बन गया.

यों ही कई महीने गुजर गए. एक दिन महेशजी ने देखा कि उन महिला ने न ही उस दिन दीप जलाया और न ही पौधौ को पानी दिया. बस, आ कर आरामकुरसी पर ऐसे ही बैठ गईं. महेशजी को लगा कि शायद तबीयत खराब है. उन्होंने इशारों से पूछा, “क्या हुआ…?”

उन्होंने भी इशारे से जवाब दिया, “सब ठीक है”, लेकिन दोचार दिन में उन महिला का बालकनी में आना भी कम होता गया.

कुछ दिन पश्चात, अब कई दिनों से वे महिला महेशजी को दिखाई नहीं दे रही थी, उन्हें लगा कि शायद कहीं बाहर गई होंगी, लेकिन जब कई दिन हुए वे नहीं दिखाई दी और उन के लगाए पौधे सूखने लगे, उन की लगाई मनीप्लांट की बेल सूखने लगी, तो वे चिंतित हो उठे, उन का मन बेचैन हो उठा.

लेकिन पूछें तो किस से पूछें? महेशजी को बहुत चिंता हुई, उन का अब मन किसी भी काम में नहीं लगता.

फिर एक दिन वही कामवाली बालकनी में दिखाई दी, जो पहले दिन उन महिला के साथ आई थी. वह आई और बालकनी की सफाई करने लगी. महेशजी से रहा नहीं गया, तो उन्होंने इशारे से पूछा कि, “वे कहां हैं?”

उस ने भी इशारों से हाथ ऊपर कर के जवाब दिया कि, “वे अब नहीं रहीं.”

महेशजी का दिल धक से रह गया. उन्होंने उस अकेली पड़ी आरामकुरसी की तरफ देखा और फिर एक बार वो अपनेआप को अकेला महसूस करने लगे.
उन का वो प्यारा सा “अनकहा रिश्ता” अनकहा ही रह गया…

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