Family Drama : ‘‘अरे इधर आओ. यह देखो. हमारी बहू शिवि ने यह क्या किया. वह हमारे खिलाफ कोर्ट चली गई है. यह देखो. देख रही हो यह फाइल. हमें अपराधी बना दिया कल की लड़की ने. बोलो न, ऐसा कौन करता है?’’ कह कर मधु के पति अपने वकील को फोन लगा कर उन्हें सब विस्तार से बताने लगे.

मधु पति की बात सुन कर चुपचाप कुरसी पर बैठ गई. यह तो होना ही था. मधु भी इस के लिए कम जिम्मेदार नहीं थी. उस के पति अपने वकील को सफाई दे कर अपना पक्ष बता रहा थे. मगर इस से कोई मजबूत और दमदार दलील बन सकेगी, मधु को भरोसा न था. मधु का परिवार अपराधी था, यह बात खुले मौसम में पूनम के चांद की तरह साफ थी. शिवि तो छत्ते से टपकते शहद सी पवित्र और सच्ची थी. गलती तो मधु से हुई. इसी समय अपने अपराधीरूप की कल्पना करती हुई मन ही मन मलाल करती हुई वह जड़ हो गई. केवल परदा हिला. हवा मधु के कानों में फुसफुसाई और बोलो अहंकारी मां. मधु को अचानक सिहरन सी हुई.

अब मधु को बहू के साथ बिताए पिछले 20 महीने याद आने लगे. विवाह के दिन कितना जश्न हुआ था. मधु ने सीधे सरल घर की सामान्य कदकाठी की शिवि को सोने, चांदी, हीरे, मोतियों से लाद दिया था. इतना सोना शिवि ने जीवन में अपने सामने और अपनी देह पर कभी न देखा. शिवि को गलती से भी इस का सपना तक न हुआ था. किराए के घर पर रहकर कालेज की पढ़ाई पूरी करने वाली, फिर एक निजी स्कूल की टीचर बन कर सामान्य सी जिंदगी जीने वाली शिवि को ससुराल की शान देख कर  झटका लगा था. लेकिन तब भी वह संयत थी, सरल थी.

अपने पति ओज के लिए वह बस एक देह भर थी. अत: विवाह का दूसरा ही दिन उस के लिए कष्टकारी था, जबकि उस के पहले लंबाचौड़ा ओज उसे कितना प्रभावशाली लगा था. उसे एक महीना पहले का वह दिन भुलाए नहीं भूलता. उस दिन रोका हुआ था. शिवि की कालोनी में चर्चा ही चर्चा थी. इतना सुदर्शन, ऐसी हीरो जैसी कदकाठी वाला दूल्हा. वाह रे शिवि के तो दिन बदल गए.

शिवि भी मन ही मन खुशी से  झूम उठी थी. सब से अच्छी बात यह थी कि उस की होने वाली सास खुद आगे बढ़ कर यह रिश्ता ले कर आई थी. शिवि को उस के स्कूल के सालाना जलसे में देखा था. मधु अपनी सहेली के पोते का नृत्य देखने आई थी वहां. शिवि नामक अध्यापिका बगैर किसी ठसक के चुपचाप काम कर रही थी. नर्सरी के बच्चों को संभाल रही थी. कितनी भोली हंसी थी उस की, कितनी प्यारी. मधु की निगाह जलसे पर कम रही. मंच की तरफ तो मधु देख ही नहीं रही थी. उस की नजर बारबार शिवि को ही खोजती, उसी पर टिकी रहती.

मधु को वह बेहद भा गई थी. वह 2 दिन बाद ही पता पूछ कर उन के घर आ गई. प्लास्टिक की चेयर पर खुशी से बैठ कर विवाह की बात करने लगी. शिवि भी आनंदित थी. उसे कोई दिक्कत नहीं थी.

‘‘मेरा बेटा ओज अभी 26 का है. बस कामकाज देखता है,’’ कह कर वह फोटो रख कर चली गई.

शिवि ने एक नजर देखा. सहमति दे दी. फिर तो देर करने का सवाल ही कहां था. रोका और विवाह के बीच 28 दिन का अंतराल रहा. शिवि ने मगन हो कर तैयारी की थी.

काश, उस ने विवाह ही न किया होता. बस, दूर से देखा होता. अब हर पल, हर क्षण शिवि के विचार बदलने लगे. मन बदलने लगा. लेकिन तब भी उस ने अपनी भाषा और बोली को संतुलित रखा. मधु को मां ही माना. अपमानजनक भाव तक चेहरे पर न लाई.

उस के बाद पहले 3 महीने शिवि एकदम खामोश हो कर ओज की जिद तथा गलत आदतें सहन करती रही. उस के बाद वह बारबार कहती थी, ‘‘मां, ओज को नशा करने की आदत है. वे बिना कारण ही बातबात पर चीखने लगते हैं. अपनी कमाई कुछ भी नहीं है.’’

शिवि की आंखों में आंसुओं के साथसाथ हैरानी भी भर आती. इस पर मधु टाल देती. कहती कि 2 दुकानें हैं. उन से एक लाख किराया आ तो रहा है. एक लंबी और एक छोटी बस भी चल रही है. उन से भी हर महीने अस्सी हजार रुपए आ रहे हैं. इसलिए शिवि तुम हौलेहौले मेरे ओज को अपने प्यार से सुधार दो न. और किसी तरह की चिंता न करो. सब दौलत तुम्हें ही मिलनी है. तुम तो मनपसंद पकाओ, खाओ और आनंद करो. ‘‘तुम तो जिस दिन बहूरानी बनी उसी दिन करोड़पति हो गई थी.’’

मगर शिवि के पल्ले कुछ नहीं पड़ा. यह फोकट में अमीर बनने की बात उस को सम झ नहीं आई.25 साल की शिवि को चाहे अब मजदूरी ही कर के पेट भरना पसंद था लेकिन ऐसे बिगड़ैल ओज के साथ अब एक दिन भी रहना गवारा न था. खैर, मजदूरी किसलिए. उस के उसी स्कूल में उस के लिए आज भी जगह थी. हैडमास्टर ने उसे विश्वास दिया कि वह जब चाहे स्कूल आ कर अध्यापिका की नौकरी आरंभ कर सकती है.

शिवि ने सासससुर को कितनी ही बार राय दी, ‘‘ओज की आंखों में तरक्की करने का कोई सपना तक नहीं, उलटा शिवि के भविष्य के सपने चकनाचूर हो रहे. आप से गुहार लगा कर कहती हूं कि ओज को किसी मनोवैज्ञानिक को दिखाना चाहिए. इन का इलाज कराना चाहिए. 26 साल के हट्टेकट्टे नौजवान. मगर कोई काम ही नहीं करते. यह तो ठीक नहीं.’’

मगर शिवि की बात तो जैसे नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित हुई. शिवि की चीत्कार किसी ने न सुनी. उस की भरी हुई आंखें, उस का उदास चेहरा कौन पढ़ता? किस को पड़ी थी. आखिरकार डेढ़ साल तक सहन करने के बाद वह अदालत तक पहुंच ही गई. अब तो वहीं फैसला होगा.

आज मधु को बहुत मलाल हो रहा था. इतनी सम झदार बहू मिली थी. चांदी का जूता खाने वाली नहीं खुद्दार शिवि मिली थी. खुद पर खुद ही लात मारी. मधु को अपनी नासम झी का पूरा अहसास हो रहा था. काश, समय पर उस की बात मान ली होती तो आज हालात ही कुछ और होते.

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