Family Story : रेखा और रमन की शादीशुदा जिंदगी को पूरे पैंतीस बरस हो गए थे. एक आम गृहस्थ जिस तरीके से जीवनभर रिश्तों में बंध कर अपनी गृहस्थी चाहेअनचाहे खींचते हैं, उसी तरह से उन्होंने भी अपनी जिंदगी घसीटी. कहने को तो वे  दोनों स्वभाव से सीधे और सरल थे, लेकिन जब भी वे एकसाथ होते पता नहीं क्यों उन दोनों को एकदूसरे में कोई अच्छाई दिखाई ही नहीं देती और वे एकदूसरे की कमियां गिनाने लगते. अन्य लोगों के साथ उन का व्यवहार बहुत अच्छा रहता.

रमन को शुरू से ही रेखा का हर किसी से खुल कर बात करना बहुत खटकता. किसी भी बाहर वाले से वह  जब इतमीनान से बात करती तो रमन को बहुत  बुरा लगता. वह अपनी मंशा उसे कई बार जता भी चुके थे, लेकिन रेखा अपनी आदत से मजबूर थी. जो कोई घर आता, वह उस के साथ आराम से बतियाने  लगती.

रमन इस बात को ले कर बहुत कुढ़ते और नाराज होते. रेखा थी कि उन की एक न सुनती. लोगों से बातें करने में उसे बहुत रस आता था. यही वजह थी कि वह जीवन में अपने लिए तनाव कम लेती और दूसरों को  देती ज्यादा थी.

रमन स्वभाव से अंतर्मुखी थे. उन्हे किसी से ज्यादा बोलना पसंद न था. वे अपने काम से काम रखना ज्यादा पसंद करते. एक रेखा ही थी, जिस से वह पहले दिल की बात कह लेते थे. अब पता नहीं क्यों उन्हें उस के किरदार पर शक होने लगा था. जब भी वे उन के सामने पड़ती अच्छी बात भी बहस पर जा कर खत्म होती. यह बात उन का बेटा आशु और बेटी रिया छुटपन में ही समझ गए थे कि मम्मीपापा दोनों स्वभाव से अच्छे होते हुए भी अपनीअपनी आदतों से मजबूर हैं.

वक्त गुजर रहा था. आशु और रिया बड़े हो गए. एमएससी करते ही रिया के लिए अच्छा रिश्ता आया तो रमन ने उस के हाथ पीले कर दिए. बी. टैक कर के आशु नौकरी के लिए शहर से बाहर चला गया था.

बिटिया के ससुराल जाते ही घर सूना हो गया. घर पर रेखा से बात करने वाला  अब कोई नहीं रह गया था. पहले वह रिया से बात कर मन हलका कर लेती थी. उन का घर ज्यादा बड़ा न था. कुल मिला कर इस घर में तीन बैडरूम थे. जब कोई घर पर आता तो आशु या रिया में से किसी को अपना बेडरूम उस के साथ साझा करना पड़ता.

रोज सुबह उठने से रात  सोतेसोते तक रेखा और रमन में नोंकझोंक होती ही रहती. कुछ समय बाद आशु की शादी हो गई और वह भी परिवार के साथ बेंगलुरु शिफ्ट हो गया.

अब घर पर केवल रेखा और रमन रह गए थे. उम्र के साथ उन की आदतें भी और पक्की हो गई थीं. आशु ने अपने कमरे में एक बड़ा सा टीवी लगा रखा था. दोपहर में उस की अनुपस्थिति में रमन उसी टीवी पर अपने पसंदीदा कार्यक्रम देखना पसंद करते.

जब आशु घर पर रहता तो रेखा और रमन को एकसाथ एक ही कमरे में बैठ कर टीवी देखना पड़ता. यहां पर भी अपने पसंद के प्रोगाम को ले कर दोनों में अकसर बहस हो जाती. रेखा को धारावाहिक देखना पसंद था तो रमन को खबरें. किसी तरह से बहुत बहस  करने के बाद आपस में सामंजस्य बिठा कर उन दोनों ने टीवी देखने का समय निश्चित कर लिया था कि रात 9 बजे तक रमन खबरें देखेंगे और उस के बाद रेखा अपने मनपसंद धारावाहिक.

आशु के बैंगलुरू जाने के बाद सूने घर में अब केवल दोनों की नोंकझोंक की आवाजें सुनाई देतीं. एक दिन रेखा बोली, “घर पर बच्चे  नहीं हैं. अब तुम आशु के कमरे में बैठ कर आराम से टीवी देख सकते हो.”

रमन ने घूर कर रेखा को देखा, तो वह बोली, “ऐसे क्यों घूर रहे हो?” “तुम से ऐसी समझदारी वाली बात की उम्मीद नहीं थी. वैसे, तुम यह इसीलिए कह रही हो, जिस से तुम्हें भी टीवी देखने में परेशानी न हो और मुझे भी.”

रमन उसी दिन से आशु के कमरे में बैठ कर आराम से टीवी देखने लगे और रेखा अपने कमरे में धारावाहिकों का आनंद लेती. धीरेधीरे रमन ने आशु के कमरे में अपना और  सामान भी व्यवस्थित कर दिया. कई बार टीवी देखतेदेखते वे वहीं सो जाते. रेखा रात ठीक 10 बजे टीवी और लाइट बंद कर के लेट जाती.

एक दिन रमन बोले, “मैं ने सोच लिया है कि अब मैं टीवी वाले कमरे में ही सोया करूंगा.” “क्यों ऐसी क्या बात हो गई, जो नौबत यहां तक आ गई?” रेखा ने पलट कर पूछा. “कई बार रात को देर तक क्रिकेट मैच चलता रहता है. उसे देखने में मुझे सोने में देर हो जाती है.”

“जैसा तुम्हें ठीक लगे. तुम ने जो सोच लिया है, वह तो कर के रहोगे,” रेखा बोली. रमन ने इस समय उस से उलझना ठीक नहीं समझा और अपना बिस्तर आशु के कमरे में शिफ्ट कर दिया.

इस घर पर रहने वाले दो लोगों ने अब अपने को अलगअलग कमरे में व्यवस्थित कर लिया था. इस की वजह से अब दोनों का एकदूसरे से सामना कम ही होता. रमन चाय नहीं पीते थे. रेखा सुबह उठ कर पहले अपने लिए चाय बनाती और आध्यात्मिक प्रवचन सुनते हुए उस का आनंद लेती और रमन बरामदे में बैठ कर मजे से अखबार पढ़ते.

सुबह मेज पर नाश्ता करने के लिए दोनों साथ बैठ कर नाश्ता करते. अब रमन ने रेखा के बनाए खाने में मीनमेख निकालना कम कर दिया था. रेखा नाश्ता करने के बाद अपने कामों में लग जाती और रमन टीवी पर व्यस्त हो जाते. दोपहर में खाने की मेज पर लंच करते हुए उन में कभी किसी बात को ले कर थोड़ीबहुत नोंकझोंक जरूर हो जाती, लेकिन अब उस में उतना तीखापन  नहीं रह गया था, जितना पहले हुआ करता था.

लंच के बाद वे फिर अपनेअपने कमरे में आ कर इतमीनान से टीवी देखते और आराम करते. कुछ ही महीने में उन दोनों को एकदूसरे से दूरी बना कर जिंदगी जीने की आदत सी पड़ गई. रेखा ज्यादा सुकून में थी. अब रमन उस की हर बात में दखलअंदाजी नहीं करते.  उन्हें अब इस बात से भी ज्यादा मतलब नहीं था कि वह अपने कमरे में बैठ कर फोन पर किस से बातें करती है? रमन को भी घर पर अपने लिए एक अलग जगह मिल गई थी जिस में वह अखबार पढ़ने, टीवी देखने और मोबाइल फोन के साथ बहुत खुश थे. पूरे सात महीने बाद आशु घर आया. उस ने देखा कि पापा ने उस का सामान ऊपर की मंजिल में दीदी के कमरे में शिफ्ट कर दिया था और खुद उस के कमरे में रह रहे थे.

यह देख कर आशु बोला, “पापा, आप ने बहुत अच्छा किया. कम से कम इसी बहाने इस घर के 2 कमरे तो आबाद रहते हैं.” “हां बेटा, मुझे भी लगा कि कमरे खाली पड़े हैं, तो क्यों न उस का सदुपयोग कर खुल कर रहा जाए?”

आशु ऊपर कमरे में जा कर सो गया. सुबह उठ कर उस ने महसूस किया कि घर में एकदम शांति थी. पहले जैसी बात होती तो सुबह उठते ही मम्मीपापा की जोरजोर की आवाजें सुनाई देतीं. आज पहली बार सुबह के समय घर पर एकदम सन्नाटा पसरा हुआ था. बचपन से ले कर हमेशा इस घर में सुबह उठते ही  मम्मीपापा की आवाज सुनाई देने लगती थी. सो कर उठते ही वे दोनों बहस पर उलझे रहते. उन्होंने कभी किसी की परवाह नहीं  की कि कोई उन के बारे में क्या सोचता है? लेकिन इस बार माहौल बिलकुल बदला हुआ था. मेज पर नाश्ता करते हुए भी मम्मीपापा एकदूसरे से उलझने के बजाय उसी से बात कर रहे थे. अब उन के लिए एकदूसरे की उपस्थिति कोई मायने नहीं रख रही थी.

आशु को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अचानक इतना बड़ा परिवर्तन कैसे आ गया? नाश्ता करने के बाद पापा कमरे में जा कर टीवी देखने लगे. मम्मी भी थोड़ी देर उस से बात करने के बाद घर के कामों में व्यस्त हो गईं. जब उन्हें फुरसत मिली, तो वे अपनी पसंद का धारावाहिक देखने लगीं.

दोपहर में खाने पर वे तीनों साथ बैठे थे. आशु बोला, “मम्मी, अब घर कितना सूना लगता है.””हां बेटे, घर पर रौनक तो बच्चों से रहती है. तुम दोनों अब बाहर चले गए हो, तो घर भी सूना हो गया.” आशु के जी में आया कि कह दे, ‘मम्मी रौनक तो आप दोनों की बहस से रहती थी. अब आप लोग शांत हो गए हैं, तो घर की रौनक ही चली गई.’

असली बात मन में दबा कर वह बोला, “मैं और दीदी तो वैसे भी पढ़ाई में लगे रहते थे. हमें इतना सब बोलने की फुरसत कहां थी?” इस बार घर आ कर आशु ने महसूस किया कि पहले आपसी मतभेदों के बावजूद मम्मीपापा के मध्य हमेशा एक आत्मीयता का रिश्ता बना रहता था. नोंकझोंक के बावजूद आत्मीयता अपनी जगह पर बनी रहती थी.  इस सन्नाटे में वह भी कहीं गुम हो  गई थी. अब दोनों को एकदूसरे से ज्यादा।मतलब न था. केवल खाना खाने और किसी से मिलने जाने के लिए दोनों साथ उठतेबैठते, वरना वे दोनों अपनी अलग जिंदगी जी रहे थे और उसी में खुश भी लग रहे थे.

आशु ने होश संभालने पर कई बार महसूस किया था कि मम्मी के मन में हमेशा इस तरह की ही जिंदगी जीने की तमन्ना थी. आज  वह उसी जिंदगी का मजा ले रही थीं, पर उन्हें इस की कीमत भी चुकानी पड़ रही थी. इन सब में वह पापा से काफी दूर होती जा रही थीं.  दोनों अपने में खोए हुए थे. एकदूसरे की भावनाओं से अब उन्हें ज्यादा मतलब न था. पहले वह साथ बैठ कर बहस करते हुए आत्मीयता की बातें भी कर लिया करते थे. भले ही उन दोनों की बातों मे छत्तीस का आंकड़ा रहता, लेकिन वे एकदूसरे का भी पूरा खयाल रखते थे. मम्मी को जरा सा कुछ हो जाता, तो पापा बड़े परेशान हो जाते. पापा की तबीयत थोड़ा भी खराब होती, तो मम्मी बड़बड़ करते हुए भी उन्हें ढेरों नसीहतें दे डालती और उन की पूरी देखभाल करती थी.

अब उन के रिश्ते की ताजगी और गरमाहट कहीं खो गई थी और उस में बहुत ठंडापन आ गया था. जीवन के इस पड़ाव में जब उन्होंने एकदूसरे के सुखदुख का सब से ज्यादा खयाल रखना था, तब वे अपनीअपनी दुनिया में ज्यादा व्यस्त हो कर एकदूसरे के प्रति उदासीन हो गए थे.

आशु को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था. उस ने यह बात रोमा को भी बताई. दोनों ने इस बारे में विचार किया. बहुत सोचसमझ कर वह बोला, “मम्मी, मैं चाहता हूं कि आप दोनों कुछ दिन के लिए हमारे साथ रहें.”

“लेकिन बेटा, यहां घर छोड़ कर जाना भी तो ठीक नहीं है.””घर कौन से कोई उठा कर ले जाएगा. थोड़ा सामान है उस की देखभाल के लिए बगल में शर्मा आंटी से कह देंगे. वे कभीकभी घर खोल कर देख लेंगी. बाकी यहां ऐसा है भी क्या ?”

“अपना घर तो अपना होता है बेटे.””आप की बात सही है मम्मी. मेरा घर भी तो आप का ही घर है. बच्चे भी आप को मिस कर रहे हैं. मैं चाहता हूं कि कुछ समय के लिए मेरे साथ चलें. मैं आप को ले जाने आया हूं.”

“यह बात तुम पहले बता देते, तो अच्छा रहता बेटे.””मैं आप को सरप्राइज देना चाहता था.”रेखा और रमन बेटे की बात को न टाल सके. उस ने एक हफ्ते की छुट्टी और बढ़ा ली और उस के बाद घर को ताला डाल कर आशु मम्मीपापा को ले कर बैंगलुरू आ गया. वहां  उस के पास 3 बैडरूम वाला फ्लैट था. एक कमरे में वह और उस की पत्नी रीमा, तो दूसरे में बच्चे ऊधम मचाते. आशु ने तीसरे बैडरूम में मम्मीपापा की व्यवस्था कर दी थी.

महीनों से खुले घर में स्वछंद रहने की आदत के बाद रेखा और रमन को यह कमरा बहुत छोटा लगा. पर यहां मजबूरी थी. वे बेटे से कुछ कह भी नहीं सकते थे. वे  अपने को इस कमरे में  किसी तरह एडजस्ट कर रहे थे. आशु ने  पूछा, “मम्मी कोई तकलीफ तो नहीं है?”

” नहीं बेटा. अपनों के बीच में कैसी तकलीफ? बच्चों के साथ बहुत अच्छा लग रहा है.””उन्हें भी आप का साथ बहुत अच्छा लगता है मम्मी.””बेटा, एक बात कहनी थी.””कहो ना पापा, यहां कोई परेशानी है?””मैं चाहता था कि एक टीवी इस कमरे में भी लगा देते. समय काटना आसान हो जाता.”

“पापा, यहां पर समय काटने की दिक्कत कहां है? बच्चे हैं, मैं और रीमा हैं और साथ में मम्मी. इतने लोगों के साथ कमरे में टीवी की जरूरत क्या है? बैठक में लगा तो है. आप जब मरजी हो, वहां पर बैठ कर टीवी देख सकते हैं.”

“वहां पर बच्चे अपने पसंद के कार्टून देखते रहते हैं.” “तो क्या हुआ? दिनभर आप टीवी देख लेना. शाम को बच्चे अपनी पसंद के प्रोगाम देख लेंगे. हम भी तो बचपन में ऐसा ही किया करते थे. क्यों मम्मी?”आशु बोला.

“तुम ठीक कहते हो बेटा. उस के बाद रमन ने आगे कुछ नहीं कहा. यही परेशानी रेखा को भी हो रही थी. वह रात को अपने पसंद के धारावाहिक बहुत मिस करती, लेकिन कुछ कह नहीं पा रही थी.

समय काटने के लिए शाम होते ही वे दोनों थोड़ी देर नीचे टहलने चले जाते और उस के बाद खाना खा कर रात को अपने कमरे में आ जाते. शुरुआत में दोनों को एक ही बैड पर एकदूसरे से काफी परेशानी हो रही थी. कभी रमन के खर्राटे तो कभी पेट की गैस रेखा को  परेशान कर रहे थे, लेकिन मजबूरी थी यहां पर इतनी जगह नहीं थी कि वह कहीं और जा कर सो पाती. यह बात वह बहू को भी नहीं कह सकती थी.

शाम के समय रमन को टीवी के बिना समय काटना मुश्किल हो रहा था. मजबूरन अब वे एकदूसरे से बातें कर के अपना समय गुजारने की कोशिश करने लगे. वर्षों की चिकचिक और आपसी बहस कुछ महीनों पहले लगभग खत्म हो गई थी. बेटेबहू के सामने वह फिर से उसी राह पर नहीं जा सकते थे. अब वे नए सिरे से शुरुआत कर एकदूसरे से अच्छी तरह बात करने की कोशिश कर रहे थे. बेटे के घर पर  लड़ने के लिए कोई मुद्दा भी न था.

रमन यहां बहू के बनाए खाने में कोई कमी भी नहीं निकाल सकते थे. बेटे के घर पर रहते हुए उन्हें काम की भी कोई परेशानी नहीं थी. आशु और रीमा उन्हें यहां कुछ काम न करने देते. बस यहां परेशानी एक ही बात की थी, वह थी समय काटने की. बच्चे दिन में थोड़ी देर उन के साथ बातें करते और खेलते. उस के बाद वे अपना होमवर्क निबटाते. आशु शाम को थकाहारा घर लौटता. थोड़ी देर मम्मीपापा के साथ बात कर के फिर वह अपने बीवीबच्चों के साथ अपना वक्त गुजारता.

रेखा और रमन को यहां आए हुए एक महीना हो गया था. उन्हें अपने पुराने घर की याद सताने लगी थी. एक दिन रमन ने दबी जबान में यह बात आशु से कह भी दी, “बेटा, हमें यहां आए बहुत समय हो गया है.” “कहां पापा… अभी एक महीना ही तो हुआ है.” “बेटा, एक महीने का समय कम नहीं होता भला.”

“जानता हूं पापा, पर इतना ज्यादा भी नहीं होता कि आप यहां हमारे साथ न रह सकें.” अब आगे बोलने की कोई गुंजाइश न थी. मजबूरन रमन और रेखा को यहां पर एक महीना और रहना पड़ा. इतने समय में रमन और रेखा आपसी मनमुटाव भुला कर एकसाथ एक कमरे में रहने के अभ्यस्त हो गए.

वे शाम को एकसाथ टहलते और साथ बैठ कर अपनी सुखदुख की बातें किया करते. यह देख कर आशु को बहुत अच्छा लगता. खाना खाने के बाद भी वे आपस में देर तक बतियाते रहते.

2 महीने बाद आशु उन्हें छोड़ने खुद घर आया. इतने समय बाद बच्चों और बेटेबहू से दूर जाना उन्हें अच्छा नहीं लग रहा था. आशु के पास ज्यादा छुट्टी नहीं थी. 2 दिन घर की साफसफाई में बीत गए थे. मम्मीपापा के साथ मिल कर उस ने सारा घर व्यवस्थित कर दिया था. जाने से पहले उस ने दोपहर में उन के लिए टीवी भी चालू करवा दिए थे. उन से विदा लेते समय उसे बहुत बुरा लग रहा था. आशु के परिवार के साथ 2 महीने बिताने के बाद अब रमन और रेखा को यहां अकेले रहने का अवसर मिल रहा था.

आशु की रात की ट्रेन थी. वह घर से खाना खा कर निकला था. आशु के जाते ही रमन अपने कमरे में आ गए और रेखा अपने. इतने समय बाद उन्होंने अपनेअपने कमरे में टीवी चलाए. आज अकेले टीवी देखने में रमन का मन नहीं लगा. जरा देर बाद टीवी बंद कर के वे रेखा के कमरे में आ गए और बोले, “आज बच्चों के बगैर बड़ा खराब लग रहा है.”

“तुम ठीक कह रहे हो. इस उम्र में परिवार का साथ बहुत जरूरी होता है. अब हमें उन के साथ ही रहना चाहिए.””तुम्हारी बात सही है, लेकिन जब तक हाथपैर चल रहे हैं, तब तक हमें उन के ऊपर पूरी तरह आश्रित नहीं होना चाहिए. उन्हें भी जिंदगी अपने ढंग से जीने का मौका देना चाहिए,” रमन बोले.

वे दोनों साथ बैठ कर आपस में बातें करने लगे, तो टीवी देखने का खयाल ही दिमाग से उतर गया. रेखा बोली, “घड़ी देखो, 10 बजने वाले हैं. अब हमें सो जाना चाहिए.”रमन उठ कर दूसरे कमरे में आ गए. थोड़ी देर में वे वापस रेखा के कमरे में आ गए.

” क्या हुआ?””अकेले कमरे में अच्छा नहीं लगा. क्या मैं भी यहीं सो जाऊं?””कैसी बातें करते हो? यह घर तुम्हारा है. इस में पूछने की क्या जरूरत है ?” रेखा बोली, तो रमन खुश हो गए और वहीं लेट गए. कुछ ही देर में उन के खर्राटे गूंजने लगे. अब रेखा को उन के खर्राटे जरा भी नहीं अखर रहे थे.

बैंगलुरू वापस आ कर आशु भी आश्वस्त हो गया था. उस ने मम्मीपापा के बीच खड़ी हो रही खामोशी की दीवार को तुरंत गिरा दिया. रेखा और रमन को अब एकदूसरे से कोई शिकायत न थी. इस उम्र में एकदूसरे से नजदीकियां उन्हें नई ऊर्जा दे रही थी.

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