वैशिकीकी आज विदाई थी. बड़ी धूमधाम से बेटी की हर छोटीबड़ी ख्वाहिश का ध्यान रखते हुए वैशिकी के मम्मीपापा बेटी की विदाई की तैयारी कर रहे थे. पूरे रीतिरिवाजों के साथ वैशिकी अपने मायके से विदा हो गई.
आज ससुराल में वैशिकी का पहला दिन था. चारों तरफ धूम मची हुई थी. सभी लोग खुश दिखाई दे रहे थे. चारों तरफ गहमागहमी का माहौल था.
वैशिकी अपनी जेठानी, ननदों, चाची इत्यादि की हंसीठिठोली के बीच लाल पड़ रही थी. जैसे ही वंशूक कमरे में आया, पल्लवी चाची उस का कान खींचते हुए बोलीं, ‘‘शैतान कहीं का, रुका नहीं जा रहा तु झ से… पूरी उम्रभर का साथ है तुम दोनों का… अभी तो थोड़ा सब्र करो.’’
वैशिकी ने देखा सब लोग हंसीठिठोली कर रहे थे परंतु वंशूक की मां यानी वैशिकी की सास रश्मि के चेहरे पर एक निर्लिप्त भाव थे. महंगे कपड़े और गहनों से लदीफदी होने के बावजूद वह बेहद अजीब सी लग रही थी. वैशिकी और वंशूक का आलीशान रिसैप्शन हुआ था. कुंदन के सैट और मोतिया रंग के जड़ाऊ काम के लहंगे में वैशिकी जितनी खूबसूरत लग रही थी और वहीं क्रीम रंग की शेरवानी में लाल दुपट्टे के साथ वंशूक भी बहुत सौम्य और प्यारा लग रहा था.
अगले दिन दोपहर तक पूरा घर खाली हो गया. सभी रिश्तेदार वापस जा चुके थे. अब घर में बस रह गए वंशूक की बड़ी बहन सुजाता और वंशूक के पापा अमित तथा मां रश्मि. अगले दिन वैशिकी को पगफेरे के लिए जाना था. वह साड़ी का चुनाव कर रही थी कि तभी उसे लगा कि क्यों न सास से पूछ ले, फिर हाथों में साड़ी ले कर वह रश्मि के पास चली गई. बोली, ‘‘मम्मीजी, यह बताइए पीली और नारंगी में से कौन सी साड़ी पहनूं कल?’’
रश्मि बोली, ‘‘बेटा, जो अच्छी लगे उसे पहन लो… वैसे यह नारंगी रंग तुम पर खूब फबेगा.’’
तभी अमित ठहाके मारते हुए बोले, ‘‘रही न तुम गंवार की गंवार… यह चुभता हुआ रंग सर्दियों में अच्छा लगता है न कि मई के महीने में.’’
रश्मि एकदम चुप हो गई तो अमित फिर बोले, ‘‘वैशिकी बेटा, तुम अपनी सुजाता दीदी से पूछ लो.’’
वैशिकी को अपने ससुर का अपनी सास के प्रति व्यवहार बहुत अजीब सा लगा, साथ ही साथ उस के मन में यह डर भी समा गया कि क्या होगा अगर वंशूक का व्यवहार भी ऐसा ही हुआ तो? आखिर बेटा अपने पिता से ही तो सीखता है.
अगले दिन पगफेरे की रस्म के लिए वैशिकी पीले रंग की शिफौन की साड़ी पहन कर जाने को तैयार हो गई. रश्मि ने सुबह उठ कर नाश्ते में आलू के परांठे और मूंग की दाल का हलवा बनाया था.
सुजाता बोली, ‘‘मम्मी, आप तो हम सब को मोटा कर के ही मानेंगी.’’
वंशूक भी कटाक्ष करते हुए बोला, ‘‘मम्मी, कितनी बार कहा है कि कुछ डाइट फूड बनाना भी सीख लो.’’
अमित बोले, ‘‘कहां से सीखेगी तुम्हारी मम्मी? इसे तो खुद अपनी कमर को कमरा बनाने से फुरसत नहीं है.’’
सभी हंस पड़े, लेकिन तभी वैशिकी बोल उठी, ‘‘भई किसी को अच्छा लगे या न लगे
मु झे तो ऐसा लजीज नाश्ता पहली बार मिला है.’’
वैशिकी की बात सुन कर रश्मि का चेहरा खिल उठा. पगफेरे के बाद वैशिकी और वंशूक 15 दिनों के लिए हनीमून पर चले गए. हनीमून पर भी वैशिकी ने महसूस किया कि वंशूक के घर से या तो उस की दीदी या फिर पापा ही फोन करते. जब वंशूक और वैशिकी हनीमून से वापस आए तो वंशूक की दीदी सुजाता अपनी ससुराल जा चुकी थी. वैशिकी शाम को अपने साथ लाए उपहारों को रश्मि और अमित को दिखाने लगी.
वैशिकी अमित के लिए टीशर्ट और रश्मि के लिए धूप का चश्मा लाई थी. रश्मि का उपहार देख कर अमित बोले, ‘‘वैशिकी बेटा यह क्या ले आई हो तुम अपनी मम्मी के लिए? तुम्हारी मम्मी ने यह कभी नहीं लगाया… यह तो शहर में इतने सालों तक रहते हुए भी अभी तक नहीं बदल पाई है… अब क्या लगाएगी…’’
वैशिकी बोली, ‘‘अरे पापा तो अब लगा लेंगी, मैं बहुत मन से लाई हूं.’’
अगले दिन अमित और वंशूक दफ्तर चले गए, वैशिकी की अभी 7 दिन की छुट्टियां बची थीं. उस ने िझ झकते हुए रसोई में कदम रखा तो देखा कि रश्मि बेसन के लड्डू बनाने में व्यस्त थी. वैशिकी को देख कर मुसकरा कर बोली, ‘‘बेटा, तुम्हें बेसन के लड्डू पसंद हैं न वही बना रही हूं.’’
वैशिकी ने एक लड्डू उठा कर खाते हुए कहा, ‘‘मम्मी, आप के हाथों में बहुत स्वाद है. झूठ नहीं बोल रही हूं.’’
रश्मि उदास सी हो कर बोली, ‘‘बेटा पिछले 30 सालों से खाना बना रही हूं… यह भी अच्छा नहीं बना पाऊंगी तो क्या फायदा?’’
वैशिकी बोली, ‘‘मम्मी, नहीं सच कह रही हूं, आप बहुत अच्छा खाना बनाती हैं. हरकोई इतना अच्छा खाना नहीं बना सकता है.’’
वैशिकी सोच में पड़ गई कि सास घर के हर काम में बहुत सुघड़ हैं, पर न जाने क्यों अपने खुद के रखरखाव को ले कर बहुत उदासीन हैं.
जब शाम होने लगी तो रश्मि अमित और वंशूक के लिए
पोहा बनाने लगी. इतनी देर में वैशिकी तैयार हो कर आ गई. रश्मि को देख कर बोली, ‘‘मम्मी, जब तक मैं चाय बना रही हूं, आप भी तैयार हो जाइए.’’
‘‘वह भला क्यों?’’ रश्मि ने आश्चर्य से पूछा.
‘‘वैशिकी रश्मि को एक नया सूट देते हुए बोली, ‘‘पापा आप को फ्रैशफ्रैश देखेंगे, तो खिल उठेंगे.’’
मगर अमित और वंशूक दफ्तर से वापस आए तो चाय की गरमगरम चुसिकयों के साथ वंशूक वैशिकी को अपने दफ्तर के नए प्रोजैक्ट के बारे में बता रहा था.
अमित ने एक सरसरी नजर रश्मि पर डाली और व्यंग्य करते हुए बोले, ‘‘काश, मैं भी किसी से दफ्तर के तनाव को डिस्कस कर सकता? केवल पोहा ही तनाव को कम नहीं कर सकता है.’’
रश्मि आंसुओं को पीते हुए कमरे में चली गई. वैशिकी का दिया हुआ सूट जो उस ने पहना था, उसे बदलते हुए सोच रही थी कि अमित ने उसे कब पत्नी का सम्मान दिया है. हर समय उसे गंवार बोलबोल कर ऐसे कर दिया है कि कभीकभी तो उसे अपनी पोस्ट ग्रैजुएशन की डिगरी पर शक होने लगता है.
रात को सोने के बिस्तर पर वैशिकी से नहीं रहा गया तो वह वंशूक से बोल उठी, ‘‘पापा क्यों मम्मी को हर समय ताने देते रहते हैं?’’
वंशूक बोला, ‘‘अरे पापा इतने स्मार्ट हैं और मम्मी एकदम गंवार लगती हैं, इसलिए पापा ऐसे बोलते हैं,’’ फिर वैशिकी को बांहों में लेते हुए बोला, ‘‘हरकोई मेरी तरह नहीं होता है कि उसे सुंदर और स्मार्ट पत्नी मिले.’’
अगले दिन बापबेटे के औफिस जाने के बाद वैशिकी और रश्मि दोनों घर पर अकेली थीं तो वैशिकी रश्मि से बोली, ‘‘मम्मी, अगर आप बुरा न मानें तो एक बात कहूं? आप पापा की हर बात क्यों सुनती हैं?’’
रश्मि बोली, ‘‘बेटा, क्योंकि मैं तुम्हारी तरह न स्मार्ट हूं, न ही सुंदर और न ही अपने पैरों पर खड़ी हूं.’’
वैशिकी आंखें बड़ी करते हुए बोली, ‘‘उफ, आप के पास कितने तीखे नैननक्श हैं… इतनी वैल मैंटेन्ड है, बस एक प्यारी सी मुसकान की कमी है.’’
रश्मि बोली, ‘‘अरे बेटा मजाक मत करो… मेरी सास, ननद, जेठानी और यहां तक कि बच्चे भी मु झे गंवार ही मानते हैं और फिर तुम्हारे पापा का और मेरा कोई जोड़ नहीं है.’’
वैशिकी बोली, ‘‘मम्मी, क्योंकि आप ऐसा सोचती हैं… जैसा आप अपने बारे में सोचेंगी दूसरे लोग भी वैसा ही सोचेंगे.’’
रात में वैशिकी ने खाने की टेबल पर अमित से कहा, ‘‘पापा, मम्मी इतना अच्छा खाना बनाती हैं… क्यों न हम कोई छोटामोटा बिजनैस सैटअप कर लें.’’
अमित बेचारगी से बोले, ‘‘बेटा, प्रेजैंटेशन का जमाना है… रश्मि जैसा खाना तो हरकोई बना लेता है… कौन करेगा मार्केटिंग और बाकी सब काम, तुम्हारी मम्मी तो बाहर वालों के सामने दो शब्द भी नहीं बोल सकती हैं… पूरी उम्र कुछ नहीं किया तो अब 51 वर्ष की उम्र में क्या करेंगी?’’
कोई भी कुछ नहीं बोल सका. सभी खाना खा कर सोने चले गए. रश्मि रसोई समेटने लगी.
अगले दिन रश्मि किचन में व्यस्त थी तो वैशिकी ने पूरी रूपरेखा तैयार कर ली थी. उस ने ‘रश्मि की रसोई’ नामक एक यूट्यूब चैनल खोल दिया, फिर बोली, ‘‘मम्मीजी, आप जो भी बनाती हैं बस मैं उस का वीडियो बना कर डालूंगी…’’
‘‘धीरेधीरे जैसेजैसे आप के सब्सक्राइबर बढ़ेंगे, वैसेवैसे लोगों को आप के नाम के बारे में पता चलेगा और फिर आप की आमदनी भी आरंभ हो जाएगी.’’
रश्मि घबरा कर बोली, ‘‘वैशिकी बेटा, मु झ से ये सब नहीं हो पाएगा.’’
‘‘मगर फिर वैशिकी के बहुत जोर देने पर रश्मि तैयार हो गई, लेकिन कभी कुछ न करने की लोगों की बातें दिमाग में घूम रही थीं,’’ जिस की वजह से घबराहट में रश्मि से पूरी सेव भाजी की सब्जी जल गई, तो रश्मि बोली, ‘‘देखा, वैशिकी, मैं ने कहा था न कि मैं गंवार हूं. मैं कुछ नहीं कर सकती हूं.’’
मगर वैशिकी पर तो जैसे जनून सवार था. शाम को बोली, ‘‘मम्मी, आप एक काम करें, पहले आप खूब अच्छी तरह से तैयार हो जाइए, फिर कोई छोटामोटा नाश्ता बनाइए. हम उसी से शुरू करते हैं.’’
इस बार वैशिकी ने रश्मि के द्वारा आटे का हलवा बनाने का वीडियो बना कर डाल दिया. वैशिकी ने उस वीडियो को अपने दफ्तर और दोस्तों के ग्रुप में शेयर कर दिया. शाम होने तक रश्मि के वीडियो को बहुत सारे व्यूज और काफी कमैंट भी मिल गए.
एक आदमी का यह कमैंट था, ‘‘भई, बीवी हो तो ऐसी सुंदर, सुशील और पाककला में निपुण.’’
वैशिकी ने कहा, ‘‘मम्मी, देखो आप की तो फैन फौलोइंग भी आरंभ हो गई है.’’
अगली सुबह रश्मि खुद ही तैयार हो गई थी. आज की वीडियो में वह
कल से अधिक कौन्फिडैंट थी. रश्मि के अपनी बहू वैशिकी के साथ दिन पलक झपकते ही बीत रहे थे. इन दिनों में रश्मि ने फिर से हंसना, मुसकराना और अपने ऊपर विश्वास करना सीख लिया था.
वैशिकी छुट्टियों के बाद अगले दिन दफ्तर जाने की तैयारी में जुटी थी. रश्मि उस के कमरे में आ कर बोली, ‘‘बेटा, अब वह चैनल का क्या होगा?’’
वैशिकी बोली, ‘‘मम्मी, हम लोग रोज शाम को एक वीडियो करेंगे… और मैं आप को सिखा भी दूंगी कि कैसे बिना किसी की मदद के आप अपना वीडियो खुद बना सकती हैं.’’
वैशिकी के प्यार और सम्मान के कारण रश्मि अब फिर से अपने खुद के करीब आ गई थी. अब हर समय एक मुसकान उस के होंठों पर थिरकती रहती थी. धीरेधीरे वैशिकी की मदद से रश्मि ने औनलाइन और्डर भी लेने शुरू कर दिए थे.
आज रश्मि को अपनी मेहनत का पहला चैक मिला था क्व10 हजार का. रकम चाहे बहुत बड़ी न हो पर उस से निकलने वाले हौसले को रश्मि अपने शब्दों में बयां नहीं कर पा रही थी. जो अब तक लोगों की नजरों में फूहड़, गंवार आदि थी, यहां तक कि अमितजी खुद अपनी पत्नी के इस बदले हुए रूप पर चकित थे.
वंशूक बोला, ‘‘मम्मी, बहू ने तो आप की काया पलट कर दी.’’
वैशिकी बोली, ‘‘नहीं, हुनर तो पहले से ही था मम्मी में, बस उन हौसलों को उड़ान देनी थी.’’
रश्मि को सब की बातें सुन कर ऐसा लगा कि बहुत दिनों से अपनी जिंदगी की बंद पड़ी खिड़कियां खुल गई हैं और एक नई रैसिपी की खुशबू उन खुली खिड़कियों से आ रहे हवा के झोंकों के साथ उस के मन को महका गई हो.
