लेखिका-दिव्या साहनी
इस रविवार को अंजु ने लंच पर उन सब को अपने घर बुला लिया था. वहां चारों बच्चों ने उस को पूरा समय अपने साथ खेल में लगाए रखा. ज्यादा देर तक सोने व राजीव के साथ कुछ मौजमस्ती करने की अपनी दोनों इच्छाओं को पूरा करने का कोई मौका शिखा को नहीं मिला.
उस रात काफी थके होने के बाद भी शिखा सो नहीं सकी थी. नीरजा की घरगृहस्थी की जिम्मेदारियां पूरा करने के चक्कर में वह अब
खुद को अजीब से जाल में बहुत फंसा महसूस कर रही थी. वह अपनी पुरानी दिनचर्या में
लौटना चाहती थी, पर नीरजा का दिल दुखाए बिना ऐसा करने का उसे कोई रास्ता नहीं सूझ
रहा था.
उस का न औफिस के काम में दिल लगता, न नीरजा के घर के कामों में. किसी से हंसनेबोलने का मन नहीं करता. नीरजा जितना ज्यादा उस के प्रति अपना आभार व प्रेम प्रकट करती, वह खुद को उतना ही ज्यादा चिड़ा व परेशान महसूस करती.
ऐसा भी हुआ कि राजीव ने मौका पा कर उसे अपनी बांहों में भर कर प्यार करने की कोशिश करी थी. परेशान शिखा को उस के स्पर्श से किसी तरह से उत्तेजना या सुख महसूस नहीं हुआ था. बगल के कमरे में नीरजा की मौजूदगी ने शायद उस की भावनाओं को खिलने व पनपने की स्वतंत्रता छीन ली थी.
सोनू और मोनू के साथ खेलने और बातें करने से वह बचती. अंजु के बच्चों को तो वह थोड़ी देर के बाद ही उन के घर भेज देती थी. नीरजा के मुंह से अपनी तारीफ सुनना उसे कोई खुशी नहीं देता. राजीव के प्रति जो खिंचाव वह सदा महसूस करती थी, उस में भी कमी आ
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